Dr.Mohan Bairagi

Wednesday, September 16, 2026

कंबोडिया एवं थाईलैंड अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 2026, अक्षर वार्ता एवं कृष्ण बसंती अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका का आयोजन, दक्षिण-पूर्वी एशिया की संस्कृति, परम्पराएँ, साहित्य और लिपि : परस्पर सांस्कृतिक संबंध

कंबोडिया के अंकोरवाट, रॉयल पैलेस, अप्सरा नृत्य और जीनोसाइड म्यूजियम के संदर्भ में एक प्रत्यक्ष अध्ययन

लेखक : डॉ. मोहन बैरागी






किसी देश को समझने के लिए उसके वर्तमान नगरों और बाजारों को देखना पर्याप्त नहीं होता। उसकी वास्तविक पहचान तक पहुँचने के लिए उसके मंदिरों की दीवारों पर उकेरे गए आख्यानों को पढ़ना पड़ता है, उसके राजप्रासाद की स्थापत्य-भाषा को समझना पड़ता है, उसके नृत्य में जीवित स्मृतियों को महसूस करना पड़ता है और कभी-कभी उन अँधेरे कमरों में भी प्रवेश करना पड़ता है जहाँ उसका इतिहास अपनी सबसे पीड़ादायक स्मृतियों के साथ मौन खड़ा होता है। कंबोडिया का मेरा विगत दिवस का अध्ययन-भ्रमण मेरे लिए कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। अंकोरवाट, रॉयल पैलेस, अप्सरा और अन्य पारम्परिक नृत्य तथा तुओल स्लेंग जीनोसाइड म्यूजियम—ये चारों देखने में अलग-अलग संसार प्रतीत होते हैं, किंतु इनके बीच खमेर सभ्यता की एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा छिपी हुई है।

अंकोरवाट के निकट पहुँचते हुए सबसे पहले उसकी विशालता नहीं, बल्कि उसका क्षितिज पर धीरे-धीरे उभरना मन को प्रभावित करता है। दूर से दिखाई देने वाले उसके शिखर जैसे-जैसे समीप आते हैं, वैसे-वैसे यह अनुभूति गहरी होती जाती है कि हम केवल एक प्राचीन मंदिर नहीं, बल्कि पत्थरों में सुरक्षित एक सभ्यता के बीच प्रवेश कर रहे हैं। अंकोर पुरातात्त्विक क्षेत्र लगभग 400 वर्ग किलोमीटर में फैला है और नौवीं से पंद्रहवीं शताब्दी के खमेर साम्राज्य की विभिन्न राजधानियों, मंदिरों, जलाशयों, नहरों और अन्य संरचनाओं को समेटे हुए है। यूनेस्को इसे दक्षिण-पूर्वी एशिया के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक क्षेत्रों में मानता है।

अंकोरवाट को भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि से देखते हुए एक विचित्र आत्मीयता अनुभव होती है। मंदिर का मूल धार्मिक संदर्भ विष्णु से जुड़ा था और इसकी स्थापत्य योजना, प्रतीक तथा शिल्प भारतीय धार्मिक अवधारणाओं से संवाद करते दिखाई देते हैं। किंतु इसे केवल भारतीय स्थापत्य की प्रतिकृति समझना खमेर सभ्यता की मौलिकता को कम करके देखना होगा। यूनेस्को भी रेखांकित करता है कि खमेर वास्तुकला ने भारतीय उपमहाद्वीप से प्रेरणा ग्रहण करने के बाद अपनी विशिष्ट विशेषताओं का विकास किया और अंततः एक स्वतंत्र कलात्मक क्षितिज निर्मित किया।

मंदिर की दीर्घाओं में आगे बढ़ते हुए पत्थर अचानक किसी पुस्तक के पृष्ठ जैसे लगने लगते हैं। दीवारों पर उत्कीर्ण आकृतियाँ, देवता, युद्ध-दृश्य, पौराणिक प्रसंग और अप्सराएँ उस काल के धार्मिक संसार के साथ तत्कालीन समाज की सौंदर्य-दृष्टि को भी प्रकट करते हैं। यहाँ इतिहास लिखा कम और तराशा अधिक गया है। किसी प्रतिमा के सामने कुछ क्षण ठहरने पर लगता है कि शिल्पकार ने केवल शरीर नहीं बनाया, उसने मुद्रा के भीतर कोई कथा छोड़ दी है।

यहीं से कंबोडिया की अप्सरा परम्परा को समझने का एक दूसरा द्वार खुलता है। अंकोर की दीवारों की अप्सराओं को देखने के बाद जब कंबोडियाई शास्त्रीय नृत्य की जीवित अप्सरा सामने आती है, तब पत्थर और मनुष्य के बीच सदियों का अंतर जैसे क्षण भर के लिए समाप्त हो जाता है। प्रस्तर में स्थिर हाथ की मुद्रा मंच पर गति ग्रहण करती है; पत्थर का मुकुट जीवित नर्तकी के सिर पर दिखाई देने लगता है और सदियों पहले अंकित सौंदर्य-बोध संगीत और शरीर की भाषा में वर्तमान से जुड़ जाता है।

कंबोडिया का रॉयल बैले, जिसे खमेर शास्त्रीय नृत्य भी कहा जाता है, खमेर राजदरबार से एक हजार वर्ष से अधिक समय से संबद्ध रहा है। इसके नृत्यों की हस्त-मुद्राएँ, वेशभूषा, पात्र-विन्यास और प्रतीकात्मक अभिव्यक्तियाँ इसकी विशिष्ट पहचान हैं। यूनेस्को ने इसे मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया है। इसकी परम्परा में स्त्री, पुरुष, दैत्य और वानर जैसे अलग-अलग चरित्र-वर्ग भी हैं और उनकी मुद्राएँ तथा वेशभूषा कथा को दृश्य भाषा प्रदान करती हैं।

इस नृत्य को केवल मनोरंजन कहना इसलिए उचित नहीं होगा। यह चलती-फिरती सांस्कृतिक स्मृति है। अंकोरवाट की दीवारों पर जो सौंदर्य पत्थर में सुरक्षित है, उसी सांस्कृतिक चेतना की अनुगूँज कंबोडिया के शास्त्रीय नृत्य में शरीर और गति के माध्यम से सुनाई देती है।

इस दृष्टि से कंबोडिया के साहित्य को भी साथ पढ़ना आवश्यक हो जाता है। यहाँ भारतीय रामकथा ने स्थानीय जीवन में प्रवेश करके अपनी विशिष्ट खमेर अभिव्यक्ति ‘रीमकेर’ (Reamker) विकसित की। यूनेस्को के दस्तावेजों में इसे रामायण की खमेर व्याख्या के रूप में दर्ज किया गया है। खमेर छाया-नाट्य स्बेक थोम में रीमकेर के प्रसंगों को विशाल चमड़े की आकृतियों, नृत्य, वाद्य-संगीत और कथावाचन के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।

यही वह बिंदु है जहाँ संस्कृति का परस्पर संबंध अपने सबसे सार्थक अर्थ में प्रकट होता है। एक कथा किसी दूसरी भूमि तक जाती है, पर वहाँ जाकर स्वयं को थोपती नहीं है। नया समाज उसे अपनी भाषा देता है, अपने पात्रों की अनुभूति देता है, अपनी कलात्मक शैली देता है और फिर वही कथा उस देश की अपनी सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा बन जाती है। इसलिए कंबोडिया में रामकथा को देखकर केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि यहाँ भारतीय संस्कृति का प्रभाव है; अधिक उपयुक्त यह कहना होगा कि यहाँ भारतीय और खमेर सांस्कृतिक परम्पराओं के दीर्घ संवाद से एक विशिष्ट कंबोडियाई अभिव्यक्ति निर्मित हुई।

कंबोडिया की लिपि भी इस सांस्कृतिक संवाद का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है। आधुनिक खमेर लिपि का ऐतिहासिक संबंध दक्षिण भारतीय ब्राह्मी परम्परा से है और आरम्भिक अभिलेखों में दक्षिण भारत की पल्लव लिपि से उल्लेखनीय समानता मिलती है। किंतु खमेर लिपि लगभग चौदह शताब्दियों से अपना स्वतंत्र स्वरूप विकसित कर चुकी है। इसी प्रकार खमेर भाषा ने संस्कृत और पाली से पर्याप्त शब्दावली ग्रहण की। इस प्रकार कंबोडिया में स्थापत्य से लेकर साहित्य और लिपि तक सांस्कृतिक संपर्क की अलग-अलग परतें दिखाई देती हैं।

अंकोरवाट से निकलकर जब अध्ययन नोम पेन्ह के रॉयल पैलेस तक पहुँचता है, तब समय जैसे अचानक कई शताब्दियाँ आगे बढ़ जाता है। अंकोर जहाँ प्राचीन खमेर साम्राज्य की विराट स्मृति है, वहीं रॉयल पैलेस वर्तमान कंबोडिया में जीवित राजकीय परम्परा का प्रतिनिधित्व करता है। राजा नोरोडोम द्वारा राजधानी को 1866 में नोम पेन्ह स्थानांतरित करने के बाद वर्तमान स्थल पर राजमहल का विकास हुआ। यह आज भी कंबोडिया के सम्राट का राजकीय निवास है; इसलिए इसका पूरा परिसर संग्रहालय नहीं, बल्कि उसका एक हिस्सा आज भी सक्रिय राजकीय क्षेत्र है।

राजमहल के परिसर में प्रवेश करते हुए सुनहरे और खमेर स्थापत्य से युक्त शिखर, सुव्यवस्थित प्रांगण और धार्मिक प्रतीकों की उपस्थिति सत्ता को केवल राजनीतिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परम्परा के एक हिस्से के रूप में सामने लाती है। समीप स्थित सिल्वर पैगोडा इस अनुभव को धार्मिक आयाम देता है। उसके चारों ओर की दीवारों पर रीमकेर से संबंधित चित्रांकन भी साहित्य, धर्म और राजपरम्परा को एक-दूसरे से जोड़ता है।

इसलिए अंकोरवाट और रॉयल पैलेस का तुलनात्मक अध्ययन बहुत रोचक निष्कर्ष देता है। अंकोरवाट सत्ता के प्राचीन वैभव की स्मृति है, जबकि रॉयल पैलेस राजपरम्परा की वर्तमान निरन्तरता है। एक के पत्थरों पर समय के लगभग नौ सौ वर्षों के चिह्न दिखाई देते हैं, दूसरे में परम्परा आज भी सांस लेती दिखाई देती है। दोनों के बीच बदलते धर्म, राजनीति, स्थापत्य और समाज का लंबा इतिहास है, फिर भी खमेर सांस्कृतिक पहचान का सूत्र टूटता नहीं है।

लेकिन कंबोडिया को यदि हम केवल अंकोरवाट के भव्य शिखरों, राजप्रासाद की चमक और अप्सरा की सौम्य मुद्राओं से समझकर लौट आएँ, तो हमने इस देश का आधा इतिहास ही देखा।

कंबोडिया की आत्मा का दूसरा, अत्यन्त पीड़ादायक पक्ष तुओल स्लेंग जीनोसाइड म्यूजियम में सामने आता है।

नोम पेन्ह के सामान्य शहरी परिवेश के बीच स्थित इस परिसर में प्रवेश करते ही अनुभव की प्रकृति बदल जाती है। यहाँ अंकोरवाट जैसी स्थापत्य भव्यता नहीं है। सामने साधारण-सी बहुमंजिला इमारतें और एक प्रांगण है। और शायद उसकी भयावहता इसी सामान्यता में छिपी है—क्योंकि यह स्थान मूलतः एक विद्यालय था। खमेर रूज शासन के दौरान इसी पूर्व विद्यालय को कुख्यात S-21 कारागार और पूछताछ केंद्र में बदल दिया गया था। इसके भवन, सामूहिक और व्यक्तिगत कोठरियाँ तथा उस समय के अभिलेख और वस्तुएँ आज भी संरक्षित हैं।

जब दर्शक उन गलियारों से गुजरता है तो यहाँ इतिहास किसी राजा या विजेता की कथा नहीं सुनाता। वह उन सामान्य मनुष्यों के चेहरे सामने रखता है जिन्हें कभी कैदी बनाकर यहाँ लाया गया था। तुओल स्लेंग के अभिलेखागार में पाँच हजार से अधिक कैदियों के छायाचित्रों सहित पूछताछ और जीवनी-संबंधी दस्तावेज सुरक्षित हैं। यूनेस्को के अनुसार इस पूर्व S-21 केंद्र में 15,000 से अधिक बंदियों को रखे जाने का अनुमान है और उनमें से केवल बहुत थोड़े लोग जीवित बच सके। इस अभिलेखागार को 2009 में यूनेस्को के Memory of the World Register में दर्ज किया गया।

दीवारों पर लगे उन चेहरों को देखते हुए संग्रहालय और इतिहास-पुस्तक के बीच का अंतर समाप्त होने लगता है। किसी चित्र में एक युवा चेहरा है, कहीं वृद्ध व्यक्ति, कहीं स्त्री—और प्रत्येक तस्वीर जैसे दर्शक से एक ही मौन प्रश्न करती है कि विचारधारा और सत्ता की क्रूरता मनुष्य को आखिर कहाँ तक ले जा सकती है।

यहीं आकर कंबोडिया के सांस्कृतिक अध्ययन को एक नया अर्थ मिलता है।

एक ओर अंकोरवाट है—जहाँ मनुष्य ने पत्थर को काटकर देवत्व, सौंदर्य और शाश्वतता की कल्पना निर्मित की। दूसरी ओर तुओल स्लेंग है—जहाँ बीसवीं शताब्दी में मनुष्य के विरुद्ध मनुष्य की संगठित हिंसा का दस्तावेज सुरक्षित है। एक स्थल बताता है कि मनुष्य सृजन की कितनी ऊँचाई तक पहुँच सकता है; दूसरा चेतावनी देता है कि वही मनुष्य विनाश की कितनी गहराई तक गिर सकता है।

इन दोनों के बीच रॉयल पैलेस और अप्सरा नृत्य को रखें तो कंबोडिया का इतिहास किसी सीधी रेखा की तरह नहीं बल्कि स्मृतियों की अनेक परतों के रूप में दिखाई देता है—साम्राज्य, धर्म, कला, राजसत्ता, औपनिवेशिक युग, हिंसा, विनाश और फिर सांस्कृतिक पुनर्निर्माण।

इसमें अप्सरा नृत्य का पुनर्जीवन विशेष अर्थ ग्रहण करता है। खमेर रूज के दमनकारी दौर में रॉयल बैले लगभग समाप्त होने की स्थिति में पहुँच गया था और बड़ी संख्या में गुरु कलाकार तथा संगीतकार मारे गए। 1979 के बाद जीवित कलाकारों ने फिर से समूह बनाए और प्राचीन नृत्य-परम्परा को पुनर्जीवित किया। इसी तरह स्बेक थोम छाया-नाट्य को भी खमेर रूज काल में लगभग नष्ट कर दिया गया था, किंतु बचे हुए कलाकारों के प्रयासों से उसका पुनरुद्धार हुआ।

इस तथ्य के बाद अप्सरा का नृत्य केवल सुंदर नृत्य नहीं रह जाता। नर्तकी की उठती हुई हथेली, धीरे घूमती उँगलियाँ और नियंत्रित पदचाप एक सभ्यता की जीवित रहने की जिद का प्रतीक बनने लगती हैं। जीनोसाइड म्यूजियम में जिन वर्षों की विनाशक स्मृति दिखाई देती है, उन्हीं के बाद उसी समाज द्वारा अपने नृत्य, संगीत, साहित्य और रंगमंच को फिर से जीवित करना सांस्कृतिक पुनर्निर्माण का असाधारण उदाहरण है।

तुओल स्लेंग को अब केवल राष्ट्रीय संग्रहालय के रूप में भी नहीं देखा जा सकता। यह M-13 और चोएंग एक के साथ उन Cambodian Memorial Sites का हिस्सा है जिन्हें यूनेस्को ने खमेर रूज काल के दमन, कारावास, यातना और हत्या की व्यवस्था के साक्ष्य तथा स्मृति, शिक्षा और शांति के स्थलों के रूप में मान्यता दी है।

मेरे लिए इस अध्ययन-भ्रमण का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष इसी विरोधाभास में निहित है। अंकोरवाट को देखकर कंबोडिया का गौरव समझ में आता है, रॉयल पैलेस को देखकर उसकी परम्परा, अप्सरा को देखकर उसकी सांस्कृतिक आत्मा और जीनोसाइड म्यूजियम को देखकर उसकी पीड़ा। इनमें से किसी एक को हटाकर कंबोडिया को पूर्णतः समझना कठिन है।

अंकोरवाट में पत्थर बोलते हैं। रॉयल पैलेस में परम्परा बोलती है। अप्सरा के नृत्य में देह और मुद्राएँ बोलती हैं। जीनोसाइड म्यूजियम में तस्वीरें और खाली कमरे बोलते हैं। आश्चर्य यह है कि इन चारों की भाषा अलग होने के बावजूद अंततः वे एक ही देश की कथा कहते हैं।

और जब इस यात्रा के बाद कंबोडिया की सड़क पर पुनः सामान्य जीवन दिखाई देता है—बाजार खुले हैं, बच्चे दिखाई देते हैं, लोग अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हैं और नई इमारतों के बीच पुराने मंदिर अब भी खड़े हैं—तब समझ में आता है कि किसी संस्कृति की वास्तविक शक्ति केवल इस बात में नहीं होती कि उसने कितना वैभव अर्जित किया, बल्कि इस बात में भी होती है कि विनाश और त्रासदी के बाद वह स्वयं को कितना पुनर्सृजित कर पाती है।

कंबोडिया इसी अर्थ में देखने का नहीं, पढ़ने का देश है। अंकोरवाट उसका प्राचीन महाकाव्य है, रीमकेर उसकी साहित्यिक स्मृति है, खमेर लिपि उसकी बौद्धिक निरन्तरता है, रॉयल पैलेस उसकी जीवित राजपरम्परा है, अप्सरा उसका सौंदर्यबोध है और तुओल स्लेंग उसकी वह करुण ऐतिहासिक टिप्पणी है जिसे मानवता को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए।

इन सभी को एक साथ देखने के बाद कंबोडिया हमारे सामने केवल पर्यटन-स्थल के रूप में नहीं रहता। वह सभ्यता, सृजन, सांस्कृतिक संवाद, त्रासदी, स्मृति और पुनरुत्थान की एक खुली हुई पुस्तक बन जाता है—और शायद यही किसी अध्ययन-यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

Sunday, June 14, 2026

जीवन की त्रिज्या : केंद्र से परिधि तक मनुष्य की अनंत यात्रा

 

जीवन की त्रिज्या : केंद्र से परिधि तक मनुष्य की अनंत यात्रा


लेखक - डॉ. मोहन बैरागी 



कहा जाता है कि संसार की सबसे बड़ी खोज अमेरिका की खोज नहीं थी, न गुरुत्वाकर्षण की खोज थी, न बिजली की खोज थी। संसार की सबसे बड़ी खोज मनुष्य द्वारा स्वयं को खोजने की खोज थी। विडंबना यह है कि हजारों वर्षों की सभ्यता, विज्ञान, दर्शन और प्रौद्योगिकी के बाद भी मनुष्य आज तक स्वयं को पूरी तरह नहीं खोज पाया है। वह चंद्रमा तक पहुँच गया, मंगल ग्रह तक यान भेज दिया, समुद्र की गहराइयों को माप लिया, परमाणु को तोड़ दिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना ली, लेकिन अपने ही मन की गहराई को नहीं माप सका।

यहीं से "जीवन की त्रिज्या" का दर्शन प्रारंभ होता है।

गणित हमें बताता है कि वृत्त का अस्तित्व उसकी त्रिज्या पर निर्भर करता है। त्रिज्या न हो तो वृत्त नहीं बन सकता। केंद्र और परिधि के बीच जो अदृश्य संबंध है, वही त्रिज्या है। यदि इस सरल गणितीय तथ्य को जीवन पर लागू करें तो एक अद्भुत दर्शन हमारे सामने खुलता है।

जीवन भी एक वृत्त है।

उसका एक केंद्र है और एक परिधि।

केंद्र है—आत्मा, चेतना, विवेक, संवेदना, अंतर्मन।

परिधि है—धन, पद, परिवार, समाज, सत्ता, प्रेम, संघर्ष, उपलब्धियाँ, असफलताएँ और जीवन के समस्त बाहरी अनुभव।

इन दोनों को जोड़ने वाली रेखा ही जीवन की त्रिज्या है।

समस्या तब शुरू होती है जब मनुष्य परिधि को ही जीवन समझ बैठता है और केंद्र को भूल जाता है।

आज का मनुष्य सुबह उठते ही मोबाइल देखता है। वह दुनिया की खबर जानना चाहता है, लेकिन अपने भीतर की खबर नहीं। उसे यह पता है कि शेयर बाजार ऊपर गया या नीचे, लेकिन यह नहीं पता कि उसके भीतर का संतुलन ऊपर जा रहा है या नीचे। वह हजारों लोगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन स्वयं से कटा हुआ है।

यह आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

मनुष्य ने संचार के साधन बढ़ाए हैं, संवाद की क्षमता नहीं।

घर बड़े बनाए हैं, परिवार छोटे कर लिए हैं।

जानकारी बढ़ाई है, समझ कम कर ली है।

परिधि बढ़ी है, केंद्र सिकुड़ गया है।

भारतीय दर्शन हजारों वर्षों से इसी संकट की ओर संकेत करता आया है।

उपनिषदों का समस्त चिंतन मनुष्य को उसके केंद्र तक पहुँचाने का प्रयास है। "तत्त्वमसि", "अहं ब्रह्मास्मि", "अयमात्मा ब्रह्म"—ये केवल दार्शनिक सूत्र नहीं हैं। ये मनुष्य को यह याद दिलाने वाले वाक्य हैं कि तुम्हारा वास्तविक अस्तित्व बाहर नहीं, भीतर है।

ऋषियों ने देखा कि मनुष्य बाहर की वस्तुओं के पीछे भागते-भागते स्वयं को खो देता है। इसलिए उन्होंने कहा कि जिस सत्य को तुम संसार में खोज रहे हो, वह तुम्हारे भीतर बैठा है।

यह विचार केवल भारतीय दर्शन तक सीमित नहीं है।

सुकरात ने कहा था—

"Know Thyself" अर्थात् स्वयं को जानो।

यह पश्चिमी दर्शन का सबसे प्रसिद्ध वाक्य है।

यदि ध्यान से देखें तो उपनिषदों का "आत्मानं विद्धि" और सुकरात का "Know Thyself" एक ही दिशा में संकेत करते हैं। दोनों मनुष्य को उसके केंद्र तक लौटने का निमंत्रण देते हैं।

लेकिन मनुष्य का स्वभाव विचित्र है।

वह अपने घर की चाबी खो जाए तो पूरा घर सिर पर उठा लेता है, लेकिन स्वयं को खो दे तो उसे पता भी नहीं चलता।

वह बैंक पासबुक संभालकर रखता है, लेकिन अपने मन की किताब कभी नहीं पढ़ता।

यही कारण है कि बाहरी समृद्धि के बावजूद आंतरिक रिक्तता बढ़ती जा रही है।

कबीर ने इसी विडंबना को एक पंक्ति में पकड़ लिया—

"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे वन माहि।"

हिरण अपनी नाभि में सुगंध लिए जंगलों में भटकता रहता है। मनुष्य भी उसी हिरण की तरह है। सुख भीतर है, लेकिन वह उसे वस्तुओं में खोजता है। शांति भीतर है, लेकिन वह उसे पदों में खोजता है। प्रेम भीतर है, लेकिन वह उसे प्रतिष्ठा में खोजता है।

जीवन की त्रिज्या का पहला सिद्धांत यही है कि परिधि की यात्रा तभी सार्थक है जब केंद्र से संबंध बना रहे।

भगवद्गीता में अर्जुन का संकट भी यही था। वह युद्धभूमि में खड़ा था। उसकी परिधि अस्त-व्यस्त हो गई थी। रिश्ते, कर्तव्य, नैतिकता, भावनाएँ—सब टकरा रहे थे। श्रीकृष्ण ने उसे बाहर का समाधान नहीं दिया। उन्होंने पहले उसके भीतर को व्यवस्थित किया।

गीता का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन की परिधि को ठीक करने से पहले केंद्र को स्थिर करना आवश्यक है।

क्योंकि केंद्र विचलित होगा तो निर्णय भी विचलित होंगे।

केंद्र स्थिर होगा तो तूफान में भी संतुलन बना रहेगा।

बुद्ध का जीवन भी जीवन की त्रिज्या का अद्भुत उदाहरण है।

राजमहल उनके लिए परिधि था। वैभव परिधि था। सत्ता परिधि थी। लेकिन उन्होंने देखा कि इन सबके बावजूद मनुष्य दुखी है। तब उन्होंने केंद्र की खोज प्रारंभ की।

बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ, वह किसी नई वस्तु की खोज नहीं थी। वह अपने ही केंद्र की पुनर्खोज थी।

इसलिए बुद्ध ने संसार छोड़ने का नहीं, मोह छोड़ने का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि दुख का कारण वस्तुएँ नहीं हैं, उनसे जुड़ी हमारी आसक्ति है।

यही त्रिज्या का दूसरा सिद्धांत है—परिधि में रहो, पर उसके दास मत बनो।

यहीं से साहित्य इस दर्शन को और अधिक मानवीय बना देता है।

तुलसीदास के राम केवल धार्मिक पात्र नहीं हैं। वे मर्यादा के केंद्र हैं। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, पर उनका केंद्र नहीं बदलता।

वनवास मिला, केंद्र नहीं बदला।

राज्य मिला, केंद्र नहीं बदला।

वियोग मिला, केंद्र नहीं बदला।

यही स्थिरता उन्हें कालजयी बनाती है।

सूरदास के कृष्ण प्रेम की ऐसी त्रिज्या रचते हैं जिसमें पूरा ब्रज समा जाता है।

मीरा अपने समय की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति हैं। उन्होंने परिधि की सारी सीमाएँ तोड़ दीं, लेकिन अपने केंद्र—कृष्ण प्रेम—को नहीं छोड़ा।

कबीर ने तो मानो जीवन की त्रिज्या का पूरा दर्शन ही कविता में लिख दिया।

वे पंडितों पर हँसते हैं, मुल्लाओं पर हँसते हैं, समाज पर हँसते हैं और सबसे अधिक मनुष्य की मूर्खताओं पर हँसते हैं।

क्यों?

क्योंकि उन्होंने देखा कि लोग परिधि के लिए लड़ रहे हैं और केंद्र को भूल चुके हैं।

आज भी दृश्य अलग नहीं है।

लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं लेकिन धर्म के मूल गुण—करुणा, प्रेम और सत्य—को भूल जाते हैं।

लोग राजनीति के लिए मित्रता तोड़ लेते हैं।

लोग संपत्ति के लिए भाई से शत्रु बन जाते हैं।

लोग अहंकार के लिए जीवनभर संबंध खोते रहते हैं।

यह सब परिधि का युद्ध है।

केंद्र का नहीं।

और जब परिधि केंद्र से कट जाती है, तब जीवन की त्रिज्या टूट जाती है।


...और शायद यहीं से जीवन की त्रिज्या का सबसे रोचक, सबसे मानवीय और सबसे व्यंग्यपूर्ण पक्ष आरंभ होता है। क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्य अपनी त्रिज्या बढ़ाने निकलता है, वैसे-वैसे उसे यह भ्रम भी होने लगता है कि वह स्वयं ही केंद्र है और संसार उसकी परिधि।

यहीं जीवन एक हल्की मुस्कान के साथ मनुष्य को देखता है।

पृथ्वी पर जितने भी महान साम्राज्य बने, वे सब इसी भ्रम में बने कि उनकी त्रिज्या अनंत है। मिस्र के फ़राओ, सिकंदर, चंगेज़ ख़ाँ, नेपोलियन, हिटलर—सभी ने अपने-अपने समय में समझा कि उनका वृत्त ही संसार का सबसे बड़ा वृत्त है। लेकिन इतिहास का व्यंग्य देखिए कि आज उनकी विशाल सेनाएँ इतिहास की पुस्तकों में कुछ पन्नों तक सिमट गई हैं। जिस व्यक्ति ने आधी दुनिया जीतने का स्वप्न देखा था, उसकी कब्र भी अंततः कुछ हाथ भूमि में ही समा गई।

कबीर शायद इसी विडंबना को देखकर हँस पड़े थे—

"माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहि।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहि॥"

यह दोहा केवल मृत्यु का बोध नहीं कराता, बल्कि मनुष्य की उस अहंकारी त्रिज्या पर भी व्यंग्य करता है जो स्वयं को ब्रह्मांड से बड़ा समझ बैठती है।

आधुनिक समय में यह व्यंग्य और भी मनोरंजक हो गया है। पहले मनुष्य गाँव का चौधरी बनकर संतुष्ट हो जाता था। अब वह सोशल मीडिया का सम्राट बनना चाहता है। पाँच सौ मित्र, पाँच हजार फॉलोअर और पचास हजार लाइक देखकर उसे लगता है कि उसकी त्रिज्या ब्रह्मांड तक पहुँच गई है। लेकिन वही व्यक्ति रात को अकेले कमरे में बैठा हुआ किसी के एक संदेश की प्रतीक्षा करता रहता है। यह आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा हास्य है कि दुनिया से जुड़े रहने की तकनीक बढ़ती गई और मनुष्य स्वयं से कटता गया।

हिंदी साहित्य ने इस मानवीय विडंबना को बहुत गहराई से समझा है। प्रेमचंद के होरी के पास न कोई सत्ता थी, न प्रतिष्ठा, न संपत्ति; लेकिन उसके जीवन की त्रिज्या इतनी बड़ी थी कि वह आज भी करोड़ों पाठकों की संवेदना का हिस्सा है। दूसरी ओर अनेक धनवान पात्र अपने समय में प्रसिद्ध रहे, लेकिन साहित्य ने उन्हें याद नहीं रखा। इसका कारण स्पष्ट है—साहित्य परिधि नहीं, त्रिज्या मापता है। वह यह नहीं देखता कि व्यक्ति कितना बड़ा था; वह यह देखता है कि उसकी मनुष्यता कितनी दूर तक फैली थी।

सूरदास के कृष्ण, तुलसी के राम, कबीर का निर्गुण ब्रह्म, मीरा का प्रेम—इन सबकी त्रिज्या समय और स्थान की सीमाओं को पार कर गई। पाँच सौ वर्ष बाद भी लोग उन्हें पढ़ते हैं, गाते हैं, याद करते हैं। दूसरी ओर उस समय के कितने ही राजा और सामंत इतिहास के अंधकार में खो गए। साहित्य का न्याय बड़ा विचित्र होता है। वह सिंहासन नहीं बचाता, संवेदना बचाता है।

यहाँ हरिशंकर परसाई याद आते हैं। यदि वे "जीवन की त्रिज्या" पर लिखते तो शायद कहते कि आज का आदमी अपनी त्रिज्या बढ़ाने के लिए इतना व्यस्त है कि उसे यह देखने की फुर्सत ही नहीं कि उसका केंद्र कहाँ है। वह स्वास्थ्य के लिए दौड़ता है, लेकिन तनाव साथ लेकर दौड़ता है। वह समय बचाने के लिए मशीनें खरीदता है, फिर उसी बचे हुए समय को मोबाइल पर नष्ट कर देता है। वह सुख खोजता है, लेकिन सुख मिलने के बाद भी चिंतित रहता है कि कहीं यह सुख कम न पड़ जाए। यह ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति कुआँ खोदकर पानी निकाल ले और फिर उसी पानी में डूबने लगे।

शरद जोशी होते तो शायद लिखते कि आधुनिक मनुष्य की त्रिज्या का नया नाम "नेटवर्क कवरेज" है। जहाँ तक सिग्नल पहुँच जाए, वहीं तक जीवन है। सिग्नल चला गया तो दर्शन भी चला गया, प्रेम भी चला गया और धैर्य भी चला गया। कभी-कभी लगता है कि बैटरी प्रतिशत और आत्मविश्वास प्रतिशत में कोई गहरा संबंध स्थापित हो चुका है।

लेकिन इन सब हास्यास्पद स्थितियों के बीच जीवन अपना गंभीर सत्य नहीं छोड़ता।

नीत्शे का अतिमानव, कामू का विद्रोही मनुष्य, गांधी का सत्याग्रही, विवेकानंद का आत्मविश्वासी युवक और आइंस्टीन का ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ संवेदनशील वैज्ञानिक—सभी अंततः हमें एक ही दिशा में ले जाते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की महानता उसकी उपलब्धियों में नहीं, उसके विस्तार में है। वह कितना धनवान है, यह महत्वपूर्ण नहीं; वह कितनों के जीवन में प्रकाश बन सका, यह महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि एक साधारण शिक्षक कभी-कभी किसी बड़े उद्योगपति से अधिक बड़ी त्रिज्या रखता है। एक माँ का प्रेम किसी साम्राज्य से बड़ा हो सकता है। एक लेखक का शब्द किसी सेना से अधिक दूर तक यात्रा कर सकता है। एक किसान का श्रम किसी मंत्री के भाषण से अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। संसार का गणित और जीवन का गणित एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

जीवन के इस पूरे विमर्श में सबसे सुंदर तथ्य यह है कि त्रिज्या बढ़ाने के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए केवल मनुष्य बने रहने की आवश्यकता होती है। करुणा, संवेदना, प्रेम, सह-अस्तित्व, क्षमा और आत्मबोध—ये जीवन की वास्तविक त्रिज्याएँ हैं। इन्हें बढ़ाने वाला व्यक्ति कभी छोटा नहीं रहता, चाहे उसके पास कोई पद हो या न हो।

अंततः जीवन का पूरा वृत्त एक अद्भुत व्यंग्य के साथ पूर्ण होता है। मनुष्य जन्म लेते समय खाली हाथ आता है और जाते समय भी खाली हाथ चला जाता है। बीच का पूरा जीवन वह संग्रह में लगा देता है। मकान, पद, प्रतिष्ठा, बैंक बैलेंस, प्रमाणपत्र, पुरस्कार—सब इकट्ठा करता रहता है। फिर एक दिन समय मुस्कराकर पूछता है—"यह सब ठीक है, पर तुम्हारी त्रिज्या कितनी थी?" अर्थात् तुम कितनी दूर तक मनुष्य बने रहे? कितनी दूर तक तुम्हारी करुणा पहुँची? कितनी दूर तक तुम्हारा प्रेम गया? कितनी दूर तक तुम्हारी स्मृति लोगों के जीवन में उजाला बन सकी?

और तब शायद मनुष्य को समझ में आता है कि जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार कोई सम्मान-पत्र नहीं, बल्कि किसी की आँखों में बची हुई वह कृतज्ञता है जो हमारे जाने के बाद भी जीवित रहती है।

इसलिए जीवन को यदि किसी एक सूत्र में बाँधना हो तो कहा जा सकता है कि जीवन न तो केवल केंद्र है, न केवल परिधि। जीवन केंद्र से परिधि तक की वह सतत यात्रा है जिसमें मनुष्य स्वयं को खोजते-खोजते समस्त मानवता तक पहुँचता है। यही यात्रा उसकी त्रिज्या है, यही उसका दर्शन है, यही उसका साहित्य है और यही उसका अंतिम सत्य।

और शायद इसी कारण संसार के सारे वृत्त एक दिन समाप्त हो जाते हैं, पर मनुष्यता की त्रिज्या कभी समाप्त नहीं होती। वह एक हृदय से दूसरे हृदय तक, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक पुस्तक से दूसरी पुस्तक तक और एक स्मृति से दूसरी स्मृति तक निरंतर फैलती रहती है। यही जीवन का सबसे सुंदर गणित है—जिसमें जोड़ते-जोड़ते व्यक्ति स्वयं मिट जाता है, पर उसकी त्रिज्या अमर हो जाती है।


लेखक - डॉ. मोहन बैरागी

Saturday, June 13, 2026

सभ्यता का सैल्फी स्टैंड : दर्पण से डरता मनुष्य और प्रदर्शन का युग

 सभ्यता का सेल्फी-स्टैंड : दर्पण से डरता मनुष्य और प्रदर्शन का युग



लेखक - डॉ. मोहन बैरागी 


मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि वह सोच सकता है, बल्कि यह है कि वह स्वयं को देख सकता है। वह केवल संसार को नहीं देखता, बल्कि स्वयं को भी देखता है। यही आत्मदृष्टि उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाती है। किंतु इतिहास का एक विचित्र मोड़ यह है कि जिस आत्मदृष्टि ने मनुष्य को ऋषि बनाया था, उसी आत्मदृष्टि की विकृत छाया ने उसे प्रदर्शनप्रिय भी बना दिया। आज का मनुष्य जितना स्वयं को देखना चाहता है, उससे कहीं अधिक वह चाहता है कि संसार उसे देखे। यह इच्छा नई नहीं है, परंतु आधुनिक तकनीक ने इसे अभूतपूर्व विस्तार दे दिया है। मोबाइल फोन, कैमरा और सोशल मीडिया ने मिलकर एक ऐसा युग निर्मित किया है जिसमें जीवन का मूल्य उसके अनुभव से नहीं, उसके प्रदर्शन से मापा जाने लगा है। इस युग का सबसे साधारण किंतु सबसे अर्थपूर्ण प्रतीक है—सेल्फी-स्टैंड।

पहली दृष्टि में सेल्फी-स्टैंड एक मामूली वस्तु है। कुछ लोहे या प्लास्टिक की छड़ों का संयोजन, जिसके सहारे मोबाइल को दूर रखकर तस्वीर ली जा सकती है। किंतु दर्शन का कार्य वस्तुओं के बाहरी रूप को देखना नहीं, उनके भीतर छिपे अर्थ को पहचानना है। जब हम सेल्फी-स्टैंड को एक प्रतीक की तरह देखते हैं, तब वह आधुनिक मनुष्य के मानस का दर्पण बन जाता है।

कभी मनुष्य अपने जीवन के अनुभवों को भीतर संजोता था। गाँव का कोई वृद्ध जब अपने युवाकाल की कथा सुनाता था, तो उसकी आँखों में स्मृतियों का पूरा संसार उतर आता था। वह किसी नदी, किसी पर्वत, किसी प्रेम या किसी पीड़ा को शब्दों में पुनर्जीवित कर देता था। आज स्मृतियों की जगह तस्वीरों ने ले ली है। अब लोग कहते हैं—“देखो, मैं वहाँ गया था।” वे अनुभव नहीं सुनाते, प्रमाण दिखाते हैं। मानो घटना का घटित होना पर्याप्त नहीं, उसका दृश्य प्रमाण होना भी आवश्यक है।

भारतीय चिंतन में स्मृति को केवल याद रखने की शक्ति नहीं माना गया। उसे चेतना का एक महत्वपूर्ण आयाम समझा गया। स्मृति मनुष्य को उसके अतीत से जोड़ती है और उसे पहचान देती है। परंतु जब स्मृति का स्थान केवल डिजिटल संग्रह लेने लगे, तब मनुष्य धीरे-धीरे अपने अनुभवों से दूर होने लगता है। वह अनुभव को जीने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने में व्यस्त हो जाता है।

आपने देखा होगा कि आज कोई व्यक्ति किसी सुंदर स्थान पर पहुँचता है तो सबसे पहले उसका ध्यान उस दृश्य पर नहीं जाता, बल्कि कैमरे के कोण पर जाता है। वह सोचता है कि कौन-सा फ्रेम बेहतर होगा, किस दिशा से प्रकाश आ रहा है, कौन-सा भाव चेहरे पर अच्छा लगेगा। उस क्षण वह प्रकृति के साथ नहीं, अपने प्रदर्शन के साथ जुड़ा होता है। उसकी चेतना बाहर नहीं, अपनी छवि पर केंद्रित होती है।

यही वह स्थिति है जिसे आधुनिक दार्शनिकों ने "दृश्य संस्कृति" कहा है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ वास्तविकता से अधिक महत्व उसकी छवि को मिल गया है। भोजन का स्वाद कम महत्वपूर्ण है, उसकी तस्वीर अधिक महत्वपूर्ण है। यात्रा का अनुभव कम महत्वपूर्ण है, उसकी पोस्ट अधिक महत्वपूर्ण है। प्रेम का स्पर्श कम महत्वपूर्ण है, उसकी सार्वजनिक घोषणा अधिक महत्वपूर्ण है।

यह केवल तकनीक का प्रश्न नहीं है। यह मनुष्य के भीतर बैठे उस अहंकार का प्रश्न है जो निरंतर मान्यता चाहता है। उपनिषदों ने जिस "अहं" को सीमित करने की बात कही थी, आधुनिक संस्कृति उसे विस्तार देने में लगी हुई है। सोशल मीडिया का प्रत्येक मंच उसी अहंकार को पोषित करता है। वहाँ मनुष्य लगातार पूछता है—क्या मुझे देखा जा रहा है? क्या मुझे पसंद किया जा रहा है? क्या मेरी उपस्थिति दर्ज हो रही है?

यूनानी मिथक में नार्सिसस नाम का एक युवक था। वह इतना सुंदर था कि स्वयं अपने प्रतिबिंब पर मोहित हो गया। जल में अपना चेहरा देखते-देखते वह उसी में डूब गया। आज का मनुष्य भी एक प्रकार के आधुनिक नार्सिसस में बदलता जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि अब जलाशय की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है।

कबीर ने मनुष्य को भीतर झाँकने की शिक्षा दी थी। बुद्ध ने आत्मनिरीक्षण को मुक्ति का मार्ग बताया था। महावीर ने कहा था कि स्वयं को जानना ही सबसे बड़ी विजय है। किंतु आधुनिक मनुष्य स्वयं को जानना नहीं चाहता, वह स्वयं को दिखाना चाहता है। जानने और दिखाने के बीच यही अंतर सभ्यता के संकट की जड़ है।

एक समय था जब यात्रा तीर्थ बन जाती थी। लोग महीनों पैदल चलते थे। रास्ते की कठिनाइयाँ उन्हें बदल देती थीं। वे लौटते थे तो उनका व्यक्तित्व कुछ और हो चुका होता था। आज यात्रा एक दृश्य सामग्री बन गई है। लोग एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में सेल्फी-स्टैंड लेकर चलते हैं। वे स्थानों को नहीं देखते, उन्हें कैप्चर करते हैं। वे अनुभवों को नहीं जीते, उन्हें अपलोड करते हैं।

यह कहना गलत होगा कि तस्वीरें लेना बुरा है। समस्या तस्वीरों में नहीं, उस मानसिकता में है जिसमें जीवन का केंद्र अनुभव नहीं, प्रदर्शन बन जाता है। जब किसी मंदिर में दर्शन से अधिक महत्व फोटो को मिलने लगे, तब समझना चाहिए कि आध्यात्मिकता धीरे-धीरे पर्यटन में बदल रही है। जब किसी गरीब की सहायता करने से पहले कैमरा तैयार किया जाए, तब करुणा धीरे-धीरे विज्ञापन में बदल रही है।

आज राजनीति से लेकर धर्म तक, शिक्षा से लेकर साहित्य तक, हर क्षेत्र में यह प्रदर्शन संस्कृति दिखाई देती है। लोग कार्य कम और उसका प्रचार अधिक करते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि समाज में दो समानांतर संसार चल रहे हैं। एक वास्तविक संसार, जहाँ संघर्ष, पीड़ा, असफलताएँ और जटिलताएँ हैं। दूसरा डिजिटल संसार, जहाँ सब कुछ सुंदर, सफल और आकर्षक दिखाई देता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य अपने वास्तविक जीवन की तुलना दूसरों के डिजिटल जीवन से करने लगता है। वह देखता है कि सब लोग प्रसन्न हैं, सफल हैं, यात्रा कर रहे हैं, उत्सव मना रहे हैं। धीरे-धीरे उसे लगता है कि केवल वही पीछे रह गया है। यह तुलना उसके भीतर असंतोष और अवसाद को जन्म देती है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो आधुनिक मनुष्य का सबसे बड़ा संकट अकेलापन नहीं, बल्कि स्वीकृति की भूख है। वह दूसरों की आँखों में अपना मूल्य खोज रहा है। उसे लगता है कि यदि लोग उसे पसंद करते हैं तो वह महत्वपूर्ण है। यदि लोग उसे अनदेखा कर देते हैं तो उसका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।

इसीलिए आज "लाइक" एक नई सामाजिक मुद्रा बन गया है। पहले सम्मान ज्ञान, चरित्र या कर्म से मिलता था। अब कई बार दृश्यता ही सम्मान का आधार बन जाती है। जो अधिक दिखाई देता है, वही अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस व्यवस्था में गहराई की जगह चमक ले लेती है।

भारतीय दर्शन ने बार-बार चेताया कि बाहरी संसार परिवर्तनशील है। वास्तविक शांति भीतर से आती है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रशंसा और निंदा दोनों में समान रहता है, वही स्थितप्रज्ञ है। किंतु आधुनिक संस्कृति मनुष्य को ठीक इसके विपरीत दिशा में ले जाती है। वह प्रशंसा पर निर्भर बन जाता है और आलोचना से टूट जाता है।

सेल्फी-स्टैंड का एक और अर्थ है—दूरी। तस्वीर लेने के लिए मोबाइल को स्वयं से दूर रखना पड़ता है। प्रतीकात्मक रूप से देखें तो आधुनिक मनुष्य भी स्वयं से दूर होता जा रहा है। वह अपने भीतर की आवाज़ नहीं सुनता। वह अपने अकेलेपन से भागता है। वह हर समय किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ा रहता है ताकि उसे अपने भीतर उतरने की आवश्यकता न पड़े।

पाश्चात्य दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल ने लिखा था कि मनुष्य की अधिकांश समस्याएँ इस कारण उत्पन्न होती हैं कि वह कुछ देर शांत बैठकर अपने साथ नहीं रह सकता। आज यह कथन पहले से अधिक सत्य प्रतीत होता है। हम लगातार व्यस्त हैं, जुड़े हुए हैं, सक्रिय हैं, परंतु भीतर से रिक्त हैं।

कभी गाँवों में लोग चौपाल पर बैठते थे। वे एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करते थे। उनके संवाद में समय लगता था, पर आत्मीयता होती थी। आज संवाद त्वरित हो गया है, लेकिन आत्मीयता कम हो गई है। हजारों संपर्क होने के बाद भी मनुष्य अकेला महसूस करता है।

प्रेम भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा। पहले प्रेम पत्र लिखे जाते थे। उनमें प्रतीक्षा थी, धैर्य था, शब्दों की गरिमा थी। आज प्रेम का एक बड़ा हिस्सा दृश्य प्रदर्शन में बदल गया है। संबंधों की गहराई कभी-कभी तस्वीरों की संख्या से मापी जाने लगी है। लेकिन प्रेम कैमरे में नहीं बसता। प्रेम तो उन क्षणों में जन्म लेता है जिन्हें कोई कैमरा पकड़ नहीं सकता—एक मौन स्पर्श में, एक चिंता भरी दृष्टि में, एक कठिन समय में निभाए गए साथ में।

यही कारण है कि कई बार सबसे अधिक तस्वीरें साझा करने वाले संबंध सबसे पहले टूट जाते हैं। क्योंकि संबंधों की जड़ें दृश्यता में नहीं, संवेदनशीलता में होती हैं।

यदि हम साहित्य की ओर देखें तो महान रचनाकारों ने कभी अपने जीवन का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने अपने अनुभवों को रचना में रूपांतरित किया। तुलसीदास, कबीर, सूरदास, प्रेमचंद, निराला—इनमें से किसी ने भी अपनी छवि को नहीं, अपने विचार को केंद्र में रखा। इसलिए वे समय से परे हो गए।

आज का समय हमें एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या हम स्वयं को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, या दुनिया की अपेक्षाओं के अनुसार स्वयं को गढ़ रहे हैं? यह प्रश्न केवल तकनीक का नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है।

सभ्यता का संकट यह नहीं कि उसके पास कैमरे हैं। संकट यह है कि उसके पास दर्पण कम होते जा रहे हैं। कैमरा बाहर की छवि पकड़ता है, दर्पण भीतर की सच्चाई दिखा सकता है। कैमरा दूसरों के लिए है, दर्पण स्वयं के लिए। कैमरा स्मृति का उपकरण है, दर्पण आत्मबोध का।

सेल्फी-स्टैंड का युग हमें बार-बार मंच पर बुलाता है। परंतु जीवन का सारा सत्य मंच पर नहीं मिलता। कुछ सत्य एकांत में मिलते हैं। कुछ उत्तर मौन में मिलते हैं। कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें साझा करने की नहीं, जीने की आवश्यकता होती है।

संभव है आने वाले समय में तकनीक और अधिक विकसित हो जाए। तस्वीरें और अधिक आकर्षक हो जाएँ। आभासी संसार और अधिक शक्तिशाली हो जाए। परंतु तब भी मनुष्य की मूल आवश्यकता नहीं बदलेगी। उसे प्रेम चाहिए होगा, अपनापन चाहिए होगा, अर्थ चाहिए होगा, आत्मस्वीकृति चाहिए होगी।

और इन सबकी प्राप्ति किसी सेल्फी-स्टैंड से नहीं होगी।

जब कभी अवसर मिले, किसी सुंदर दृश्य के सामने कुछ क्षण बिना कैमरे के खड़े होकर देखिए। किसी प्रियजन से बिना फोटो लिए बात कीजिए। किसी यात्रा को बिना पोस्ट किए जीकर देखिए। किसी सहायता को बिना प्रचार किए करिए। तब शायद आपको अनुभव होगा कि जीवन की सबसे मूल्यवान चीजें वे हैं जिन्हें दिखाया नहीं जा सकता।

अंततः सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह दर्पण को बचाती है या केवल कैमरे को। यदि मनुष्य स्वयं को देखने की क्षमता खो देगा, तो वह संसार को दिखाते-दिखाते अपने ही अस्तित्व से दूर हो जाएगा। लेकिन यदि वह भीतर झाँकने का साहस बनाए रखेगा, तो तकनीक भी उसके लिए साधन बनेगी, स्वामी नहीं।

सेल्फी-स्टैंड हाथ में होना समस्या नहीं है; समस्या तब है जब वह मनुष्य के मन में खड़ा हो जाए। क्योंकि जिस दिन मनुष्य का पूरा जीवन एक तस्वीर बन जाएगा, उसी दिन वह अनुभवों की जीवित नदी से कटकर केवल छवियों के संग्रहालय में बदल जाएगा।

और जीवन संग्रहालय बनने के लिए नहीं, बहती हुई नदी बनने के लिए मिला है।

Thursday, July 10, 2025

ड्योढ़ी पर छत by - डॉ. मोहन बैरागी

 ड्योढ़ी पर छत


एक फर्लांग इधर, एक फर्लांग उधर

कर देने से....

हो जाते हैं पार...

ड्योढ़ी के.....

इधर घर,

उधर

बाहर..?

जहां दुनियां हैं..?

वह..जो आपकी नहीं..?

दुनिया तो हैं घर के भीतर...

ड्योढ़ी के इधर....

यहीं से जा सकते हैं...

घर की छत पर...

जहां....गर्मियों में ठंडी हवाओं के एहसास

से, आती थी नींद, सुकून की..!

अब सुकून और नींद...

दोनों गायब है....?

क्योंकि, अब, वो छत नहीं, ठंडी हवाओं का एहसास नहीं...?

न चौखट बची, न दरवाज़े....

न ही ड्योढियां....

अब हैं सिर्फ, ड्योढ़ी और उसके ऊपर की छत..

जहां से मिलता है तो सिर्फ माइग्रेशन..

क्योंकि अब न बची है ड्योढियां और न ही छत


@डॉ. मोहन बैरागी

Friday, October 13, 2023

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नहीं

 मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नहीं


प्रेम में गर सिक्त है तो 

प्रेम में ही रिक्त बंधु

झोंकना खुद को पड़ेगा

तुझकों भी अतिरिक्त बंधु

बाद उपवन के उजड़ऩे, पुष्प खिलता ही नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही


चाँदनी जो ये धवल है

स्वप्र नैनों में नवल है

मन की मछली फडफ़ड़ाती

डुब जाने को विकल है

आवरण अखरोट दुनिया का यहां छिलता नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही


हमने नापा पग पगों से

प्रेम की तिरछी गली को

रोंदते है हमने देखा

प्रीत की नन्ही कली को

प्रेम का फटता जो कपड़ा फिर ये सिलता ही नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही

@डॉ.मोहन बैरागी

Thursday, November 17, 2022

Monday, August 22, 2022

अस्तित्व की तलाश और स्वयं से अनजाने हम...! लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

 


अस्तित्व की तलाश और स्वयं से अनजाने हम....!

लेखक :- डॉ.मोहन बैरागी

हम कौन है...? क्या हैं...? हमारा अस्तित्व क्या है....? मनुष्य के मन-मस्तिष्क में यह बात प्रारम्भ से ही बलवती रही है। क्या हमारे होने का कोई अर्थ है? किसने जीवन दिया।जीवन की सफलता और सार्थकता सभी के लिये अलग-अलग है। इस पहेली को खोजने के लिये कुछ लोग मानते है कि धर्म से जुड़ना ही जीवन का अर्थ है, कुछ लोग दान-पुण्य में तो कुछ सोचते है कि गरीबों की सेवा में तो कुछ शांति फैलाने,कुछ हिंसा में शांति ढूंढते है।यही अस्तित्ववाद है। मूलतः जिस तरह के काम करने में खुशी मिलती हो, वही जीवन का अर्थ है और वही अस्तित्ववाद है। पौराणिक कथानकों में भी मनुष्य की उत्पत्ति और विकास की धारणाओं के साथ-साथ उसके अस्तित्व विषयक आख्यान उल्लेखित है। प्रारम्भ में मनुष्य का मानना था कि जन्म से पहले ही सबकुछ तय हो जाता है। जीवन का उद्देश्य पूर्व से तय है, और यही बात कई यूनानी दार्शनिक और प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिक भी मानते रहे। 18वीं-19वीं सदी में इसके विपरीत नकारवाद की शुरुवात होने लगी। इस विचार को प्रस्तुत करने में निस्तशे का नाम प्रमुख है। एक और मनोवैज्ञानिक सार्त कहते है कि पैदा होने के बाद हमे अपने जीवन की रचना खुद करनी पड़ती है, इनका मानना है कि जन्म के बाद मनुष्य मकसद खोजने की दिशा में बढ़ता है। मूल्यों, गुणों-अवगुणों का निर्धारण मनुष्य अपने चयन या निर्णयों से कर आगे का रास्ता तय करता है। इसे एकसिस्टेन्स कहा जाता है,जबकि आम मनुष्य की दृष्टि में ये क्रांतिकारी विचारधारा रही है।

लेकिन आधुनिक युग में इस संकल्पना की अलग-अलग परिभाषायें या मान्यताएं मिलतीं है। विज्ञान के अनुसार धरती पर एक पारिस्थितिकी तंत्र काम करता है, जिसमें हर प्राणी अपने अस्तित्व को बनाएं रखने के लिए अपने से छोटे जीव का ग्रास करता है। पर बात तब भी प्रश्न रूप में ही सामने खड़ी होती है कि आखिर कोई किसी का भी ग्रास करें, जो अंतिम प्राणी भी छूट जाता है, वह कौन है ...? उसकी पहचान क्या है...? उसके स्वरूप या आकार-प्रकार जो भौतिक युग में है, का उद्देश्य क्या है..? उसको इस तरह, इस स्वरूप में किसने बनाया है..? क्या किसी...अलौकिक शक्ति ने बनाया है..? तो फिर वो अलौकिक शक्ति कौन है....उसको किसने बनाया....? सवाल कई हैं जिनके उत्तर समय-समय मनीषियों, चिंतकों तथा विचारकों ने दिये है।  

मुझे लगता है कि आधुनिक युग मे प्राणियों के मष्तिष्क में उत्पन्न विचार, जो भाषा के माध्यम से संप्रेषित होकर परस्पर अस्तित्व का निर्माण करते है वही अस्तित्व है।  आधुनिक युग में कई दार्शनिको ने अस्तित्व की अलग-अलग व्यख्या की और अस्तित्ववाद के सिद्धान्त दिए। 

एक धारणा है कि प्राणियों का संचालन नियति करती है। इस पर निस्तशे नामक महान दार्शनिक ने कहा कि नियति हमारा संचालन नही करती, बल्कि हमारे जीवन का संचालन हम स्वयं करते है। निस्तशे ने कहा कि इसके लिए जरूरी है कि खुद के हो जाओ,सेल्फ कंसंट्रेशन रखो या यूं कहें कि व्यक्तिवाद अपना लो। फ्रेंच फिलॉसफर अल्बेयर कामों सहित किरकेकार्थ,दोस्तोस्की जैसे कई विद्वान दार्शनिको ने अस्तित्ववाद के सिद्धान्त दिए, हालांकि ये सभी मनोवैज्ञानिक पूर्व से ही अस्तित्ववादी थे।

सार यह कि मस्त रहें, खुश रहें, खुशियां बांटे...तब आपके अस्तित्व का निर्माण स्वयं हो जाएगा।

©डॉ.मोहन बैरागी