Dr.Mohan Bairagi

Wednesday, May 12, 2021

कहानी - उम्मीद का दरख़्त

 


कहानी  


उम्मीद का दरख़्त

 लक्ष्मी....ऐ...लक्ष्मी....कहाँ है....? देख लक्ष्मी....., आज मैं तेरे लिए जलेबी लेकर आया हूूँ। आज तो खूब बिक्री हुई..! कितने महकते फूल थे आज के गुलदस्तों में...! वाह मज़ा आ गया....। है ईश्वर बस ऐसे ही बरकत बख्शता रह हम ग़रीबों पर...तेरा बहुत एहसान हम पर। लेकिन लक्ष्मी कहाँ चली गई....लक्ष्मी.....एै....लक्ष्मी.....! (राम आसरे)

आइइइईईई.....क्या हुआ.....क्यों इतना शोर मचा रहे हो....। मैं पिछे की दिवार को लीप-छाब रही थी.....कितनी सीद आने लगी दिवारों से...पुरा घर गीला हो जाता है....इस मौसम....?

कब से कह रही हँू......घर की दीवारें पक्की बनवा लेते हैं....ईंट-गारा कब तक टिकेगा....? हमारे सपनों के जैसे हर सुबह इनसे भी टूटकर मिट्टी बिखरने लगती है......? (लक्ष्मी)

बनवा लेंगे....जल्दी ही....! तु धीरज धर....

लक्ष्मी....देख....आज मैं जलेबी लाया हँू। आज महकते फूलों के पुरे चैदह गुलदस्तों की बिक्री हुई। ले.....ये बचे हुए तेरह सो पचास रूपये संभाल कर रख दें...! जरूरत के समय बचत ही काम आती है। और फिर हमको अपने घर की दीवारों को भी पक्का करवना है....ले.....रख ले....पाई-पाई जोड़कर ही घर बनता है।

जलेबी की थैली लक्ष्मी को देकर....चल अब खाना परोस दे.....मैं हाथ मुँह धोकर आता हँू...! (राम आसरे)

तभी घर के बाहर से मुनादी की आवाज़ आती है?

सुनो...सुनो...सुनो.....सरकारी फरमान है....गौर से सुनननो....मौसम विभाग के अनुसार....देश में सुखा पड़ने की आशंका हैएएए.....? सुखे और अकाल से निपटने के लिए सरकार को धन की जरूरत हैएएए...! सभी लोग अपनी जमा पुँजी सरकारी खजाने में जमा कर देंएएए.....नहीं तो देशद्रोही मानकर जेल में डाल दिया जायेगा...? सुनो.... सुनो..... सुनननोओओ....।

हाय राम...! ये क्या...?

हम अपना पैसा सरकार को दे देंगे....? तो हम क्या करेंगे....हमें अपना घर बनवाना है..! और भी घर के खर्चे है....बड़ी मुश्किल में मेहनत मजदुरी करके तो अपना पेट पालते है.....ये कैसी निर्दयी सरकार है....?

अरे क्या हुआ लक्ष्मी.....ला खाना रख जल्दी, बड़ी जोर की भुख लगी है....?

भुखी तो सरकार हो गई है हमारे खुन की......? सुना तुमने....(लक्ष्मी)

क्या....? क्या हुआ.....? अचानक से क्यों इतनी आगबबुला हो रही है...? कौनसी आफत टुट पड़ी आसमान से....? (राम आसरे)

आसमान से ही तो टुटी है.....? हम ग़रीब लोग, बड़ी मुश्किल से अपने लिए दो जुन की रोटी की जुगाड़ कर पाते हैं...? ठीक से खाने को नहीं...ओढ़ने-पहनने को नहीं... तुम्हारे दो जोड़ी कपड़े खरीदने के लिए कब से सोच रहे हैं...अब तक नहीं ला पाये...? चारपाई टूट गई....उसे ठीक करवाना है....कच्चे टूटे बर्तन में खाना बनता है....स्टील के बर्तन लाना है...और ये सरकार है कि...आम जनता पर ही जुल्म ढाने वाली है...? बताओ.....? अब हमको अपनी जमा पुँजी सरकार को देना होगी...? कोई अपने घर में रूपया जमा नहीं कर सकता...? आँखों में आँसू भर....रामआसरे को खाना परसते हुए बोली...!

कोई बात नहीं.....ईश्वर पर भरोसा रखो......ऊपरवाला सब ठीक करेगा....! तुने सुना है न वो कहते कि ऊपरवाला सबका ध्यान रखता है, तो हमारा भी रखेगा। देख, हमारे पास खेती-बाड़ी नहीं...., कोई और आमदनी नहीं...., पुरे गाँव में सबसे गरीब.....ले-देकर कुल जमा यह दो कमरों का घर ही है...हमारी जमा पुँजी..! अच्छा है....सरकार ने जमीन जायदाद भी नहीं माँग ली जनता से....? और इसके बाद तो सारे गाँव में सब एक बराबर हो जाएंेगे....! क्या गरीब...क्या अमीर..., सब एक। तकलीफ तो उनकी है....जिन्होंने तिजोरी भर रखी अपनी काली-सफेद कमाई से..? हल्के अनमने मन से खाना खाते हुए रामभरोसे ने पत्नी से कहा- ला...ले...आ....जितना रूपया है...हमारे पास....तो दे आऊ सरकारी खजाने में...।

रामभरोसे अपनी सारी जमा पुँजी सरकारी खजाने में जमा कर आया। घर आकर देखता है...लक्ष्मी सुबक कर रो रही है...और बड़बड़ाते हुए सरकार को कोसती गालियां निकाल रही है। ......चल सो जा अब...रात होने को है.....ना जाने कल से ज़िंदगी कैसे गुज़रेगी....अकाल देश में ही नहीं....हम सब के जीवन में पड़ने वाला है....क्या होगा....कैसे होगा ....? है राम.....कृपा करो....! बुदबुदाते-बड़बड़ाते दोनों सो गए...लेकिन नींद जैसे....उसे तो अकाल ने अभी से लील लिया हो.....आने का नाम ही नहीं ले रही थी...? सारी रात आँखों ही आँखों में कट गई।

गरीबी के हालात में दोनों अपना जीवन गुज़र बसर कर रहे थे, दिन बीता..., महीना बीता... आशंका सच साबित हुई....अकाल पड़ा....आसमान से पानी बरसने का नाम नहीं लेता.....जाड़े के मौसम मंे भी चिलचिलाती धुप...? पशु-पक्षी पानी को प्यासे....खेत-खलिहान सुखे....हवा का नामो निशान नहीं....,तो वहीं दुसरी और इस दौरान गाँव में चोर लुटेरों ने भी खूब आंतक मचाया.....लोगों के घरो से बर्तन, सामान और राशन की चोरियां होने लगी...? एक सुबह जैसे ही लक्ष्मी की आँख खुली.....

हाय राम......ज़ोर-ज़ोर से दहाड़ मारकर छाती पिटते.....ये क्या हो गया.....हरामखोरों ने खाने को भी नहीं छोड़ा....सब चोरी कर लिया.....देखो...देखो तो....सुनो...उठो....अंअंअंअअअ...नाशपिटों ने कुछ नहीं छोड़ा....सब ले गये......है भगवान...इससे तो अच्छा मौत दे दे....फांके में तो यूं भी न जी सकेगें। सुनोओओ...उठो....!

क्या हुआ...सुबह-सुबह क्यूं इतना रो रही है लक्ष्मी.....ऐसा क्या पहाड़ टुट पड़ा है..?(रामभरोसे)

नाशपिटे सब ले गये....राशन, बर्तन.....सब...?(लक्ष्मी)

दो महिनों से नून रोटी खाकर बसर कर रहे थे.....वो भी ले गये? अब क्या होगा...?

रामभरोसे, सुनकर दंग रह जाता है....थोड़ी देर गुमसुम....,फिर संभल कर.....

चिंता न कर....ऊपर वाले ने पेट दिया है...वहीं कुछ न कुछ इंतजाम करेगा...!

अगले सात दिन तक सिर्फ पानी से पीकर खाते-सोते.....दोनों सिर्फ आसमान निहारा करते......कब बरखा होगी...कब फुल खिलेंगे.....

अब तो हड्डियां दिखने लगी दोनों की....शरीर में जान ही न रही मानो...? लेकिन विश्वास का पक्का रामभरोसे....हिम्मत नहीं हारता....घर के बाहर माथे पर हाथ धरे बैठा था कि....अचानक कहीं से माथे पर पानी की बुंद टपकी....नज़रे उठाकर आसमान की तरफ देखा तो बादल आ रहे थे.....थोड़ी ही देर में मानो करिश्मा हो गया....बिजली की गड़गड़ाहट होने लगी....और देखते ही देखते ज़ोरदार बारिश होने लगी.....रामभरोसे चिल्लाया......लक्ष्मीईईईई.....लक्ष्मीईईईई....लक्ष्मी देख....मैं न कहता था... ऊपरवाला सबकी सुनता है....देख बारीश होने लगी बाहर......ला जल्दी कपड़े दे....मैं जाकर देखू....दरख्त को........?

रूआंसी आँखों से....खुशी के मारे लक्ष्मी के आँसू छलक पड़े...बोली-कपड़े कहाँ हैं......यही जो तन पर है....यही बचा है हमारे पास...बाकी तो सब लूट ले गये...?

कोई बात नहीं....मैं एैसे ही जाता हँू.....! रामभरोसे दरख्त के पास आकर देखता है....बारिश में तरबतर दरख्त पर फूल खिलने को हैं.....यह देखकर खुशी के मारे वह चार फर्लांग कुदने लगा....और भागकर घर आकर...देख लक्ष्मी मैं न कहता था...कि ऊपर भगवान है और निचे दरख्त.....अब फिर अच्छे फुल खिलेंगे...फिर गुलदस्ते बेचकर खुब कमाई होगी, खुब हरियाली होगी, खुब खुशहाली होगी।

कहानी- उम्मीद का दरख्त

लेखक - डाॅ. मोहन बैरागी




 

कहानी - आक्सीजन

 कहानी  

आक्सीजन

प्रताप सिंह ने अपने घर के आंगन में एक छोटा सा बगीचा बनाया हुआ है, और रोज़ सुबह शाम इसमें पानी देतेे हैं। उन्हें शौक है, आंगन को हरा-भरा रखने का, वे आए दिन नई किस्म के पौधे ले आते हैं और आंगन में लगा देते हैं। आज भी वे अपने आंगन में बरगद का पौधा लगा रहें हैं। एक तरफ कोने में खुरपी से मिट्टी खोद कर बाहर कर रहें थे कि तभी उनका आठ वर्षीय पोता बिट्टू उनके पास आकर कहता है.....दादाजी...ये आप क्या कर रहें हैं..? मिट्टी क्यो निकाल रहें हैं...? बिट्टू बेटा....यहां हम बरगद का पेड़ लगाएगें...! आपको पता है...बरगत से हमें आक्सीजन मिलती है...! ये आक्सीजन क्या होती है दादाजी...? प्रताप सिंह...मिट्टी खोदकर...उसमें कुछ जैवीक खाद मिलाकर उलट-पलट करते हुए....बिट्टू बेटा...आक्सीजन प्राणवायु होती है...हम जो सांस लेते हैं ना...इसमें भी हम हवा से आक्सीजन ही लेते है....। अच्छा, बताओं बेटा...? आपको पता है...हमारा शरीर किससे बना है....? हाॅं.....दादाजी....हमारा शरीर हाथ, पेर, मुहॅं से बना है...? हा...हा....हा...हा.....नहीं बेटा.....हमारा शरीर पानी और आक्सीजन से मिल कर बना होता है, आक्सीजन गैस या हवा के रूप में होती है और पानी........ये दोनों मिलकर हमारे शरीर को बनाते है....हम इन दोनों के बिना जिंदा कोई नहीं रह सकता।, अच्छा दादाजी....!

प्रताप सिंह गड्डे में बरगद के पौधे का रखकर आसपास की मिट्टी से गड्डा भरते हुए.....अं....चलो बेटा हो गया....अब यह बड़ा होकर हमे छाया और आक्सीजन देगा....लेकिन इसके लिए हमको इसकी भी देखभाल करना पड़ेगी। प्रताप सिंह अपने पोते से बात कर ही रहे होते हैं कि तभी आवाज़ आती है....? बाबुजी....ये आप क्या दिनभर आंगन में पौधो को उधल-पुधल किया करते हैं....देखिये न मिट्टी और पत्तों का कचना पुरे घर में आता है....थोड़े उंचे स्वर में दरवाजे पर खड़े प्रताप ंिसह के बेटे अनिल सिंह ने कहा..?

हो गया....हो गया....मेरा काम बेटा अनिल....! (प्रताप सिंह)

ओके बाबूजी.....आईये....नाश्ता कर लिजिये....।

कहते हुए अनिल अपना बेग उठाकर आफिस के लिए निकल जाता है। समय गुज़रता है....! अनिल सिंह अब अपने आफिस में सबसे सिनियर मोस्ट अधिकारी हो गया है....उसके पास रूतबा, पैसा, गाड़ी सब आ गया, लेकिन बाबुजी की ज़िद की वजह से नया घर नहीं लिया....। बाबूजी को अपना वहीं पुराना घर पसंद है...क्योंकि उसके आंगन में उनके लगाये पेड़ पौधे वाला सुंदर सा गार्डन है, इस गार्डन उस बरगद सहित कई पौधे अब पेड़ की शक्ल ले चुके हैं। प्रताप सिंह अब सत्तर वर्ष से अधिक आयु के हो चुके हैं, लेकिन प्रकृति के नज़दिक रहने की वजह से आज भी एकदम स्वस्थ्य और फुर्ति एैसी की पच्चीस साल के नौजवान से मात दे दें। पोता बिट्टू अब काॅलेज पढ़ने जाने लगा हैं। आज बिट्टू का ग्रेजुएशन फाईनल ईयर का रिजल्ट आने वाला है...। प्रताप सिंह बिट्टू को आवाज देते हुए!

बिट्टू....बेटा बिट्टू....कहां हो भाई....आज तुम्हारा इम्तेहान का रिजल्ट आने वाला है....।

एं...ये लो मैं वहां सारे घर में तुमको ढूंढ रहा हूॅ और तुम यहां कम्प्युटर पर लगे हुए हो.....आॅंखें खराब हो जायं्रेगी....! ज़्यादा मत चलाया करों इस कम्प्युटर को। 

हां दादाजी...।

चलो, जल्दी तैयार हो जाओ, आज मैं भी चलूंगा तुम्हारे साथ, तुम्हारे काॅलेज...तुम्हारा रिजल्ट जो है आज..?

कहकर प्रताप सिंह कमरे से बाहर निकल गया। बिट्टू ने भी अपना कंप्यूटर बंद किया और दीवार की खुंटी पर टंगा टावेल लेकर बाथरूम की तरफ नहाने चला गया। थोड़ी देर बाद फिर से आवाज आई....तैयार हुए की नहीं बिट्टू...? देखो...पेड़-पौधो को पानी देकर मंदिर भी जाना है....फिर काॅलेज...। सुबह के दस बज गये है। जल्दी करों...?

बिट्टू अगले पांच मिनट में तैयार हो कर आ गया और दुसरी तरफ प्रताप सिंह भी आंगन के पेड़-पौधो को पानी देकर जाने के लिए एकदम रेडी है।

चलो दादाजी.....प्रताप सिंह के हाथ में हेलमेट देकर...दुसरा हेलमेट खुद बिट्टू पहनते हुए कहता है...इसे पहल लिजिये दादाजी..! स्कुटर स्टार्ट कर....आईये दादाजी बैठिये...। प्रताप सिंह, हेलमेंट पहनकर बिट्टू से कहते हैं...मंदिर होते हुए चलना है बेटा....कोई भी शुभ ओर अच्छा काम करने से पहले भगवान के दर्शन जरूर करना चाहिए।

प्रताप सिंह और बिट्टू मंदिर के दर्शन करने के बाद सीधे काॅलेज पंहूचते हैं जहां नोटिस बोर्ड पर रिजल्ट लगा हुआ है....उसके सामने बच्चों की भीड़ है...एक दुसरे को धक्का देकर हर कोई नोटिस बोर्ड तक पंहुचने की कोशिश कर रहा है...बिट्टू, प्रताप सिंह से भीड़ के बाहर ही कहता है...दादाजी आप यहीं खड़े रहिये, भीड़ बहुत है...आप इस भीड़ में मत चलिये....मैं नोटिस बोर्ड पर रिजल्ट देखकर आता हूॅ। कहकर बिट्टू...भीड़ में खड़े काॅलेज के बच्चों के कंधे पर हाथ से पिछे की और धकेलते.हुए खुद आगे बढ़ता है, वह भीड़ को ऐसे चिरते हुए नोटिस बोर्ड के पास पंहुच जाता है, जैसे पानी में कोई पत्थर फेंके तो वह पानी की सतह को चिरकर तलहटी में चला जाता है। नोटिस र्बोर्ड के पास पंहुच कर बिट्टू अपनी जेब से रोल नंबर वाला नामांकन पत्र निकालता है ओर दुसरे हाथ रिजल्ट लिस्ट की तरफ करते हुए उंगली से अपना रोल नंबंर देखने लगता है। नोटिस बोर्ड पर लगी दो-तीन सुची में तीन-चार बार उंगली से उपर-नीचे देख लेने के बाद भी बिट्टू को अपना रोल नंबर इस रिजल्ट सुची में कहीं नहीं मिलता....उसके चेहरे से हवाईयां उड़ जाती है...वह अचानक खुद को असहज महसुस करने लगता है....और निराश सा चेहरा लेकर वापस भीड़ से टकराते हुए बाहर निकलता है। घबराता हुआ प्रताप सिंह के पास पंहुचकर....दादाजी रिजल्ट लिस्ट में कहीं भी मेरा रोल नंबर नहीं है..? 

प्रताप सिंह.....अरे क्या हुआ....इतना घबरा क्यूं रहे हो बिट्टू....रिलेक्ट रहो बेटा...गहरी सांस लो....आक्सीजन अंदर जायेगी तो घबराहट दुर हो जायेगी.....लेकिन....।

ठीक से देखा तुमने बेटा...होगा वहीं लिस्ट में होगा रोल नंबर....?

बिट्ट....नहीं है, दादाजी...मैनें....तीन-चार बार देखा...फैल और पास....दोनो लिस्ट में मेरा नंबर नहीं है।

प्रताप सिंह.....ऐसा कैसे हो सकता है....चलो....आफिस में चलकर पता करते है...रोल नंबर क्यूॅं नहीं है लिस्ट में...? आओ... कहते हुए बिट्टू और प्रताप सिंह दोनों आफिस की तरफ चल दिये।

कौन हैं यहां....कोई जिम्मेदार व्यक्ति है.......

आईये सर....कहिये....आफिस में टेबल के दुसरी तरफ ज़ोर-ज़ोर से खांसते हुए, संर्दी के मारे नाक बंद से बोलने की कोशिश करते हुए...हांफते-हांफते, पुरी तरह से चेहरा लाल, ओर एकदम बीमार बैठी महिला ने कहा।

मेरा नाम प्रताप सिंह है...और ये मेरा पोता बिट्टू है....आपके काॅलेज में ग्रेजुऐशन में पढ़ता है....लेकिन बाहर बोर्ड पर लिस्ट में इसका रोल नंबर ही नहीं है...देखिये.....बच्चे की हालत कैसी हो गयी.....घबराहट के मारे एकदम इसकी....कम से कम क्या रिजल्ट है..? वो तो लगाईये बोर्ड पर...?

सर्दी के मारे नाक से सुड़-सुड़ और साथ में हांफते-खांसते हुए.....साॅरी सर....आप बैठिये....सर बिट्टू हमारे काॅलेज का सबसे ब्रिलियंट स्टूडेंट है। और इसका रिजल्ट...खों...खों...(रूमाल से नाक पोछते और खांसते हुए) प्रिंसिपल सर के पास है....वो अखबारों में देने के लिए न्यूज बनवा रहें है....बिट्टू ने टाॅप किया है...पुर काॅलेज में बिट्टू फस्र्ट आया है। हमे गर्व है आपके पोते पर...वी आ...आ...आ...आर प्राउड आॅफ हिम...। मैं आपके बिट्टू के रिजल्ट की शीट का दुसरी काॅपी देती हूॅं....ये लिजिये...।

यह सब सुनते ही प्रताप सिंह के चेहरे पर सागरभर खुशी दौड़ गई...बिट्टू ने तुरंत प्रताप सिंह के पैर छू लिये...। अरे...अरे...जीते रहो बेटा...खुब तरक्की करो...देखा.....तु वैसे ही घबरा रहा था...काॅलेज में टाॅप किया है तुने...चल अब घर...वापस चलते हुए फिर से मंदिर में चलकर भगवान के दर्शन करना और फिर तेरे पापा अनिल को भी ये खुशखबरी देना। चल....और चेहरे पर अप्रतीम खुशी लेकर काॅलेज के आफिस से बाहर निकल गये।

उधर प्रताप सिंह के जाते ही आफिस में बैठी महिला ने दवाई लेने के लिए अपना पर्स खोला और दवाई खाने के लिए निकाली....और....है भगवान...कितना सर्दी-जुकाम....कहा से हो गया ये...डाक्टर की रिपोर्ट भी देखू...क्या आया है जांच रिपोट में......रिपोर्ट देखकर उसकी आॅंखें एकदम खुली की खुली रह जाती है..? ये क्या....रिपोर्ट में तो भयानक जानलेवा संक्रमित बीमारी की पाजीटीव रिपोर्ट.....?

उधर प्रताप सिंह और बिट्टू खुशी के मारे फूल के कुप्पा हुए जैसे घर पंहुचते है....और दोनो खाना साथ खाते हैं...खाने के बाद....बिट्टू अब में अपने कमरे मंे जा रहा हूॅं....कुछ थकावट हो जैसा लग रहा है....थोड़ी देर आराम करूंगा...कहते हुए प्रताप सिंह अपने कमरे की तरफ चल देता है और बिट्टू अपने दोस्तों को फोन कर काॅलेज में टाॅप करने की खुशखबरी देने लगता है।

शाम होते होते प्रताप सिंह के कमरे से कराहने की आवाज आने लगती है। बिट्टू यह सुन तुरंत अपने दादा के कमरे की तरफ भागता है, दादाजी....दादाजी...क्या हुआ.....जैसे ही वह कमरे में दाखिल होता है...देखता है कि.....!

प्रताप सिंह जोर जोर से सांसे ले रहा है.....ज़ुकाम के मारे सुड़-सुड़ और रह-रह कर खाॅंसी से हालत खराब है।

दादाजी आप ठीक तो हैं...क्या हुआ आपको..... प्रताप सिंह के हाथ पर बिट्टू अपना हाथ रखता है....अरे...दादाजी आप की तबीयत तो खराब है.....कितना गरम हो रहा है आपका शरीर......रूकिये मैं पापा को फोन करता हुॅं.....आपको हास्पिटल ले चलते है.....

हैलो.....पापा......, हाॅं, बिट्टू बोलो.......

पापा, दादाजी की तबीयत खराब है, आप जल्दी आईये, हास्पिटल ले जाना पड़ेगा......है भगवान...क्या हुआ बाउजी को....रूको मैं अभी आता हॅंू। अगले ही कुछ मिनटों में अनिल सिंह अपने पिता प्रताप सिंह के पास पंहुचता है.....क्या हुआ...बाउजी...आप ठीक हैं..? बिट्टू, जल्दी से कार निकालो....चलिये उठिये बाउजी....हास्पिटल चलते है.....! उधर प्रताप सिंह एकदम बेसुध...? जैसे-तैसे अनिल के कंधे का सहारा लेकर खड़े होते है और अनिल धीरे-धीरे के साथ कार की तरफ बढ़ते हैं, बिट्टू भी कार का दरवाजा खोलकर वापस आकर प्रताप सिंह को सहारा देकर कार मैं पीछे की सीट पर लेटा देता है।

अस्पताल पंहुचकर.....डाॅक्टर साहब......डाक्टर साहब...देखिये बाउजी को क्या हुआ....डाॅक्टर चेकअप करते है....इनको एडमिट करना होगा....सिवियर इंफेक्शन लगता है....आप जाईये काउंटर से एडमिट करने की प्रोसेस कर लिजिये....! अनिल सिंह पेशेंट भर्ती करने की सारी प्रक्रिया पुर कर लौैटकर क्या देखता है.....? प्रताप सिंह के मुंह पर आक्सीजन मास्क लगा हुआ है, हाथ में सलाईन की सुई लगी है....दिल की धड़कन देखने के लिए सीने पर ईसीजी मशीन की काॅर्ड लगी हुई है, और डाक्टर इंजेक्शन लगा रहे है....। तुरंत डाक्टर से पुछता है.... क्या हुआ बाउजी को, ठीक हो जायेंगे ना......! इनकी हालत बहुत सीरियस है..? पुरी बाॅडी में जनलेवा इंफेक्शन हुआ है...सांस लेने में दिक्कत है....आक्सीजन देना पड़ेगी, और हमारे हास्पिटल क्या.....शहर के किसी भी हास्पिटल में आक्सीजन नहीं हैं...इस बीमारी की वजह से सारे शहर में आक्सीजन की कमी है.....?

पास ही खड़ा बिट्टू यह सब बातें सुनता है, उसे बचपन की दादाजी की वो बात अचानक याद आ जाती है, जो उन्होनें बरगद का पौधा लगाते हुए कही थी....की ये बरगद हमे आक्सीजन देता है...।

 

कहानी- आक्सीजन

लेखक - डाॅ. मोहन बैरागी



कहानी - इंजेक्शन

 कहानी  

इंजेक्शन

(1)

‘नवीन‘ आज फिर अस्पताल से दो इंजेक्शन चुरा कर ले आया और अस्पताल के बाहर वाली दवाई की दुकान पर ऊँचे दाम में बेच दिये। उसकी इस करतूत को अस्पताल के बाहर मेन गेट के पास बैठी एक भिखारिन अपने बारह वर्ष के बेटे के साथ देख रही थी, क्योंकि यह ‘नवीन‘ का रोज का किस्सा है। वह सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर के पद पर नौकरी करता है और अच्छी खासी तन्खाह उसे मिलती है, लेकिन ज्यादा धन की लालच में वह अस्पताल से दवाईयों की चोरी कर ऊँचे दाम में बेच देता है, उसके अंदर की मानवता कुंठित होकर शायद कहीं भीतर ही दब सी गई है। घर में एक छोटी बहन ‘रचना‘ है, जिसे वह अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करता है, उसका सपना है कि बहन कि शादी किसी अमीर डाक्टर से करेगा। लेकिन बहन एक पैर से पोलियोग्रस्त है, शरीर से एकदम दुबली-पतली बहन अक्सर बीमार रहती है..? भाई कंपाउंडर है तो गाहे-बगाहे बहन पर अपनी डाक्टरी झाड़ लेता है, बहन ठीक भी हो जाती है, नवीन को इस बात का अभिमान है कि वह ऐसी परिस्थितियों को भी आसानी से हेंडल कर लेता है। ‘नवीन‘ की सक्रीयता और अस्पताल में भर्ती मरीजों की अच्छी-खासी तीमारदारी की वजह से पुरा अस्पताल प्रशासन उसे ही ज्यादातर कामों की जिम्मेदारी देता है। अस्पताल में आज एक नए डाक्टर की पोस्टिंग भी हुई है..! मुख्य प्रशासनिक अधिकारी ने नवीन को बुलाया....‘नवीन‘......देखों, आज से नये डाक्टर साहब...डाॅ. विकास की पोस्टिंग हमारे अस्पताल में हुई है, अब तुम इन्हीं के अंडर में काम करोगे...आओ...तुमको ‘डाॅ. विकास‘ से मिलाये देते है..!

नमस्कार डाॅ. विकास....कैसे हैं आप...? मैं इस अस्पताल का चीफ एडमिनिस्ट्रेटिव आफिसर हँू.....और ये है ‘नवीन‘...कंपाउंडर। अब से यही आपको असिस्ट करेगा।

आईये....आईये...मैं ठीक हँू...! आप कैसे है.....और ‘नवीन‘ तुम कैसे हो....।

डाक्टर ‘विकास‘ की कुर्सी के पास पड़ी बेसाखी देख.....‘नवीन‘ कुछ पलों के लिए गुम सा हो गया और फिर संभलते हुए बोला.....मैं ठीक हँू सर....। आप कैसे हैं...? पुछते हुए उसकी निगाह डाॅक्टर ‘विकास के पैरो की तरफ दौड़ गई....! उसे एक पैर कुछ पतली लकड़ी जैसा दिखा.....‘नवीन‘ से रहा न गया और, आँखों में तैरते सवाल को उसने ‘डाॅ. विकास‘ तरफ उछाल ही दिया....? सर..., ये बेसाखी....?

हाँ....‘नवीन‘......, ‘पोलियोमाईलाईटीस‘..? तुम तो जानते ही हो इस बीमारी को....जो ज़िंदगीभर के लिए टीस देती है...! ‘पोलियो....‘।, मैं ऐसा डाक्टर हँू जो दुसरों को बीमारी से निजात दिलाकर दौड़ता कर देता हूँ और खुद इस बेसाखी के सहारे चलता हूँ?(कुर्सी के पास पड़ी बेसाखी को हाथ लगाकर)। अगले ही पल खुद को मजबुत करते हुए ‘डाॅक्टर विकास‘ ने कहा- छोड़ो ये सब, तुम मुझे मेरे वार्ड में भर्ती मरीजो की फाईलें बताओं...कितने मरीज भर्ती हैं और क्या बीमारी है इनकी....ज़रा देख लूं....और लग जाएं सेवा में...।

‘नवीन‘ कहीं खो-सा गया था....उसे अपनी बहन के लिए जैसे दुल्हा मिल गया मानो....उसके दिमाग में इस समय और कुछ नहीं, बस अपनी बहन के सुनहले भविष्य के सपने पलने लगे थे जैसे....। तभी वह अचानक चैंका...जैसे उसे किसी ने आवाज लगाई हो....‘नवीन‘.....‘नवीन‘....कहां खो गए भाई.....लाओ फाईलें लाओ सब...। जी, अभी लाया डाक्टर साहब....। वार्ड भी भर्ती मरीजों की सभी फाईलें डाॅक्टर को दिखाने के बाद निर्देशानुसार मरीजों को दवाई देकर उसकी ड्यूटी खत्म कर घर पँहुचे ही....,कहाँ हैं मेरी प्यारी बहना.....रचनाआआ....ओ रचनाआ...., जी आई भय्याआआ....बेखासी के सहारे लंगड़ाते हुए ‘रचना‘....क्या बात है...? आज बड़े खुश दिखाई दे रहे हो.....? हाँ, आज मुझे तेरे उजले भविष्य के लिए उम्मीद की किरण दिखाई दी। इसलिए आज खुश हँू.....भगवान करे, तेरा घर बस जाएं.....तु दुल्हन बने.....तेरी डोली सजे....मैं खुब नाँचू-गाऊ..!, पगली.....तेरे ब्याह के ख़याल से खुश हूँ। एक बहुत अच्छा लड़का देखकर जल्दी तेरी शादी कर दूंगा। आज तो अस्पताल में लगा, जैसे मेरी ये इच्छा जल्दी ही पुरी हो जायेगी।

हाँ.. हाँ.., मैं बोझ जो हूँ आप पर....लंगड़ी, बेसाखी घसीटकर चलने वाली....बीमार रहने वाली....कौन नहीं चाहेगा ऐसे इंसान से छूटकारा..? आँखें छलकाते बोल पड़ी।

अरे...नहीं पगली.....हर भाई का सपना होता है....उसकी बहन की शादी किसी अच्छे लड़के से हो....वो महलों में जाये....राज करें....और फिर मैं तूझे ऐसे थोड़ी कहीं भी ब्याह दूंगा.....किसी अच्छे राजकुमार से ब्याहुंगा....तु मझसे दूर नहीं होगी....पगली....मैं हँू न तेरे साथ....चल अब खाना लगा दे...बहुत भूख लगी है। दोनो भाई बहन खाना खाकर अपने अपने कमरे में सोने चले जाते है...लेकिन ‘नवीन‘ की आँखों में बहन के ब्याह कि चिंता से तो ‘रचना‘ की आँखों में भाई की परेशानी की वजह से रातभर नींद नहीं आती। आँखों ही आँखों में रात गुज़र जाती है।

(2)

अगले दिन सुबह रोज़ की तरह ‘नवीन‘ डाक्टर के चार्ट के हिसाब से वार्ड के सभी मरीजों को दवाईयां देकर पेशेंट शीट में इंट्री करने के बाद दवाइयों के स्टोर रूम में जाकर सबसे नज़रे चुराते हुए चुपके से कुछ महंगे इंजेक्शन जेब से रूमाल निकालकर उसमें पोटली बनाकर वापस जेब में ठंूस देता है, मेहनती और लगनशील होने की वजह से उसका अस्पताल के हर हिस्से में आना जाना आसान है, कोई उस पर शक नहीं करता...? वह अस्पताल के कंपाउंड से बाहर जा रहा ही होता है कि उस भिखारिन की नज़र फिर ‘नवीन‘ पर पड़ती है....आज ‘नवीन‘ की शारीरिक मुद्रा में कुछ अजीब सी बैचेनी झलक रही है, मेने गेट से बाहर निकल ही रहा होता है कि अचानक उसके मोबाईल की घण्टी बज उठती है.....टननटनन......टननटनन....हड़बड़ाहट में जेब में हाथ डालकर मोबाईल निकालता है......तभी जेब में रखी इंजेक्शन की पोटली नीचे जमीन पर गिर जाती है....‘नवीन‘ को इसका ध्यान नहीं रहता......हेलो....हेलो......दुसरी तरफ से......‘नवीन‘...‘नवीन‘....सुनो.....तुम्हारी बहन को हमारे अस्पताल में एडमिट किया है....उसे हार्ट अटेक आया है.....उसकी हालत ज्यादा सीरियस है...हमने ‘डाॅ. विकास‘ को काॅल किया है...वो आ रहे हैं.....तुम जल्दी आओ वार्ड में....? यह सुनकर ‘नवीन‘ के पैरो तले जैसे जमीन खिसक गई....एक पल के लिए जैसे उसकी दुनिया ही लुट गई...अगले ही पल होश संभालते हुए....दौड़कर वार्ड में जाता है......रचना.....रचना......मेरी बहन....क्या हुआ तुझे....? तु चिंता मत कर सब ठीक हो जायेगा.....मैं हूँ ना यहाँ......तुझे कुछ नहीं होगा मेरी बहन....। तभी डाॅक्टर विकास आकर ‘रचना‘ को देखते हैं....अपना आला लगाकर ‘रचना‘ की धड़कने चेक करते हुए......‘नवीन‘ जल्दी से आईसीयू में ले चलो....वेंटीलेटर पल लेना होगा....हालत ज्यादा खराब लगती है...सीवियर अटेक हुआ लगता है.......डाॅ. साहब, ये मेरी छोटी बहन है....इसे बचा लिजिये...मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ...प्लीज....! हाँ...हाँ...सब ठीक होगा, तुम जल्दी करो...पेशेंट को आईसीयू में शिफ्ट करो....कुछ इंजेक्शन लिखता हँू...इन्हें जल्दी से अस्पताल के दवाई स्टोर से लेकर आओ, तुरंत लगाना होंगे...! ‘नवीन‘ रचना को आईसीयू में शिफ्ट कर अस्पताल के दवाई स्टोर में इंजेक्शन लेने भागता है, वहाँ पंहूचकर देखता है कि डाॅक्टर के इंजेक्शन स्टोर में नहीं है.....हड़बड़ाहट में उसे कुछ समझ नहीं आता...., वह तुरंत इंजेक्शन के लिए अस्पताल के बाहर के मेडिकल स्टोर की तरफ भागता है.......मेने गेट सामने जैसे ही पहँूचता है......सामने वह भिखारिन हाथ में रूमाल की पोटली लिये खड़ी है....जिसमें वहीं इंजेक्शन है...जो डाक्टर ने ‘रचना‘ को लगाने के लिए लिखे थे। भिखारिन उसे बिना कुछ कहे पोटली दे देती है.....! ‘नवीन‘ आईसीयू में आकर नर्स को इंजेक्शन देते हुए ग्लानि से दहाड़े मारकर रोने लगता है।


कहानी- इंजेक्शन

लेखक - डाॅ. मोहन बैरागी


कहानी - गड्ढा

 कहानी  

गड्ढा


तुफान सिंह बेहद गरीब परिवार का एकलौता लड़का है, घर में माँ और एक बहन है। पुरा मजदुरी कर अपना गुजर बसर करता है। तुफान सिंह को शराब की लत है। हर रात को शराब के नशे में धुत्त रहता है तो दिन में मजदुरी करते हुए भी शराब का सेवन कर लेता है। तुफान सिंह की गरीबी उसकी टुटी बिखरी छप्पर वाली छत, जो सिर्फ सर ढंकती है और कच्ची दीवारों वाला एक कमरे का घर बयां करती है। तुफान सिंह करीब तीस साल का नौजवान है। घर का खर्चा पुरे परिवार की कमाई से चलता है। परिवार की स्थिति अत्यंत दयनिय है, गरीब बस्ती में सड़क के आखरी में किनारे पर बना घर, जो तुफान सिंह के पिता ने बनाया था, इसी में पुरा परिवार रहता है। पिछले हफ्तेभर से तुफान सिंह काम पर नही गया है, उसकी बुढ़ी माँ और बहन मिलकर घर खर्च चला रहे है। माँ की इच्छा है कि उसकी लड़की की शादी किसी कमाने-धमाने वाले नेक लड़के से हो जाये। आज भी माँ और बहन फटे उघड़-ढके चिथडे़नुमा कपड़ो में मजदुरी कर घर जैसे ही आये हैं, उन्हें तुफान सिंह जमीन पर पड़ा बड़बड़ाते मिलता है.....! 

आज भी तुने दारू पी है....कितना पियेगा....पी...पी...के मर जायेगा....? (तुफान सिंह की माँ)

पीना हहहहह....है तो पीना हहहहह...ह....है...लाला....ला...लाला...ला....मरने से कोन डरता है...? (तुफान सिंह)

पी....नास पिटे......पी और मर जा...बाप के जैसा....? मुझे भी मर मर के ही तो जीना है.....छोटी की शादी करना है.....बड़ी मुश्किल से मजूरी कर कर के पैसे जमा कर रही हूँ, के कोई अच्छा मेहनत करने वाला लड़का देख के इसके हाथ पिले कर दूं। तु तो बस दारू में ही मर.....तेरी कोई जिम्मेवारी नहीं है, छोटी के लिए....?

क्या.....तु.....पैसे जमा कर रही है.....हरामखोर....? मेरे उपर इतना कर्जा है.....कलाली वाले का....बीड़ी-तंबाकू वाले का....? और तु छुपा-छुपा के पैसे जमा कर रही है...? कर देंगे छोटी की शादी भी....मुझे भी फिकर है....मेने देखे भी है...एक दो लड़के इसके लिए.....कल ही शाम को विक्रम के साथ उसका दोस्त आया था कलाली पे...बड़ा अच्छा लड़का है....मैं सब कर दूंगा....? (तुफान सिंह)

तभी बीच में छोटी बोल पड़ी....माँ थक गये.....अभी रोटी भी बनानी है....तुम दोनो क्यो लड़ रहे हो....हो जायेगी शादी-वादी...! रोज़-रोज़ तुम दोनो लड़ते हो....देखना मैं खुद भाग जाऊंगी किसी के साथ....?

पड़ा रहने दो इसको दारू के नसे में....? मैं जा के रोटी बनाती हँू।....मर...तू ऐसे ही.....तुफान सिंह की तरफ गुस्से से देखते हुए कोने में चार ईंट के बने चुल्हे के पास जाकर चुल्हा जलाने की तैयारी करने लगती है।

नास पिटे ने जिंदगी नास कर दी....ना खुद जीता है....न दुसरों को चेन से जीने देता है....? (तुफान सिंह की माँ)

तुफान सिंह नशे की हालत में लड़खड़ाते हुए उठने की कोशिश करता है....और ......बता...पैसे कां छुपाऐ.....बता....नई तो माड् डालूंगा...बता. लड़खड़ाते हुए अपनी माँ की तरफ बढ़ता है कि उसकी माँ उसे एक हाथ आगे कर धक्का देती है, अगले ही पल तुफान सिंह फिर जमीन पर गिर जाता है....और बड़बड़ाते हुए....माआआआ....ड् डालूंगा..?

इधर तुफान सिंह की छोटी बहन ईट के बने चुल्हे में कुछ लकड़िया सुलगाकर चुल्हा जलाकर रोटी बनाने के लिए आटा मसते हुए उसमें मिलाने के लिए डिब्बों में नमक ढूंढने लगती है....नमक का डिब्बा खाली है.....माँ नमक नहीं है....खाली पड़ा है डिब्बा....?

चार दिन पहले तो लाई थी चार नमक की थैली.....लगता हैं वो भी इस नास पिटे हराम के पिल्ले ने बेच दी होगी...! बिना नमक के बना ले.....चेहरे पर परेशाली और झल्लाहट के भाव लिये तुफान सिंह की माँ ने कहा...। थोड़ी देर बाद दोनों माँ-बेटी बिना नमक की रोटी मिर्ची के साथ खाकर एक चटाई पर पास-पास सो जाते है। अगले दिन सुबह......

तुफान सिंह की माँ जैसे ही उठती है....देखती हैं कि.....उसकी बेटी भी नहीं है....और तुफान सिंह भी गायब है..? एक कमरे का घ बिखरा पड़ा है....? वह तुरंत उठकर छप्पर की तरफ देखती है.....कच्चे छप्पर में नीचे से बनाए एक गड्डे नुमा जगह से मिट्टी सरक कर निचे गिर रही है.....वह चैंक जाती है....उसके मुँह से निकलता हैं....हे राम....मेरे पैसे...मेरे पैसे.....?

वो तुरंत उठकर देखती है....उस गड्डे में अपना हाथ डालकर चारो तरफ घुमाती है...गड्डा खाली....उसके आँसू निकलने लगते है और मुंह से गालियां...। हरामी.....कुत्ता.....नास पिटा.....दारू पिने के वास्ते मेरे सारे पैसे चुरा ले गया, बड़ी मुस्किल से थोड़ा-थोड़ा जमा कर बेटी की शादी के लिए दस हजार रूपे एकट्टठा किये थे.....? तुफान सिंह की माँ अपनी फटी साड़ी का पल्लू कांधे पर डालकर, बिखरे बाल और मलिन जैसी हालत में ही घर के बाहर दौड़ लगा देती है......और भागकर बस्ती के बाहर कोेेेई सो मीटर दुर सड़क किनारे कलाली पहँुचती है....सुबह का वक्त है....कलाली पर शराबियों की भीड़ और पास ही खुले अहाते में कई लोग दारू पीने में मस्त हैं...एक-एक कर सब पर नज़र दौड़ाती है..... तभी एक किनारे पर कोने में मिट्टी से लथपथ लेटा तुफान सिंह का दोस्त विक्रम दिखाई दे जाता है.....क्यों रे...विक्रम....नास पिटे....कां है...तुफान.....तुने सब नास मार दिया मेरे छोरे का......कां हैं.....तुफान बता....?

तुफान दारू पिने आया था.....कलाली पे.....उधार चुकता करके...उसने खुब दारू पी......और मेरे दोस्त को जान से मारने के लिए ढूंढने गया है......मुझे भी मारा.......मैं छोडुंगा नही तुफान को.........तेरी छोरी.....मेरे दोस्त के साथ भाग गई है.......? (विक्रम सिंह)

सुनते ही तुफान सिंह की माँ के पैरों तले ज़मीन खिसक गई.....? दहाड़े मार कर रोने लगी.....ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगी.....मैं मर गयी....बरबाद हो गई......कहीं का नहीं छोड़ा इन दोनों भाई-बहन ने.....? और रोते-रोते.....वापस अपनी छोपड़ी नुमा कच्चे मकान में आकर एक कोने मैं गुमसुम सी बैठकर....छप्पर के नीचे बने बस गड्ढे को निहारने लगी.....जिसमें बेटी की शादी के लिए पैसे जमा कर रखे थे।


कहानी- गड्ढा

लेखक - डाॅ. मोहन बैरागी


कहानी - चिड़िया

 कहानी  

चिड़िया


पंछीयों के चहचहाने की आवाज़ चारो और से ज़ोर ज़ोर से आ रही है....चैं....चैं...चैं......पी......पी......पी.....पीईईई......! घर के भीतर चारो और कुछ पछंी इधर उधर चहचहाते आवाज़ करते हुए उड़ रहे है। तभी..............आहहहह......ये किसने फेंका ग्लास.....कितनी ज़ोर से लगी हैं...? चश्मा टूट गया। आहहह.... ना जाने क्या है इस घर में....हर कोई चीज़े उठा-उठाकर फेंकता रहता है.......विद्याआआआआ.......अरे ओ विद्याआआ.....देखो माथे में कपाल के कोने से खुन निकलने लगा... स्यअआआआ....घुम्मा उठ गया, चश्मा अलग टूट गया....? विद्याआआआ....अअआआआहहहह.....विद्या........मैं यहाँ दर्द के मारे मरा जा रहा हूँ......कहाँ हो तुम..? लखीराम शर्मा ने दर्द सहते हुए.........एक हाथ से टूटे चश्मे को जोड़ने की कोशिश करते हुए, दुसरा हाथ चोट पर प्रेशर से रखकर अपनी पत्नी को फिर आवाज़ दी....! विद्या....कहाँ हो....लाओ ज़रा कपड़ा और काॅटन दो....अअआआआहहह....और कितने दर्द सहना है...इस उम्र में अब....?

क्या हुआआआ.....पंछियों से बचते हुए, उन्हें श्श्शशशशश.....फुर्रर्रर्र.....आवाज़ के साथ हाथ का इशारा कर भगाते हुए दौड़कर विद्या कमरे मंे दाखिल होती है। अरे....क्या हुआ......? मैं किचन में थी.....! ये चोट कैसे लगी आपको.....देखू तो.......है भगवान....इसमें से तो खून निकल रहा है....! तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू उठाकर कोने को इकट्ठा कर एक पोटली बनाई और लखीराम के माथे पर रखते हुए........साड़ी के उस पोटली वाले कोने को फाड़कर....लो पकड़ो इसको...ज़ोर से दबाकर रखो.....मै क्रीम पट्टी लेकर आती हूँ....! तुरंत भागकर पट्टी क्रीम हाथ में लेकर लौटी और क्रीम लगाते हुए.......ये अरूण को पानी देने में ज़रा देर क्या हुई...चीज़े फंेकना शुरू कर देता है....? हे भगवान कैसा नसीब दिया है....शादी के आठ साल बाद एक बेटा दिया वो भी बीमार.....? तीस साल का होने को आया...अभी तक....बीमारी नहीं गई....कब बड़ा होगा ये....कब ठीक होगा......आँखें नम करते हुए.....ऐसी ज़िंदगी भी ज़िंदगी है.....जिसे हम दोनों के बुढ़ापे का सहारा बनना चाहिये....उसे अब तक हमारे सहारे की ज़रूरत है...? तभी दुसरे कमरे से आवाज़ आई.......

मम्मीमीईईई.....मम्मी......मम्मीमीमीईईई.......पानीनीईईई.....पानी पीना है...प्यास लगी है....टीशर्ट पायजामा पहने हल्की दाढ़ी बिखरे हुए बाल, आँखों पर मोटा चश्मा, गोरे रंग का दिखने वाले दिवार से सटे पलंग पर बैठे अरूण ने फिर आवाज़ लगाई....। मम्मीमीईईई.......पानीनीईईई......!

लखीराम के सर पर पट्टी बांधकर.....लो.....बंध गई पट्टी.....वहाँ अलमारी में दर्द की टेबलेट पड़ी है उसमें से आप टेबलेट ले लो, उससे दर्द नहीं होगा....और शाम को जाकर डाक्टर से टिटेनस का इंजेक्शन भी लगवा आना। मैं देखती हँू...अरूण पानी के लिए चिल्ला रहा है....ऊपर से ये चिड़ियों का शोर....पुरे घर को जंगल बना के रखा है आपने....? विद्या तुरंत अरूण के कमरे में जाकर उसे पीने का पानी देते हुए गुस्से से कहती है.....क्यो रे........तु हमारी जान लेकर ही मानेगा क्या....देखा तुने......सर फोड़ दिया तुने पापा का.....कितना बड़ा घुम्मा सा हो गया.....चश्मा टूटा सो अलग......तंग आ गए हैं तेरी हरकतो ंसे....चीजे़ उठाकर तोड़ने का शौक हैं न.....आँखें चैड़ी करते हुए डांटते हुए....एक हाथ से अरूण का पानी पिला दुसरे हाथ को माथे पर फेरते....स्वर बदलते हुए.....बेटा अब तु बडा हो गया है....काबू क्यों नही रखता खुद पर.....? क्यों इतना गुस्सा करता है....? इसी गुस्से की वजह से बार बार बेहोश हो जाता है....? लड़खड़ाकर चलता है....कितना ईलाज करवा चुके है तेरा....बड़े-बड़े नामी डाक्टरों को दिख दिया....फिर भी तेरी मानसिक, शारीरिक हालत ठीक नहीं होती....? बेटा अपने अंदर आत्मविश्वास पैदा कर....तु ठीक है....खुद को एैसा समझ....तेरी ऐसी हालत से हम दोनो पति-पत्नी पर क्या गुज़रती है....सोचा कभी.....? अच्छा चल....मैं चाय बनाकर लाती हूँ....पलंग के बगल में पड़ी टेबल पर पानी का ग्लास रखते हुए.....दुसरे हाथ में साड़ी के पल्लु से नम आँखों को पोछते हुए विद्या चली जाती है। 

उधर लखीराम शर्मा टूटे चश्में को हाथ में लिए सोचने लगते हैं........पुरे जीवन कोई बुरा काम नहीं किया....ईश्वर की उपासना की.....सात्विक जीवन जीया.....पर्यावरण विभाग में रहते पशु-पक्षियों से इतना प्रेम किया कि रिटायरमेंट के बाद आज भी पुरे घर आँगन में पक्षी चहचहाते हैं....रोज़ इनको दाना पानी देता हुँ....गाय को चारा खिलाता हँु......जीवन में एक पैसे का दाग़ नहीं.....विभाग के लोग आज भी मुझे याद करते हैं कि कोई अफसर था हमारा भी......! अपने सर को ऊँचा कर....जैसे ऊपर वाले से भरे मन से सवाल हो....हे भगवान....ये कैसी ज़िंदगी दी है.....एक बेटा दिया.....वो भी......? कम से कम इसकी बेहोशी को तो ठीक कर दे...? एक बार बेहोश पर चैबीस-चैबीस घण्टे तक होश नहीं आता...? 

हिम्मत हार चुके हारे हुए एक पिता की तरह......आँखंे बंद कर गहरी साँस लेते हुए.....खैर......जो प्रभु इच्छा....! पंछियों को दाना-पानी देने का समय हो गया है.....बेचारे भूखे होंगे....? दे आंऊ। लखीराम शर्मा आंगन में आकर मुख्य द्वार पर दरवाजे़ की चैखट के ऊपर फर्शी पर पानी के एक छोटे टब में पंछियों के लिए पानी भरकर वहीं पास में कुछ दाना बिखेर कर...आंगन में एक कोने में नीचे भी पंछियों के लिए दाना बिखेर कर लौट आता है। लखीराम शर्मा के कोई दो दर्जन से ज्यादा पक्षी दरवाजे़े की मुंडेर पर....खिड़की के कोने में, दिवार के सहारे लगे पाईप के ऊपरी कोने में तो आंगन में लगे पेड़-पौधो पर मंडराते रहते है। इनमें से कई पक्षी घर के भीतर भी कमरों में यहाँ-वहाँ उड़ते रहते है। लखीराम की पत्नी इनसे काफी परेशान है। एक बार वह दरवाजे़ की चैखट के ऊपर बने घोंसले को कचरा समझ फेंक भी आई थी......?, जिसमें चिड़िया के अंडे थे, जिनसे बच्चे निकलने वाले थे। विद्या को वह घटना आज भी कहीं न कहीं भीतर से परेशान करती है।

दिनभर की रूटीन के बाद शाम को खाना बनाकर पति और बेटे को खिलाकर विद्या आराम करने चली जाती है.....लेकिन उसे देर रात तक नींद नहीं आती....अजीब सी बैचेनी मन में है....कुछ अजीब घटना होने के संकेत जैसे मिल रहे हों....? 

अगले दिन सुबह......विद्या आज उठने में लेट हो गई, आँख खुलते ही....अलसाई सी उठकर कमरे से बाहर आकर देखती है, लेखीराम चिड़ियों को दाना डाल रहे हैं......! ‘आज जल्दी उठ गये क्या आप....?‘, नहीं आज तुम देर से उठी हो....! मैं नहाकर, पुजा पाठ करके पौधों को पानी दे चुका हँू, बस अब पक्षियों को दाना डालकर अखबार पढ़ना है...तब तक तुम ज़रा चाय बना लाओ....!

विद्या अपनी साड़ी ठीक करते हुए किचन की तरफ चली जाती है। तभी आवाज़ आती है......मम्मीमी...च...चायय....!

अरूण लड़खड़ाते हुए पलंग से उठता है और चलने की कोशिश करने लगता है.....आंशिक विकलांगता के कारण लंगड़ाते-लड़खड़ाते हुए दिवार से टकराते जैसे-तैसे बाहर की तरफ बढ़ता है....!

अरे.....अरूण बेटा...तुम क्यो उठे पलंग से.....तुम्हारी मम्मी चाय बनाकर ला रही है....हम दोनो साथ पियेंगे...! कहते हुए लखीराम दरवाजे पर अरूण का सहारा देने लगते हैं.....अरूण दरवाजे से बाहर निकलने की मुद्रा में खुद को खींचकर बाहर करना चाहता है। अच्छा...अच्छा...चलो...आंगन में बैठकर चाय पियेंगे...। जैसे.....दोनो दरवाजे़ की चैखट के बाहर होते हैं....अरूण यकायक जमीन पर गिरकर बेहोश हो जाता है। अरे....बेटा....बेटा......अरूण....गाल पर थपकी मारते हुए...जगाने का प्रयास करते लखीराम......!

सु...न...सुनो......सुनो....विद्या.....देखो, अरूण फिर बेहोश हो गया....जल्दी आओ.....?

क्या हुआ......भागते हुए विद्या दरवाजे़ पर पहँूची....अरे....आँख में आँसू लिए.....अरूण...बेटा अरूण.....हे भगवान.....ये क्या हो रहा है....सारी विपदा हम पर ही क्यों आन पड़ी......उठो बेटा.....देखो मैं चाय बना लाई तुम्हारे लिए......अरूण....सुनो, लगता है फिर अरूण को अस्पताल ले जना पड़ेगा।

लखीराम और विद्या आपस में बात कर ही रहे होते हैं कि तभी अचालक चिड़ियों का शोर सुनाई देता है....? ऊपर चिड़ियों का एक झुण्ड इकट्ठा हो जाता है और ज़ोर ज़ोर से चहचहाने की आवाज़ आने लगती है.....विद्या को उनकी आवाज़ कर्कश लगती है ओर ऊपर की और देखते हुए हाथ से झुण्ड को भगाने का प्रयास करती है, फिर अरूण की तरफ उसका ध्यान जाता है......कुछ पल बाद देखती है ऊपर से पानी की धार गिर रही है....जो अरूण के चेहरे पर गिरती है.....विद्या और लेखीराम अरूण को झूंझलाते हुए होश में लाने का प्रयास कर रहे होतेे है, तभी अरूण हाथ पैर हिलाने लगता है.....और चेहरे पर गिर रहे पानी से चेहरे को बचाने का प्रयास करता है। यह देखकर विद्या और लेखीराम अचानक से खुश होने लगते है, जैसे उन्हें मनचाहा वरदान मिल गया हो... उनका बेटा अरूण जो होश में आ गया था। 

विद्या को समझते देर न लगती है...कि ऊपर से पानी कहाँ से आया.....वह तुरंत उठकर देखती है....दरवाजे के चैखट के ऊपर चिड़ियों के जल पात्र को आड़ा पड़ा देखती है...उसके आस-पास काफी सारी चिड़िया बैठी है.....उसे ग्लानि होने लगती है....और याद आता है....वह घोंसला जिसे विद्या ने कचरा समझकर फंेक दिया था और उसमें चिड़िया के अण्डे थे।


कहानी- चिड़िया

लेखक - डाॅ. मोहन बैरागी


कहानी - अंतिम तर्पण आनलाईन

 कहानी  

अंतिम तर्पण आनलाईन

शमशान घाट के हर चबुतरे पर लाशें जल रही हैं, कुछ लाशें खाली पड़ी जगहों पर जल रहीं हैं तो कुछ के अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है,  घाट पर खडे लोग इंतज़ार में हैं कि कुछ चबुतरे खाली हो तो दुसरी लाशों का अंतिम संस्कार हो सके। विडंबना कि मरने के बाद भी सुकून से जलना नसीब नहीं इन लाशों को....? शहर के हर शमशान की यही हालत हैं....भरे पड़े हैं लाशों से...? लाशों से उठते धुएं से आसमान भर गया और आँखों में धुंध सा धुंआ लेकर भीषण गर्मी में माथे पर सफेद कपड़ा लपेटे बनियान व धोती पहने मुख्य शमशान घाट में एक चबुतरे पर बिखरी पड़ी राख में अस्थियां ढुंढते हुए विजय की आँखों से अकस्मात आँसू झरने लगे, भीतर की संवेदना उमड़कर बाहर आ रही है, मस्तिष्क में विचारों का समंदर तैर रहा है, जैसे दुनिया सिर्फ गारे, मिट्टी की और अंतिम सत्य यही है, क्यूं न मैं भी इसमें समा जाऊ..? यह चबुतरे की राख और मैं एकाकार होकर सदैव साथ रहें। शरीर बिल्कूल सुस्त सा....! मानो सिर्फ हाड़-मांस का पिंजड़ा हो..? कुछ इस तरह की हालत में एक-एक कर छोटी अस्थियों को स्टील के लोटे में डालते हुए उसके मन को पहाड़ सी पीड़ा घेर रखा था, हो भी क्यों न...? ये अस्थियां उसकी स्वर्गवासी माँ की थी, जिसकों गुज़रे अभी तीन दिन ही हुए थे। सबसे बड़ा बेटा होने के नाते विजय ने ही माँ की चिता को मुखाग्नि दी थी। कोई दो सप्ताह अस्पताल में बीमारी से जंग लड़ने के बाद माँ की मौत महामारी की वजह से हुई थी। विजय का दुःख तब और बड़ा हो गया जब रह रह कर बार-बार उसके ज़हन में ख्याल आ रहा था कि किस तरह अस्पताल में पलंग उपलब्ध नहीं था, शहर के सारे अस्पताल मरीजों से भरे पड़े थे..? तब अपने प्रभाव और पहचान का इस्तेमाल करते हुए मिनिस्टर के फोन लगाने पर अस्पताल में एक अदद पंलग मिल पाया था। प्रकृति का मज़ाक या प्रकृति से किये मज़ाक का परिणाम है कि सारी दुनिया इस समय महामारी की चपेट में....और हालत इतनी भयावह कि अस्पतालों में मरीजों के लिए जगह नहीं, मौतें इतनी की शमशान में अंतिम संस्कार के लिए जगह नहीं.....इस विकट समय में झुझते हुए इससे लड़ने के सिवा करें भी तो क्या...? पास खड़े दो छोटे भाई और साथ आये चाचा भी रूंवासे से चबुतरे के पास आकर अस्थियां बिनने में विजय की मदद करते हुए कहने लगे...बस....बस...कुछ खास अस्थियां ही चुनना है....बाकी राख समेटकर नदी में प्रवाहित करना पड़ेगी....जल्दी करों.....और लोग खड़े है....कितनी लाशे पड़ी हैं अंतिम संस्कार के लिए....? चलो, पंडित जी इंतज़ार कर रहे हैं घाट पर पिण्डदान और दुसरी अंतिम क्रिया करना है! विजय एक हाथ से लोटे को पकड़े अपनी धोती संभालते हुए चबुतरे से विलग होने की मुद्रा में होता है....लेकिन अंतरआत्मा उसे बार-बार कह रही हो जैसे कि अपनी माँ को यूँ छोड़कर न जा...? अगले पल खुद को संभालते हुए वह कहता है...चलो....और क्या सामान चाहिये पंडित जी को सब लाये हैं न...?, आटा...नारियल.....तेल...पत्ते....दीपक...अगरबत्ती...और जो भी लगना है...? विजय अपने दोनो छोटे भाई और चाचा के साथ शमशान घाट से नदी किनारे दुसरे घाट की और चल दिये कि तभी विजय के मोबाईल की घंटी बजती है। ट्रिन...ट्रिन....ट्रिन...ट्रिन... हेलो...., हाँ कौन....?, ‘‘मैं पंडित अनिल त्रिवेदी बोल रहा हूँ....यजमान आपकी माताजी का तर्पण नदी के घाट पर नहीं किया जा सकता....? कलेक्टर साहब के नये आदेश आए हैं.....सभी पंंिडतों को घाट पर कोई भी क्रियाविधी करने को मना किया गया है...? महामारी का हवाला देकर घरों से निकलने को रोका जा रहा हैं..? घाटों पर पुलिस का पहरा लगा दिया है...अब आप ही बताएं यजमान.....क्या किया जाये...?‘‘, ‘‘विजय चैंककर बोला.., क्या इसका कोई उपाय नहीं...?‘‘, ‘‘पंडित अनिल त्रिवेदी ने जवाब दिया.....क्या कलेक्टर और सरकार के फरमान का उल्लंघन करंेगे यजमान...?‘‘ देखा नहीं...? पुलिस घाट से पंडितों को उठा-उठाकर कैसे अपराधियों जैसे गाड़ी में ठूंसकर जेल भेज रही है.....? यजमान...ये तो जीते जी, हमारे तर्पण हो जाने जैसी स्थिति हो गई है.....? कुछ चिंता के भाव लेकर फिर बोला....आप चिंता न किजिये....पहले आप यहाँ आईये तो....! फिर कोई विचार कर रास्ता निकालते है। तभी विजय के छोटा भाई बोल पड़ा...रास्त क्या निकालेंगे.....माँ का तर्पण करना है...ये कोई तानाशाही है क्या...? हम अपनी माँ के तर्पण की क्रिया मुख्य घाट पर ही करेंगे...जहाँ करते हैं..! विजय भैय्या....देखो तो...ये भी कोई बात हुई..? विजय के मन में तो जैसे विरक्ति ने वास कर लिया था...? एक तो माँ से अत्यधिक लगाव और उस पर मौत के बाद की परेशानियाँ, मुश्किल भरा अंतिम संस्कार और अब तर्पण की क्रिया के लिए भी मनाही...? उदास मन से छोटे भाई को प्रतिक्रिया देते हुए....तु रूक मैं बात करता हँू कलेक्टर साहब से...। तर्पण करने वाले घाट की और जाते हुए चलते-चलते विजय के एक हाथ में लोटे मंे माँ की अस्थियाँ तो दुसरे हाथ से मोबाईल निकालकर कलेक्टर को काॅल लगाने कि कोशिश.....! ट्रिन....ट्रिन, ट्रिन...ट्रिन....

साथ चल रहे....चाचा और दोनों छोटे भाईयों ने कुछ गुस्से से पुछा.....?, क्या हुआ....कलेक्टर साहब मोबाईल नहीं उठा रहे....? उनका गुस्सा स्वाभाविक भी था। लेकिन सरकारी फरमान मानना भी जरूरी था....! महामारी भी एैसी फैली कि....न ठीक से जीने दे रही और न मरने के बाद सुकून ही नसीब...? तभी नासमझी का पर्दा आँखों से हटाते हुए चाचा ने कहा....विजय मंत्री जी को फोन लगाओ.....उन्हीं से कहो....माँ के अंतिम तर्पण की क्रिया करना है.....तो क्या करें...? विजय ने भी हाँ में अपना मुँह हिलाते हुए कहा...हम्म्म...! और दुसरा नंबर मंत्री जो डायल किया.....। ट्रिन...ट्रिन, ट्रिन....ट्रिन....उधर से मंत्री जी के पीए ने फोन उठाया....।

हैलो.....कौन....?

मैं विजय बोल रहा हँ...मंत्री जी से बात करवा दो अर्जेंट है...?

हां....एक मिनट, मंत्री जी दुसरे फोन पर हैं...अभी करवाता हँू...तभी मंत्री जी का मूंह अपने पीए की तरफ होता है और पुछते हैं...कौन है...?

जी....विजय जी है....आपसे अर्जेंट बात करना चाहते है....? 

लाओ.....मंत्री जी ने हाथ में मोबाईल लेकर.....हाँ, हेलो....बोलो विजय....क्या बात है.....

भैय्या....वो...माँ के तर्पण कि क्रिया करना है और महामारी की वजह से नदी के सभी घाट पर प्रतिबंध लगाया हुआ कलेक्टर साहब ने....प्लिज आप उनको बोल दिजिये......बस दस मिनट की क्रिया करना हैं....भैय्या कम से कम मरने के बाद कि ये क्रिया तो पुरी होना चाहिये....?

मंत्री जी,......ओह....क्या करें....महामारी ही ऐसी आई है...कि सभी जगह कई सारे प्रतिबंध लगाये गये है....फिर भी मैं एक बार कलेक्टर से बात करता हँू। 

जी भैय्या...।

उधर मंत्री जी ने कलेक्टर को फोन लगाया और......हैलो......कलेक्टर साहब....मंत्री बोल रहा हँू.....

ये मेरे परिवार के हैं विजय जी....इनकी माँ का देहावसान हुआ है और तर्पण वाली प्रक्रिया करना है.....घाट पर इन्हें रोका जा रहा है....क्या कोई प्रतिबंध लगाया हैं आपने...?

जी सर, एक्चुअली.....सरकारी आदेश है....मंत्रालय से नाटीफिकेशन सभी जिलों के कलेक्टर्स को पालनार्थ आएं है.....महामारी एक्ट के अंतर्गत.....एैसी सभी गतिविधियां बद कर दी जायें, जहां लोग एकत्रित होते हैं....इसलिए प्रतिबंध लगाया है सभी घाटों पर....।

मंत्री जी...., ओह....तो अब इसका क्या उपाय....मरने के बाद व्यक्ति इस क्रिया से भी वंचित रहेगा क्या...?

कलेक्टर...., नहीं...मंत्री जी आप उन्हें कहें कि ज्यादा भीड़ इकट्ठी न करें और ज्यादा गंदगी भी न करें...कम से कम आवश्यक सामग्री का ही उपयोग करें....और पंडित आनलाईन यह प्रक्रिया करवा सकता है...?

मंत्री जी..., ठीक है...नमस्कारकृ।

कलेक्टर का फोन बंद होते ही मंत्री जी ने अपने पीए को विजय को फोन लगाने को कहा।

हेलो....विजय भैय्या....मंत्री जी बात करेंगे....! 

हाँ, विजय....मैने कलेक्टर से बात की....हालत गंभीर हैं और मंत्रालय के आदेश हैं....महामारी की वजह से किसी को भी ऐसी किसी भी गतिविधी के लिए अनुमति नहीं दी जा रही है....तुम एक काम करों...पंिडत से कहो.....की मोबाईल पर विडियो काॅल से आनलाईन सारी प्रक्रिया करवा दे..?

विजय...., जी भैय्या....!

विजय तुरंत फोन कट करता है और पंडित को फोन लगाकर आनलाईन विडियों काॅल से प्रक्रिया करवाने को कहता हैं....। लेकिन उसके मन में हज़ार सवाल खड़े होने लगते हैं.....क्या एैसे आनलाईन तर्पण करने से किसी को मुक्ति मिलती है...? जब व्यक्ति आनलाईन पैदा भी नहीं होता....आनलाईन मरता भी नहीं....तो आनलाईन तर्पण से मुक्ति कैसे...?

विजय अपने छोटे भाईयों और चाचा के साथ चुपचाप घाट की और चल पड़ता है यह सोचते हुए कि ईश्वर किसी को ऐसी मौत न दे...? जन्म देने वाली माँ को ही जब मुक्ति नहीं दे सकते तो फिर हमकों कैसे मुक्ति मिलेगी।


कहानी- अंतिम तर्पण आनलाईन

लेखक - डाॅ. मोहन बैरागी


Sunday, August 23, 2020


धुंध बिखरी हर तरफ ये, छटने लगेगा कब अंधेरा
सांस बोझिल हो चली अब, कौन जाने कब सवेरा

हमने अपने ही गले में बांध रस्सी एक ली है
खुरदुरी सी है, समझते इसको हम रेशमी है
बने हम जान के दुश्मन अपनी ही धरा पर
संकटों ने मौत के हमको यहाँ फिर से घेरा
कौन जाने कब सवेरा......

दी प्रकृति ने धरा पर नेमते कितनी हमें
शुद्ध वायु, जल यहाँ और किमती सांसे
पेट भरने खाते रहे हम जानवरों को
रूष्ट होकर देख लो इसने है मुँह फेरा
पेट भरने के लिए धरती उगलती बीज
कौन जाने कब सवेरा.......

सभ्यता है मनुष्य की क्या यहीं सिखलाती
क्रोध में जब रोद्र प्रृकति रूप है दिखलाती
फिर उपतजी मौत के सामान भी देख लो
इक सदी में सार्स, ईबोला, और कोरोना
कौन जाने कब सवेरा.....

हारती है हमेशा मनुष्यता से हमेशा त्रासदी
जीत ही लेंगे सभी हम भयानक इस सदी को
होगा प्रकृति के विरूद्ध नहीं बस साथ चलना
देखिये फिर लगेगा हर तरफ खुशियों का डेरा
कौन जाने कब सेवरा.........
डॉ. मोहन बैरागी
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2. 02/03/2020
गज़ल -
अर्धसत्य और धुंध-धुंधलके, छोड़ो इनसे होगा क्या
जुड़े रहें क्युँ हम भ्रम से, छोड़ो इनसे होगा क्या

कोरोना का रोना लेकर, बैठे रहना ठीक नहीं
एक नया सुर्योदय होगा, छोड़ो इनसे होगा क्या

पोहा पार्टी, वाटर, हाला, फिर से जमेगी मधुशाला
लॉकडाउन या घरबंदी, छोड़ो इनसे होगा क्या

फिर गुँजेंगे गान दिशा में, फिर गीतों का मौसम
रोक सका क्या युग को कोई, छोड़ो इनसे होगा क्या

गीत कहेंगे वे सब अब तो, समय को जिसने भोगा क्या
आने वाले हैं फिर ‘मोहन‘, छोड़ो इनसे होगा क्या
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3. गीत 05/04/2020
छीप जलाओ मन के भीतर
कर दो चारो ओर उजाला

विषधर समय खड़ा है सम्मुख
ज़हरीले कंटक पथ बिखरे हैं
कठिन परीक्षा देना होगी
नीलकण्ठ ने पिया ज्यूँ हाला
कर दो चारो ओर उजाला

खींच युग की फिर प्रत्यंचा
बान प्रीत के छोड़ने होंगे
मन भीतर ये सब हैं बसते
मंदिर, मस्जिद और शिवाला

गया वक्त तो बीत गया फिर
उसको याद करें हम कैसे
अवशेषों के आराधन से
तिमिर नहीं हटने वाला
कर दो चारो ओर उजाला

आओ साथी साथ चले कुछ
पथ एैसे तैयार करो तुम, मैं कुछ
सबके घर दीवारें दर रोशन हों
बने नहीं कोई मकड़ी जाला
कर दो चारो ओर उजाला

दीप जलाओ मन के भीतर
कर दो चारो ओर उजाला...
डॉ. मोहन बैरागी
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18/04/20
कविता
होने को तो सब हैं, आंगन, देहरी, धूप-छाँव
कमरे, खिड़की, दरवाजे, फटी ऐड़िया चलते पाँव
सुंदर फूलों के गमले भी हैं, टंगी दीवार घड़ी एक
सोफा, बेड, ड्रेसिंग, डायनिंग टेबल भी बड़ी एक
गुसलख़ाने में शॉवर, छत पर टीवी का टॉवर भी है!
कुछ किताबें पढ़ने को, अपने ख़ालीपन से लड़ने को
फिर भी कोई एकाकी-पन सा मन भीतर में पलता है!
शायद ईक तेरा ना होना ही मन को खलता है!
जीवन जैसे-तैसे चलता है.....

और सुनों, हाँ!, मेरे पास मन बहलाने को मोबाईल भी है।
बरबाद करने को हर दिन चौबीस घंटे का समय पुरा है।
उचटी हुई नींद, रात, और मच्छर भगाने की क्वाईल भी है।
दिन में खुली आँख के सपने, हर रात एक ख़्वाब अधुरा है।
रिश्ते, नातेदार सभी हैं! हँसना चेहरे का बरकरार अभी है!
अच्छा-खासा बिज़नेस, कुर्ता, कोट, पेंट, टाई और मफलर
अपना कोई नहीं इन सब में लगता जैसे ये बेकार सभी है!
हर रोज़ उगे बस एैसे ही सूरज, शाम एैसे ही ढलता है।
जीवन जैसे-तैसे चलता है....
एक तेरा ना होना ही मन को........

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3. गीत  14/04/2020
तितली के रंगबिरंगे रंगों सी
बगिया के फलों की खुशबू सी लगती हो
तुम कुछ कुछ ऐसी लगती हो

एकाकी मन की भटकन, शोर शराबा धड़कन का
उम्मीदों के उजले दर्पन, मोती आँख के आंगन का
तोरन द्वार बंधे हो जैसे, तुम सतिया हो अंर्तमन का
घूप्प अंधेरे कमरे में तुम, चकाचौंध बिजली सी लगती हो
तुम कुछ कुछ ऐसी लगती हो.....

पाने खोने के असमंजस में, जीवन जीने के ढांढस में
धरती पर आशाओं के बीज रहे जो खेतों के अंतस में
जोड़ी बैल, गाय एक और बारिश की बूंदे जो पावस में
अल्हड़ हो तुम रेशम की चादर बुनती सी लगती हो
तुम कुछ कुछ ऐसी लगती हो.....

हरी घास की नरमाई, शीतल छांव की परछाई
बोले सबकुछ बिन बोले जो दर्पन में दिखलाई सी
थककर नींद हुई हो पुरी, भोर उनिंदी अलसाई सी
लक्ष्मी का रूप ज्यूँ बिटिया, नटखट नन्हीं सी लगती हो
तुम कुछ कुछ ऐसी लगती हो......

माँ की आँखों के सपने तुम, बाबा की एैनक तुम हो
त्यौहारों के उत्सव तुम हो, उल्लासो में रौनक तुम हो
घर-भर की खुशियाँ तुम, सुंदर कितनी मोहक तुम हो
गागर लेकर निकली कोई पनिहारिन देसी लगती हो
तुम कुछ कुछ ऐसी लगती हो......

आलिंदों में हृदय निलय के, सुर साधे हैं तुम्ही ने लय के
मुझको मुस्कानें तेरी लगती, जैसे घुमे हरदम धरा वलय के
बाहर-भीतर के हर भाषा, भाव सभी एहसासो में तुम हो
चंचल-हिरनी, पगली तुम ना जाने कैसी-कैसी लगती हो
तुम कुछ कुछ ऐसी लगती हो......
डॉ. मोहन बैरागी
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5. गीत  08/05/2020
यह समय कितना विषैला, फासला है बंधनों का
गीत लिखना भी कठिन अब कोई अभिनंदनों का

चिलचिलाती धुप यहाँ पिछे पड़ी है
शांति की बेला ओट लेकर के खड़ी है                
द्वारा सारे बंद हुए उल्लास के देखो
माह गायब हो गये मधुमास के देखो

क्या विवशता आ पड़ी क्या मोल है अब नंदनो का
क्या अमीरी क्या गरीबी दृश्य अब बस क्रंदनो का

है नहीं पराजित इस समर में जिंदगी के
सत्य भी है मानते, ढो रहे शव आदमी के
हुआ समय बीमार कंटिली हो गई है हवा भी
धैर्य ही उपचार होगा, धैर्य ही इसकी दवा भी

देह से लिपटा है सर्प अपनी गंध लेकर चंदनो का
पोछ लेंगे आँख के आँसु, वक्त आयेगा वंदनों का
डॉ. मोहन बैरागी
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गीत
8/5/20
आँसू स्वर में गाते अपने
इस दुनिया से भारी मन है

कोलाहल क्या खूब मचा
ये मेरी सिसकी एकल ही
सन्नाटे बाहर शोर मचाते
कर्कश आवाजे बेकल सी
चित्र के टुकड़े बिखरे मेरे
कितना विस्तारी दर्पन है
आँसू स्वर में.....

नयन सपन से खाली खाली
सुखी शाखे देखो सुखी डाली
भौंरा, तितली, कोयल, कागा
तोड़ रहा कोई प्रेम का धागा
मीठे बोल तड़पते मन भीतर
लगता दो अधरो में अनबन है
आँसू स्वर में......

किंचित सिंचित बैसाखी और
सावन सुखा सुखा सा लगता
उजले दिन खाकर अंधियारा
भीतर बाहर दिनभर जगता
जीवन हुआ हो पतझड़ जैसे
जैसे केवल इतिहासो में मधुबन है
आँसू स्वर में.......
डॉ. मोहन बैरागी
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कविता -कोरोना महामारी की वजह से देशभर में पलायन कर रहे मजदुरो के हक में

22/5/2020
तपती,झुलसाती तीखी धूप,
और सामने अंधेरा घुप।
बौराये आम, गर्मी में मन भी बौराया।
घर जाने को सड़क नापना,
मेरे हिस्से आया।
दो जून की रोटी पाने, विस्थापन था!
भूखे पेट अंतड़िया सुनती
पास जो मेरे ज्ञापन था।
मिलों पार खड़ा मेरा घर
आवाजे देता मुझको,
वादा करके आया था मैं,
चोखट,दरवाजों, छप्पर,
बूढ़ी माँ, पत्नी और बच्चों से।
पापी पेट की भूख मिटाने
भेजता रहूंगा, पैसे, जैसे-तैसे
लेकिन अब नही काम बनता
क्या लिखा तूने ओ नियंता?
पसीने की बूंदे बेचकर...
कमा लेता था कुछ रुपया
क्या यह समय की त्रासदी,
अब पसीने का मोल नहीं..!
पसीना तो अब भी बह रहा है...
मिलों सड़क नाप कर घर जाने में।
क्यों, इतना मजबूर हूँ..?
क्योकि शायद..
मैं मजदूर हूँ।
ौडॉ. मोहन बैरागी
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08
06/जुन/2020
गीत
सुंदर फूल खिले
सबका फूलवारी मन
जाने कौन गली में
ठहरे दरबारी मन

बूंदे बरखा सांसे तिनका
तिनका ओस लपेटा हो
सॉंसों से नाता जिनका
मद्धम सांसे गर महकाये तो
समझो हुआ षिकारी मन
जाने कौन गली.......

गॉंव बसे कई नयनों में
भाषा बोली एक तरफ
और रहे कोई चयनों में
प्रीत किसी से हो जाये तो
गाता सिर्फ मुरारी मन
जाने कौन गली.......

मन से मन का मिलना हो
बिन देखे, बिन जाने भी ये
कंवल अगर जो खिलना हो
बिना बात कोई मुस्काये तो
मन पर चली ज्यों आरी मन
जाने कौन गली......
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09
16/जुन/2020
गीत
इस बेढंगी दुनिया में, जीना आसान नहीं है
बाकी सब इसमें लेकिन कोई इंसान नहीं है

रोम छिद्र में तन्हाई बसती
ऑंखें होंठो संग हैं हंसती
बस्ती खाली अरमानों की
कौन दिषा बहती कष्ती
धारा निरंतर बहती, इसका अवसान नहीं है
बाकी सब इसमें लेकिन कोई इंसान नहीं है

जाने क्या चाहता अपना मन
क्या मिलता क्या जाता छूट
कैसे घर करता भीतर भीतर
जाने कब खुषियॉं जाती रूठ

उपर ओढे रहते, ये भीतर की मुस्कान नहीं है
बाकी सब है इसमें लेकिन कोई इंसान नहीं है

सबको खुष करते जाना है
उसकी खुषी देखेगा कौन
बांटा सबको हरदम लेकिन
हैं अपनी बारी पर सब मौन

जिंदा लोगों की बस्ती है, ये ष्मसान नहीं है
बाकी सब है इसमें लेकिन कोई इंसान नहीं है
संदर्भः- बालीवुड अभिनेता सुंषात सिंह राजपुत की आत्महत्या प्रकरण पर
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गीत 15/05/2020
शब्द सारे जो मुखर हैं,
भाव जिनके कुछ प्रखर हैं
वेदना जो कह न पाये,
शब्द केवल शब्द भर है
जो प्रकाशित ही हुए ना, पृष्ठ सारे जाँच लेना
आँख में उतरे जो आँसू, तुम हदय से बांच लेना

रातरानी स्वप्न लेकर
यामिनी संग आयेगी
यह कंटिली गंध भी
देह, दामिनी झुलसाएगी
टुटकर बिखरे जो दर्पण, तुम महज एक काँच लेना
आँख में उतरे जो आँसू, तुम हदय से बांच लेना

मन पराजित, सब पराजित
ध्येय चाहे जो हो लक्षित
ढूंढकर उपमान सारे
जो किये थे हम ने चयनित
क्या बजे अब धुन कोई, इन्हीं संग क्या नाच लेना
आँख में उतरे जो आँसू, तुम हदय से बांच लेना
डॉ. मोहन बैरागी
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गीत  16/07/2020

नागफनी सा जीवन इसमें
अमरबेल खिलेगी कैसे
चुभते कांटों तुम ही कहो यह
अंधियारी रात कटेगी कैसे
पर्वत खुशीयों का छोटा है पर
तिमिर का साया बडा हुआ है
हल्के बादल उपर उडते जाए
काला धुंआ नीचे खडा हुआ है

पतझारों का झुरमुट लिपटे तन से
फिर आंचल धूल झरेगी कैसे
अंधियारी रात .........

रीती प्यास घडे की मिटटी सुन री
मिलते बर्तन हर घर बनजे वाले
बता किस आकार ढलेगी अब तू
तू मुझसे हम तुझसे सजने वाले

सुखी मिटटी हो लेकर खडे कुम्हारा
मिटटी कोई घडा घडेगी कैसे
अंधियारी रात.......

गेंहू की बाली के पार का सुरज
जाकर फिर आएगा भोर लिये
उम्मीदों को बांध रहे आंचल में
सुबह के कुछ सपने और लिए

लेकिन नियति लिखने वाले बोलो
यह मुश्किल शाम ढलेगी कैसे
अंधियारी रात.....
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गीत 06/07/2020
धुप के पांव से नापता मैं डगर
रास्ते मिल रहे मंजिलें ना मगर

है तपिश को लिए रेत ही रेत बस
सुखी नदियां सूखे कहीं खेत बस
भाग्य रेखा हथेली में दिखती नहीं
उम्र करती रही जिंदगी से बहस
खत्म होते कभी फासले जो अगर
धूप के पांव से नापता मै डगर
रास्ते मिल रहे........

कई अबोले रहे शब्द ही आंख में
फिर भी दुनियां समेरे रहे पांख में
हे गिरना वो पडना संभलना कभी
दो चार दस अकेले नहीं लाख में
जाने कितना है लंबा ये लंबा सफर
धूप के पांव से नापता में डगर
रास्ते मिल रहे.........

जगमगाहट जरा पार जाने भी दो
कैद में रोशनी बांधना कब तलक
हौंसलों की उडाने कभी कम न हो
तोड दो दूरियां ये जीम वो फलक
जुगनूओं से उजाले कर लो बसर
धूप के पांव से नापता में डगर
रास्ते मिल रहे.........
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गीत 04/07/2020
आए कितने राह में रोडे
मुश्किल वक्त के कान मरोडे

तपते जीवन से कुंदन बनकर
निखरो निकलोगे बनठन कर
मेहनतकश लोगों सा तनपर
उठते है तो उठने दो फोडे
आए कितने राह में रोडे
मुश्किल वक्त...........

पानी जैसा सरल ही रहना
बाधाओं से कुछ न कहना
गर सागर सा बनना है तो
कतरा कतरा कर जोडे
आए कितने राह में रोडे
मुश्किल वक्त.......

आज नही ंतो कल अपना है
देखा जागते जो, वो सपना है
थकना नहीं बस चलते जाना
सफर खत्म गर रूके जो थोडे
आए कितने राह में रोडे
मुश्किल वक्त........
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गीत 02/07/2020
शाख से कोई पत्ता टूटा
सावन जैसे मुझसे रूठा
काम न आया मैं बागो के
छींटे पडे हो जो दागों के

भटक रहा मैं, बीन मंजिल के
मैं विस्थापित हूॅं....., मैं अभिशापित हूॅं.....

कोर पे आया जो आंखों की
तन्हा आंसू गीला होकर
देख बतलाये किसको अपना
ये बेचारा खुद रो रोकर

कह देने पर भी, कह ना पाया
ऐसे ज्ञापित हूॅं... मैं अभिशापित हूॅं...

जान सका न मुझकों कोई
सब उम्मीदें भीतर थी बोई
कहता किसकों मैं अपना
मेरा हुआ न कोई सपना

दर्द तुम्हारा, रहा तुम संग ही ना
ऐसे व्यापित हूॅं....मैं अभिशापित हूॅं...
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गजल 26/06/2020
मुझसे मेरे होने का सबूत चाहती है।
नादान मुहब्बत, ये क्या चाहती है।

कारोबार न घर, चूल्हे हैं बूझे हुए।
सियासत न जाने ये क्या चाहती है।

तुफान,तबाही,टिडिडया,कोरोन सब।
दिखा रही गरीबी ये क्या चाहती है।

बुक्काफाड हंसी,चीखना चिल्लाना।
खामोशी सिवा इसके क्या चाहती है।

सरकार फरमान,मौत पर दस बीस।
मौत चार कांधे, और क्या चाहती है।

हर सदी की ये त्रासदी दुनिया मोहन।
प्रकृति देकर लेती, और क्या चाहती है।
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26/07/2020
कविता-  
‘एकांत‘
भीड़ में एकांत
मनुष्य
माँ के गर्भ में
या मृत्यु शय्या पर
एकांत
जन्म से लेकर
बचपन, जवानी, बुढ़ापा
हर तरफ भीड़
संबधों की
किंतु स्वयं
एकांत
कलरव,
चीखती आवाज़े
ओढ़े नक़ाब,
दाएं-बाएं
मंडराती
आलिंगन,
आवाहन
नागफनी लिपटे
फुलों का
स्पर्श
क्षणिक सुख
देता
जीवनपर्यन्त
भीतर
हमसे
प्रेमालाप करता
एकांत
डॉ. मोहन बैरागी
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27/07/2020
कविता- ‘लकीर‘
दो हिस्सों में विभक्त करती
रोशनी और अंधेरे के मध्य
साँझ की लकीर
सुख और दूःख के बीच
महीन लकीर
नदी और तट के बीच
पानी और प्यास को बांटती
लकीर
लकीर ही तो है,
जो खिंचकर
धर लेती कोई भी
आकार
और लचीली होकर
गढ़ लेती लगभग
तिकोना हदय
जिसमें बसता
प्रेम
डॉ. मोहन बैरागी
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18/8/2020
गीत
थीरकन भीगी अधरों पर
सिहरन भीगी सांसों में
गीत छुआ क्या तुमने मेरा
मन वीणा के तार बजे है...!

रात गुजरती करवट लेते
नींद गयी है किसे ब्याहने
तकिये चादर से बाते करता
अभी सुबह के चार बजे है...!

मादकता आंखों के द्वारे
इन पर कितने दिल हारे
धमनी और शिराएं सारी
जाने कितनी बार बजे है...!

कंपित कंपित देह रश्मियां
मधु बरसता आंलिगन में
खुद बाहों में खुद को लेकर
घंटी मंदिर द्वार बजे है...!