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Wednesday, September 16, 2026

कंबोडिया एवं थाईलैंड अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 2026, अक्षर वार्ता एवं कृष्ण बसंती अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका का आयोजन, दक्षिण-पूर्वी एशिया की संस्कृति, परम्पराएँ, साहित्य और लिपि : परस्पर सांस्कृतिक संबंध

कंबोडिया के अंकोरवाट, रॉयल पैलेस, अप्सरा नृत्य और जीनोसाइड म्यूजियम के संदर्भ में एक प्रत्यक्ष अध्ययन

लेखक : डॉ. मोहन बैरागी






किसी देश को समझने के लिए उसके वर्तमान नगरों और बाजारों को देखना पर्याप्त नहीं होता। उसकी वास्तविक पहचान तक पहुँचने के लिए उसके मंदिरों की दीवारों पर उकेरे गए आख्यानों को पढ़ना पड़ता है, उसके राजप्रासाद की स्थापत्य-भाषा को समझना पड़ता है, उसके नृत्य में जीवित स्मृतियों को महसूस करना पड़ता है और कभी-कभी उन अँधेरे कमरों में भी प्रवेश करना पड़ता है जहाँ उसका इतिहास अपनी सबसे पीड़ादायक स्मृतियों के साथ मौन खड़ा होता है। कंबोडिया का मेरा विगत दिवस का अध्ययन-भ्रमण मेरे लिए कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। अंकोरवाट, रॉयल पैलेस, अप्सरा और अन्य पारम्परिक नृत्य तथा तुओल स्लेंग जीनोसाइड म्यूजियम—ये चारों देखने में अलग-अलग संसार प्रतीत होते हैं, किंतु इनके बीच खमेर सभ्यता की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा छिपी हुई है।

अंकोरवाट के निकट पहुँचते हुए सबसे पहले उसकी विशालता नहीं, बल्कि उसका क्षितिज पर धीरे-धीरे उभरना मन को प्रभावित करता है। दूर से दिखाई देने वाले उसके शिखर जैसे-जैसे समीप आते हैं, वैसे-वैसे यह अनुभूति गहरी होती जाती है कि हम केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि पत्थरों में सुरक्षित एक सभ्यता के बीच प्रवेश कर रहे हैं। अंकोर पुरातात्त्विक क्षेत्र लगभग 400 वर्ग किलोमीटर में फैला है और नौवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के खमेर साम्राज्य की विभिन्न राजधानियों, मंदिरों, जलाशयों, नहरों और अन्य संरचनाओं को समेटे हुए है। यूनेस्को इसे दक्षिण-पूर्वी एशिया के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक क्षेत्रों में मानता है।

अंकोरवाट को भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से देखते हुए एक विचित्र आत्मीयता अनुभव होती है। मंदिर का मूल धार्मिक संदर्भ विष्णु से जुड़ा था और इसकी स्थापत्य योजना, प्रतीक तथा शिल्प भारतीय धार्मिक अवधारणाओं से संवाद करते दिखाई देते हैं। किंतु इसे केवल भारतीय स्थापत्य की प्रतिकृति समझना खमेर सभ्यता की मौलिकता को कम करके देखना होगा। यूनेस्को भी रेखांकित करता है कि खमेर वास्तुकला ने भारतीय उपमहाद्वीप से प्रेरणा ग्रहण करने के बाद अपनी विशिष्ट विशेषताओं का विकास किया और अंततः एक स्वतंत्र कलात्मक क्षितिज निर्मित किया।

मंदिर की दीर्घाओं में आगे बढ़ते हुए पत्थर अचानक किसी पुस्तक के पृष्ठ जैसे लगने लगते हैं। दीवारों पर उत्कीर्ण आकृतियाँ, देवता, युद्ध-दृश्य, पौराणिक प्रसंग और अप्सराएँ उस काल के धार्मिक संसार के साथ तत्कालीन समाज की सौंदर्य-दृष्टि को भी प्रकट करते हैं। यहाँ इतिहास लिखा कम और तराशा अधिक गया है। किसी प्रतिमा के सामने कुछ क्षण ठहरने पर लगता है कि शिल्पकार ने केवल शरीर नहीं बनाया, उसने मुद्रा के भीतर कोई कथा छोड़ दी है।

यहीं से कंबोडिया की अप्सरा परम्परा को समझने का एक दूसरा द्वार खुलता है। अंकोर की दीवारों की अप्सराओं को देखने के बाद जब कंबोडियाई शास्त्रीय नृत्य की जीवित अप्सरा सामने आती है, तब पत्थर और मनुष्य के बीच सदियों का अंतर जैसे क्षण भर के लिए समाप्त हो जाता है। प्रस्तर में स्थिर हाथ की मुद्रा मंच पर गति ग्रहण करती है; पत्थर का मुकुट जीवित नर्तकी के सिर पर दिखाई देने लगता है और सदियों पहले अंकित सौंदर्य-बोध संगीत और शरीर की भाषा में वर्तमान से जुड़ जाता है।

कंबोडिया का रॉयल बैले, जिसे खमेर शास्त्रीय नृत्य भी कहा जाता है, खमेर राजदरबार से एक हजार वर्ष से अधिक समय से संबद्ध रहा है। इसके नृत्यों की हस्त-मुद्राएँ, वेशभूषा, पात्र-विन्यास और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियाँ इसकी विशिष्ट पहचान हैं। यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया है। इसकी परम्परा में स्त्री, पुरुष, दैत्य और वानर जैसे अलग-अलग चरित्र-वर्ग भी हैं और उनकी मुद्राएँ तथा वेशभूषा कथा को दृश्य भाषा प्रदान करती हैं।

इस नृत्य को केवल मनोरंजन कहना इसलिए उचित नहीं होगा। यह चलती-फिरती सांस्कृतिक स्मृति है। अंकोरवाट की दीवारों पर जो सौंदर्य पत्थर में सुरक्षित है, उसी सांस्कृतिक चेतना की अनुगूँज कंबोडिया के शास्त्रीय नृत्य में शरीर और गति के माध्यम से सुनाई देती है।

इस दृष्टि से कंबोडिया के साहित्य को भी साथ पढ़ना आवश्यक हो जाता है। यहाँ भारतीय रामकथा ने स्थानीय जीवन में प्रवेश करके अपनी विशिष्ट खमेर अभिव्यक्ति ‘रीमकेर’ (Reamker) विकसित की। यूनेस्को के दस्तावेजों में इसे रामायण की खमेर व्याख्या के रूप में दर्ज किया गया है। खमेर छाया-नाट्य स्बेक थोम में रीमकेर के प्रसंगों को विशाल चमड़े की आकृतियों, नृत्य, वाद्य-संगीत और कथावाचन के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।

यही वह बिंदु है जहाँ संस्कृति का परस्पर संबंध अपने सबसे सार्थक अर्थ में प्रकट होता है। एक कथा किसी दूसरी भूमि तक जाती है, पर वहाँ जाकर स्वयं को थोपती नहीं है। नया समाज उसे अपनी भाषा देता है, अपने पात्रों की अनुभूति देता है, अपनी कलात्मक शैली देता है और फिर वही कथा उस देश की अपनी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन जाती है। इसलिए कंबोडिया में रामकथा को देखकर केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि यहाँ भारतीय संस्कृति का प्रभाव है; अधिक उपयुक्त यह कहना होगा कि यहाँ भारतीय और खमेर सांस्कृतिक परम्पराओं के दीर्घ संवाद से एक विशिष्ट कंबोडियाई अभिव्यक्ति निर्मित हुई।

कंबोडिया की लिपि भी इस सांस्कृतिक संवाद का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है। आधुनिक खमेर लिपि का ऐतिहासिक संबंध दक्षिण भारतीय ब्राह्मी परम्परा से है और आरम्भिक अभिलेखों में दक्षिण भारत की पल्लव लिपि से उल्लेखनीय समानता मिलती है। किंतु खमेर लिपि लगभग चौदह शताब्दियों से अपना स्वतंत्र स्वरूप विकसित कर चुकी है। इसी प्रकार खमेर भाषा ने संस्कृत और पाली से पर्याप्त शब्दावली ग्रहण की। इस प्रकार कंबोडिया में स्थापत्य से लेकर साहित्य और लिपि तक सांस्कृतिक संपर्क की अलग-अलग परतें दिखाई देती हैं।

अंकोरवाट से निकलकर जब अध्ययन नोम पेन्ह के रॉयल पैलेस तक पहुँचता है, तब समय जैसे अचानक कई शताब्दियाँ आगे बढ़ जाता है। अंकोर जहाँ प्राचीन खमेर साम्राज्य की विराट स्मृति है, वहीं रॉयल पैलेस वर्तमान कंबोडिया में जीवित राजकीय परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है। राजा नोरोडोम द्वारा राजधानी को 1866 में नोम पेन्ह स्थानांतरित करने के बाद वर्तमान स्थल पर राजमहल का विकास हुआ। यह आज भी कंबोडिया के सम्राट का राजकीय निवास है; इसलिए इसका पूरा परिसर संग्रहालय नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा आज भी सक्रिय राजकीय क्षेत्र है।

राजमहल के परिसर में प्रवेश करते हुए सुनहरे और खमेर स्थापत्य से युक्त शिखर, सुव्यवस्थित प्रांगण और धार्मिक प्रतीकों की उपस्थिति सत्ता को केवल राजनीतिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परम्परा के एक हिस्से के रूप में सामने लाती है। समीप स्थित सिल्वर पैगोडा इस अनुभव को धार्मिक आयाम देता है। उसके चारों ओर की दीवारों पर रीमकेर से संबंधित चित्रांकन भी साहित्य, धर्म और राजपरम्परा को एक-दूसरे से जोड़ता है।

इसलिए अंकोरवाट और रॉयल पैलेस का तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक निष्कर्ष देता है। अंकोरवाट सत्ता के प्राचीन वैभव की स्मृति है, जबकि रॉयल पैलेस राजपरम्परा की वर्तमान निरन्तरता है। एक के पत्थरों पर समय के लगभग नौ सौ वर्षों के चिह्न दिखाई देते हैं, दूसरे में परम्परा आज भी सांस लेती दिखाई देती है। दोनों के बीच बदलते धर्म, राजनीति, स्थापत्य और समाज का लंबा इतिहास है, फिर भी खमेर सांस्कृतिक पहचान का सूत्र टूटता नहीं है।

लेकिन कंबोडिया को यदि हम केवल अंकोरवाट के भव्य शिखरों, राजप्रासाद की चमक और अप्सरा की सौम्य मुद्राओं से समझकर लौट आएँ, तो हमने इस देश का आधा इतिहास ही देखा।

कंबोडिया की आत्मा का दूसरा, अत्यन्त पीड़ादायक पक्ष तुओल स्लेंग जीनोसाइड म्यूजियम में सामने आता है।

नोम पेन्ह के सामान्य शहरी परिवेश के बीच स्थित इस परिसर में प्रवेश करते ही अनुभव की प्रकृति बदल जाती है। यहाँ अंकोरवाट जैसी स्थापत्य भव्यता नहीं है। सामने साधारण-सी बहुमंजिला इमारतें और एक प्रांगण है। और शायद उसकी भयावहता इसी सामान्यता में छिपी है—क्योंकि यह स्थान मूलतः एक विद्यालय था। खमेर रूज शासन के दौरान इसी पूर्व विद्यालय को कुख्यात S-21 कारागार और पूछताछ केंद्र में बदल दिया गया था। इसके भवन, सामूहिक और व्यक्तिगत कोठरियाँ तथा उस समय के अभिलेख और वस्तुएँ आज भी संरक्षित हैं।

जब दर्शक उन गलियारों से गुजरता है तो यहाँ इतिहास किसी राजा या विजेता की कथा नहीं सुनाता। वह उन सामान्य मनुष्यों के चेहरे सामने रखता है जिन्हें कभी कैदी बनाकर यहाँ लाया गया था। तुओल स्लेंग के अभिलेखागार में पाँच हजार से अधिक कैदियों के छायाचित्रों सहित पूछताछ और जीवनी-संबंधी दस्तावेज सुरक्षित हैं। यूनेस्को के अनुसार इस पूर्व S-21 केंद्र में 15,000 से अधिक बंदियों को रखे जाने का अनुमान है और उनमें से केवल बहुत थोड़े लोग जीवित बच सके। इस अभिलेखागार को 2009 में यूनेस्को के Memory of the World Register में दर्ज किया गया।

दीवारों पर लगे उन चेहरों को देखते हुए संग्रहालय और इतिहास-पुस्तक के बीच का अंतर समाप्त होने लगता है। किसी चित्र में एक युवा चेहरा है, कहीं वृद्ध व्यक्ति, कहीं स्त्री—और प्रत्येक तस्वीर जैसे दर्शक से एक ही मौन प्रश्न करती है कि विचारधारा और सत्ता की क्रूरता मनुष्य को आखिर कहाँ तक ले जा सकती है।

यहीं आकर कंबोडिया के सांस्कृतिक अध्ययन को एक नया अर्थ मिलता है।

एक ओर अंकोरवाट है—जहाँ मनुष्य ने पत्थर को काटकर देवत्व, सौंदर्य और शाश्वतता की कल्पना निर्मित की। दूसरी ओर तुओल स्लेंग है—जहाँ बीसवीं शताब्दी में मनुष्य के विरुद्ध मनुष्य की संगठित हिंसा का दस्तावेज सुरक्षित है। एक स्थल बताता है कि मनुष्य सृजन की कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है; दूसरा चेतावनी देता है कि वही मनुष्य विनाश की कितनी गहराई तक गिर सकता है।

इन दोनों के बीच रॉयल पैलेस और अप्सरा नृत्य को रखें तो कंबोडिया का इतिहास किसी सीधी रेखा की तरह नहीं बल्कि स्मृतियों की अनेक परतों के रूप में दिखाई देता है—साम्राज्य, धर्म, कला, राजसत्ता, औपनिवेशिक युग, हिंसा, विनाश और फिर सांस्कृतिक पुनर्निर्माण।

इसमें अप्सरा नृत्य का पुनर्जीवन विशेष अर्थ ग्रहण करता है। खमेर रूज के दमनकारी दौर में रॉयल बैले लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गया था और बड़ी संख्या में गुरु कलाकार तथा संगीतकार मारे गए। 1979 के बाद जीवित कलाकारों ने फिर से समूह बनाए और प्राचीन नृत्य-परम्परा को पुनर्जीवित किया। इसी तरह स्बेक थोम छाया-नाट्य को भी खमेर रूज काल में लगभग नष्ट कर दिया गया था, किंतु बचे हुए कलाकारों के प्रयासों से उसका पुनरुद्धार हुआ।

इस तथ्य के बाद अप्सरा का नृत्य केवल सुंदर नृत्य नहीं रह जाता। नर्तकी की उठती हुई हथेली, धीरे घूमती उँगलियाँ और नियंत्रित पदचाप एक सभ्यता की जीवित रहने की जिद का प्रतीक बनने लगती हैं। जीनोसाइड म्यूजियम में जिन वर्षों की विनाशक स्मृति दिखाई देती है, उन्हीं के बाद उसी समाज द्वारा अपने नृत्य, संगीत, साहित्य और रंगमंच को फिर से जीवित करना सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का असाधारण उदाहरण है।

तुओल स्लेंग को अब केवल राष्ट्रीय संग्रहालय के रूप में भी नहीं देखा जा सकता। यह M-13 और चोएंग एक के साथ उन Cambodian Memorial Sites का हिस्सा है जिन्हें यूनेस्को ने खमेर रूज काल के दमन, कारावास, यातना और हत्या की व्यवस्था के साक्ष्य तथा स्मृति, शिक्षा और शांति के स्थलों के रूप में मान्यता दी है।

मेरे लिए इस अध्ययन-भ्रमण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष इसी विरोधाभास में निहित है। अंकोरवाट को देखकर कंबोडिया का गौरव समझ में आता है, रॉयल पैलेस को देखकर उसकी परम्परा, अप्सरा को देखकर उसकी सांस्कृतिक आत्मा और जीनोसाइड म्यूजियम को देखकर उसकी पीड़ा। इनमें से किसी एक को हटाकर कंबोडिया को पूर्णतः समझना कठिन है।

अंकोरवाट में पत्थर बोलते हैं। रॉयल पैलेस में परम्परा बोलती है। अप्सरा के नृत्य में देह और मुद्राएँ बोलती हैं। जीनोसाइड म्यूजियम में तस्वीरें और खाली कमरे बोलते हैं। आश्चर्य यह है कि इन चारों की भाषा अलग होने के बावजूद अंततः वे एक ही देश की कथा कहते हैं।

और जब इस यात्रा के बाद कंबोडिया की सड़क पर पुनः सामान्य जीवन दिखाई देता है—बाजार खुले हैं, बच्चे दिखाई देते हैं, लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हैं और नई इमारतों के बीच पुराने मंदिर अब भी खड़े हैं—तब समझ में आता है कि किसी संस्कृति की वास्तविक शक्ति केवल इस बात में नहीं होती कि उसने कितना वैभव अर्जित किया, बल्कि इस बात में भी होती है कि विनाश और त्रासदी के बाद वह स्वयं को कितना पुनर्सृजित कर पाती है।

कंबोडिया इसी अर्थ में देखने का नहीं, पढ़ने का देश है। अंकोरवाट उसका प्राचीन महाकाव्य है, रीमकेर उसकी साहित्यिक स्मृति है, खमेर लिपि उसकी बौद्धिक निरन्तरता है, रॉयल पैलेस उसकी जीवित राजपरम्परा है, अप्सरा उसका सौंदर्यबोध है और तुओल स्लेंग उसकी वह करुण ऐतिहासिक टिप्पणी है जिसे मानवता को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए।

इन सभी को एक साथ देखने के बाद कंबोडिया हमारे सामने केवल पर्यटन-स्थल के रूप में नहीं रहता। वह सभ्यता, सृजन, सांस्कृतिक संवाद, त्रासदी, स्मृति और पुनरुत्थान की एक खुली हुई पुस्तक बन जाता है—और शायद यही किसी अध्ययन-यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।