Dr.Mohan Bairagi

Saturday, June 13, 2026

सभ्यता का सैल्फी स्टैंड : दर्पण से डरता मनुष्य और प्रदर्शन का युग

 सभ्यता का सेल्फी-स्टैंड : दर्पण से डरता मनुष्य और प्रदर्शन का युग



लेखक - डॉ. मोहन बैरागी 


मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि वह सोच सकता है, बल्कि यह है कि वह स्वयं को देख सकता है। वह केवल संसार को नहीं देखता, बल्कि स्वयं को भी देखता है। यही आत्मदृष्टि उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाती है। किंतु इतिहास का एक विचित्र मोड़ यह है कि जिस आत्मदृष्टि ने मनुष्य को ऋषि बनाया था, उसी आत्मदृष्टि की विकृत छाया ने उसे प्रदर्शनप्रिय भी बना दिया। आज का मनुष्य जितना स्वयं को देखना चाहता है, उससे कहीं अधिक वह चाहता है कि संसार उसे देखे। यह इच्छा नई नहीं है, परंतु आधुनिक तकनीक ने इसे अभूतपूर्व विस्तार दे दिया है। मोबाइल फोन, कैमरा और सोशल मीडिया ने मिलकर एक ऐसा युग निर्मित किया है जिसमें जीवन का मूल्य उसके अनुभव से नहीं, उसके प्रदर्शन से मापा जाने लगा है। इस युग का सबसे साधारण किंतु सबसे अर्थपूर्ण प्रतीक है—सेल्फी-स्टैंड।

पहली दृष्टि में सेल्फी-स्टैंड एक मामूली वस्तु है। कुछ लोहे या प्लास्टिक की छड़ों का संयोजन, जिसके सहारे मोबाइल को दूर रखकर तस्वीर ली जा सकती है। किंतु दर्शन का कार्य वस्तुओं के बाहरी रूप को देखना नहीं, उनके भीतर छिपे अर्थ को पहचानना है। जब हम सेल्फी-स्टैंड को एक प्रतीक की तरह देखते हैं, तब वह आधुनिक मनुष्य के मानस का दर्पण बन जाता है।

कभी मनुष्य अपने जीवन के अनुभवों को भीतर संजोता था। गाँव का कोई वृद्ध जब अपने युवाकाल की कथा सुनाता था, तो उसकी आँखों में स्मृतियों का पूरा संसार उतर आता था। वह किसी नदी, किसी पर्वत, किसी प्रेम या किसी पीड़ा को शब्दों में पुनर्जीवित कर देता था। आज स्मृतियों की जगह तस्वीरों ने ले ली है। अब लोग कहते हैं—“देखो, मैं वहाँ गया था।” वे अनुभव नहीं सुनाते, प्रमाण दिखाते हैं। मानो घटना का घटित होना पर्याप्त नहीं, उसका दृश्य प्रमाण होना भी आवश्यक है।

भारतीय चिंतन में स्मृति को केवल याद रखने की शक्ति नहीं माना गया। उसे चेतना का एक महत्वपूर्ण आयाम समझा गया। स्मृति मनुष्य को उसके अतीत से जोड़ती है और उसे पहचान देती है। परंतु जब स्मृति का स्थान केवल डिजिटल संग्रह लेने लगे, तब मनुष्य धीरे-धीरे अपने अनुभवों से दूर होने लगता है। वह अनुभव को जीने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने में व्यस्त हो जाता है।

आपने देखा होगा कि आज कोई व्यक्ति किसी सुंदर स्थान पर पहुँचता है तो सबसे पहले उसका ध्यान उस दृश्य पर नहीं जाता, बल्कि कैमरे के कोण पर जाता है। वह सोचता है कि कौन-सा फ्रेम बेहतर होगा, किस दिशा से प्रकाश आ रहा है, कौन-सा भाव चेहरे पर अच्छा लगेगा। उस क्षण वह प्रकृति के साथ नहीं, अपने प्रदर्शन के साथ जुड़ा होता है। उसकी चेतना बाहर नहीं, अपनी छवि पर केंद्रित होती है।

यही वह स्थिति है जिसे आधुनिक दार्शनिकों ने "दृश्य संस्कृति" कहा है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ वास्तविकता से अधिक महत्व उसकी छवि को मिल गया है। भोजन का स्वाद कम महत्वपूर्ण है, उसकी तस्वीर अधिक महत्वपूर्ण है। यात्रा का अनुभव कम महत्वपूर्ण है, उसकी पोस्ट अधिक महत्वपूर्ण है। प्रेम का स्पर्श कम महत्वपूर्ण है, उसकी सार्वजनिक घोषणा अधिक महत्वपूर्ण है।

यह केवल तकनीक का प्रश्न नहीं है। यह मनुष्य के भीतर बैठे उस अहंकार का प्रश्न है जो निरंतर मान्यता चाहता है। उपनिषदों ने जिस "अहं" को सीमित करने की बात कही थी, आधुनिक संस्कृति उसे विस्तार देने में लगी हुई है। सोशल मीडिया का प्रत्येक मंच उसी अहंकार को पोषित करता है। वहाँ मनुष्य लगातार पूछता है—क्या मुझे देखा जा रहा है? क्या मुझे पसंद किया जा रहा है? क्या मेरी उपस्थिति दर्ज हो रही है?

यूनानी मिथक में नार्सिसस नाम का एक युवक था। वह इतना सुंदर था कि स्वयं अपने प्रतिबिंब पर मोहित हो गया। जल में अपना चेहरा देखते-देखते वह उसी में डूब गया। आज का मनुष्य भी एक प्रकार के आधुनिक नार्सिसस में बदलता जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि अब जलाशय की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है।

कबीर ने मनुष्य को भीतर झाँकने की शिक्षा दी थी। बुद्ध ने आत्मनिरीक्षण को मुक्ति का मार्ग बताया था। महावीर ने कहा था कि स्वयं को जानना ही सबसे बड़ी विजय है। किंतु आधुनिक मनुष्य स्वयं को जानना नहीं चाहता, वह स्वयं को दिखाना चाहता है। जानने और दिखाने के बीच यही अंतर सभ्यता के संकट की जड़ है।

एक समय था जब यात्रा तीर्थ बन जाती थी। लोग महीनों पैदल चलते थे। रास्ते की कठिनाइयाँ उन्हें बदल देती थीं। वे लौटते थे तो उनका व्यक्तित्व कुछ और हो चुका होता था। आज यात्रा एक दृश्य सामग्री बन गई है। लोग एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में सेल्फी-स्टैंड लेकर चलते हैं। वे स्थानों को नहीं देखते, उन्हें कैप्चर करते हैं। वे अनुभवों को नहीं जीते, उन्हें अपलोड करते हैं।

यह कहना गलत होगा कि तस्वीरें लेना बुरा है। समस्या तस्वीरों में नहीं, उस मानसिकता में है जिसमें जीवन का केंद्र अनुभव नहीं, प्रदर्शन बन जाता है। जब किसी मंदिर में दर्शन से अधिक महत्व फोटो को मिलने लगे, तब समझना चाहिए कि आध्यात्मिकता धीरे-धीरे पर्यटन में बदल रही है। जब किसी गरीब की सहायता करने से पहले कैमरा तैयार किया जाए, तब करुणा धीरे-धीरे विज्ञापन में बदल रही है।

आज राजनीति से लेकर धर्म तक, शिक्षा से लेकर साहित्य तक, हर क्षेत्र में यह प्रदर्शन संस्कृति दिखाई देती है। लोग कार्य कम और उसका प्रचार अधिक करते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि समाज में दो समानांतर संसार चल रहे हैं। एक वास्तविक संसार, जहाँ संघर्ष, पीड़ा, असफलताएँ और जटिलताएँ हैं। दूसरा डिजिटल संसार, जहाँ सब कुछ सुंदर, सफल और आकर्षक दिखाई देता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य अपने वास्तविक जीवन की तुलना दूसरों के डिजिटल जीवन से करने लगता है। वह देखता है कि सब लोग प्रसन्न हैं, सफल हैं, यात्रा कर रहे हैं, उत्सव मना रहे हैं। धीरे-धीरे उसे लगता है कि केवल वही पीछे रह गया है। यह तुलना उसके भीतर असंतोष और अवसाद को जन्म देती है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो आधुनिक मनुष्य का सबसे बड़ा संकट अकेलापन नहीं, बल्कि स्वीकृति की भूख है। वह दूसरों की आँखों में अपना मूल्य खोज रहा है। उसे लगता है कि यदि लोग उसे पसंद करते हैं तो वह महत्वपूर्ण है। यदि लोग उसे अनदेखा कर देते हैं तो उसका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।

इसीलिए आज "लाइक" एक नई सामाजिक मुद्रा बन गया है। पहले सम्मान ज्ञान, चरित्र या कर्म से मिलता था। अब कई बार दृश्यता ही सम्मान का आधार बन जाती है। जो अधिक दिखाई देता है, वही अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस व्यवस्था में गहराई की जगह चमक ले लेती है।

भारतीय दर्शन ने बार-बार चेताया कि बाहरी संसार परिवर्तनशील है। वास्तविक शांति भीतर से आती है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रशंसा और निंदा दोनों में समान रहता है, वही स्थितप्रज्ञ है। किंतु आधुनिक संस्कृति मनुष्य को ठीक इसके विपरीत दिशा में ले जाती है। वह प्रशंसा पर निर्भर बन जाता है और आलोचना से टूट जाता है।

सेल्फी-स्टैंड का एक और अर्थ है—दूरी। तस्वीर लेने के लिए मोबाइल को स्वयं से दूर रखना पड़ता है। प्रतीकात्मक रूप से देखें तो आधुनिक मनुष्य भी स्वयं से दूर होता जा रहा है। वह अपने भीतर की आवाज़ नहीं सुनता। वह अपने अकेलेपन से भागता है। वह हर समय किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ा रहता है ताकि उसे अपने भीतर उतरने की आवश्यकता न पड़े।

पाश्चात्य दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल ने लिखा था कि मनुष्य की अधिकांश समस्याएँ इस कारण उत्पन्न होती हैं कि वह कुछ देर शांत बैठकर अपने साथ नहीं रह सकता। आज यह कथन पहले से अधिक सत्य प्रतीत होता है। हम लगातार व्यस्त हैं, जुड़े हुए हैं, सक्रिय हैं, परंतु भीतर से रिक्त हैं।

कभी गाँवों में लोग चौपाल पर बैठते थे। वे एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करते थे। उनके संवाद में समय लगता था, पर आत्मीयता होती थी। आज संवाद त्वरित हो गया है, लेकिन आत्मीयता कम हो गई है। हजारों संपर्क होने के बाद भी मनुष्य अकेला महसूस करता है।

प्रेम भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा। पहले प्रेम पत्र लिखे जाते थे। उनमें प्रतीक्षा थी, धैर्य था, शब्दों की गरिमा थी। आज प्रेम का एक बड़ा हिस्सा दृश्य प्रदर्शन में बदल गया है। संबंधों की गहराई कभी-कभी तस्वीरों की संख्या से मापी जाने लगी है। लेकिन प्रेम कैमरे में नहीं बसता। प्रेम तो उन क्षणों में जन्म लेता है जिन्हें कोई कैमरा पकड़ नहीं सकता—एक मौन स्पर्श में, एक चिंता भरी दृष्टि में, एक कठिन समय में निभाए गए साथ में।

यही कारण है कि कई बार सबसे अधिक तस्वीरें साझा करने वाले संबंध सबसे पहले टूट जाते हैं। क्योंकि संबंधों की जड़ें दृश्यता में नहीं, संवेदनशीलता में होती हैं।

यदि हम साहित्य की ओर देखें तो महान रचनाकारों ने कभी अपने जीवन का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने अपने अनुभवों को रचना में रूपांतरित किया। तुलसीदास, कबीर, सूरदास, प्रेमचंद, निराला—इनमें से किसी ने भी अपनी छवि को नहीं, अपने विचार को केंद्र में रखा। इसलिए वे समय से परे हो गए।

आज का समय हमें एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या हम स्वयं को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, या दुनिया की अपेक्षाओं के अनुसार स्वयं को गढ़ रहे हैं? यह प्रश्न केवल तकनीक का नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है।

सभ्यता का संकट यह नहीं कि उसके पास कैमरे हैं। संकट यह है कि उसके पास दर्पण कम होते जा रहे हैं। कैमरा बाहर की छवि पकड़ता है, दर्पण भीतर की सच्चाई दिखा सकता है। कैमरा दूसरों के लिए है, दर्पण स्वयं के लिए। कैमरा स्मृति का उपकरण है, दर्पण आत्मबोध का।

सेल्फी-स्टैंड का युग हमें बार-बार मंच पर बुलाता है। परंतु जीवन का सारा सत्य मंच पर नहीं मिलता। कुछ सत्य एकांत में मिलते हैं। कुछ उत्तर मौन में मिलते हैं। कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें साझा करने की नहीं, जीने की आवश्यकता होती है।

संभव है आने वाले समय में तकनीक और अधिक विकसित हो जाए। तस्वीरें और अधिक आकर्षक हो जाएँ। आभासी संसार और अधिक शक्तिशाली हो जाए। परंतु तब भी मनुष्य की मूल आवश्यकता नहीं बदलेगी। उसे प्रेम चाहिए होगा, अपनापन चाहिए होगा, अर्थ चाहिए होगा, आत्मस्वीकृति चाहिए होगी।

और इन सबकी प्राप्ति किसी सेल्फी-स्टैंड से नहीं होगी।

जब कभी अवसर मिले, किसी सुंदर दृश्य के सामने कुछ क्षण बिना कैमरे के खड़े होकर देखिए। किसी प्रियजन से बिना फोटो लिए बात कीजिए। किसी यात्रा को बिना पोस्ट किए जीकर देखिए। किसी सहायता को बिना प्रचार किए करिए। तब शायद आपको अनुभव होगा कि जीवन की सबसे मूल्यवान चीजें वे हैं जिन्हें दिखाया नहीं जा सकता।

अंततः सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह दर्पण को बचाती है या केवल कैमरे को। यदि मनुष्य स्वयं को देखने की क्षमता खो देगा, तो वह संसार को दिखाते-दिखाते अपने ही अस्तित्व से दूर हो जाएगा। लेकिन यदि वह भीतर झाँकने का साहस बनाए रखेगा, तो तकनीक भी उसके लिए साधन बनेगी, स्वामी नहीं।

सेल्फी-स्टैंड हाथ में होना समस्या नहीं है; समस्या तब है जब वह मनुष्य के मन में खड़ा हो जाए। क्योंकि जिस दिन मनुष्य का पूरा जीवन एक तस्वीर बन जाएगा, उसी दिन वह अनुभवों की जीवित नदी से कटकर केवल छवियों के संग्रहालय में बदल जाएगा।

और जीवन संग्रहालय बनने के लिए नहीं, बहती हुई नदी बनने के लिए मिला है।

Thursday, July 10, 2025

ड्योढ़ी पर छत by - डॉ. मोहन बैरागी

 ड्योढ़ी पर छत


एक फर्लांग इधर, एक फर्लांग उधर

कर देने से....

हो जाते हैं पार...

ड्योढ़ी के.....

इधर घर,

उधर

बाहर..?

जहां दुनियां हैं..?

वह..जो आपकी नहीं..?

दुनिया तो हैं घर के भीतर...

ड्योढ़ी के इधर....

यहीं से जा सकते हैं...

घर की छत पर...

जहां....गर्मियों में ठंडी हवाओं के एहसास

से, आती थी नींद, सुकून की..!

अब सुकून और नींद...

दोनों गायब है....?

क्योंकि, अब, वो छत नहीं, ठंडी हवाओं का एहसास नहीं...?

न चौखट बची, न दरवाज़े....

न ही ड्योढियां....

अब हैं सिर्फ, ड्योढ़ी और उसके ऊपर की छत..

जहां से मिलता है तो सिर्फ माइग्रेशन..

क्योंकि अब न बची है ड्योढियां और न ही छत


@डॉ. मोहन बैरागी

Friday, October 13, 2023

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नहीं

 मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नहीं


प्रेम में गर सिक्त है तो 

प्रेम में ही रिक्त बंधु

झोंकना खुद को पड़ेगा

तुझकों भी अतिरिक्त बंधु

बाद उपवन के उजड़ऩे, पुष्प खिलता ही नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही


चाँदनी जो ये धवल है

स्वप्र नैनों में नवल है

मन की मछली फडफ़ड़ाती

डुब जाने को विकल है

आवरण अखरोट दुनिया का यहां छिलता नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही


हमने नापा पग पगों से

प्रेम की तिरछी गली को

रोंदते है हमने देखा

प्रीत की नन्ही कली को

प्रेम का फटता जो कपड़ा फिर ये सिलता ही नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही

@डॉ.मोहन बैरागी

Thursday, November 17, 2022

Monday, August 22, 2022

अस्तित्व की तलाश और स्वयं से अनजाने हम...! लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

 


अस्तित्व की तलाश और स्वयं से अनजाने हम....!

लेखक :- डॉ.मोहन बैरागी

हम कौन है...? क्या हैं...? हमारा अस्तित्व क्या है....? मनुष्य के मन-मस्तिष्क में यह बात प्रारम्भ से ही बलवती रही है। क्या हमारे होने का कोई अर्थ है? किसने जीवन दिया।जीवन की सफलता और सार्थकता सभी के लिये अलग-अलग है। इस पहेली को खोजने के लिये कुछ लोग मानते है कि धर्म से जुड़ना ही जीवन का अर्थ है, कुछ लोग दान-पुण्य में तो कुछ सोचते है कि गरीबों की सेवा में तो कुछ शांति फैलाने,कुछ हिंसा में शांति ढूंढते है।यही अस्तित्ववाद है। मूलतः जिस तरह के काम करने में खुशी मिलती हो, वही जीवन का अर्थ है और वही अस्तित्ववाद है। पौराणिक कथानकों में भी मनुष्य की उत्पत्ति और विकास की धारणाओं के साथ-साथ उसके अस्तित्व विषयक आख्यान उल्लेखित है। प्रारम्भ में मनुष्य का मानना था कि जन्म से पहले ही सबकुछ तय हो जाता है। जीवन का उद्देश्य पूर्व से तय है, और यही बात कई यूनानी दार्शनिक और प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिक भी मानते रहे। 18वीं-19वीं सदी में इसके विपरीत नकारवाद की शुरुवात होने लगी। इस विचार को प्रस्तुत करने में निस्तशे का नाम प्रमुख है। एक और मनोवैज्ञानिक सार्त कहते है कि पैदा होने के बाद हमे अपने जीवन की रचना खुद करनी पड़ती है, इनका मानना है कि जन्म के बाद मनुष्य मकसद खोजने की दिशा में बढ़ता है। मूल्यों, गुणों-अवगुणों का निर्धारण मनुष्य अपने चयन या निर्णयों से कर आगे का रास्ता तय करता है। इसे एकसिस्टेन्स कहा जाता है,जबकि आम मनुष्य की दृष्टि में ये क्रांतिकारी विचारधारा रही है।

लेकिन आधुनिक युग में इस संकल्पना की अलग-अलग परिभाषायें या मान्यताएं मिलतीं है। विज्ञान के अनुसार धरती पर एक पारिस्थितिकी तंत्र काम करता है, जिसमें हर प्राणी अपने अस्तित्व को बनाएं रखने के लिए अपने से छोटे जीव का ग्रास करता है। पर बात तब भी प्रश्न रूप में ही सामने खड़ी होती है कि आखिर कोई किसी का भी ग्रास करें, जो अंतिम प्राणी भी छूट जाता है, वह कौन है ...? उसकी पहचान क्या है...? उसके स्वरूप या आकार-प्रकार जो भौतिक युग में है, का उद्देश्य क्या है..? उसको इस तरह, इस स्वरूप में किसने बनाया है..? क्या किसी...अलौकिक शक्ति ने बनाया है..? तो फिर वो अलौकिक शक्ति कौन है....उसको किसने बनाया....? सवाल कई हैं जिनके उत्तर समय-समय मनीषियों, चिंतकों तथा विचारकों ने दिये है।  

मुझे लगता है कि आधुनिक युग मे प्राणियों के मष्तिष्क में उत्पन्न विचार, जो भाषा के माध्यम से संप्रेषित होकर परस्पर अस्तित्व का निर्माण करते है वही अस्तित्व है।  आधुनिक युग में कई दार्शनिको ने अस्तित्व की अलग-अलग व्यख्या की और अस्तित्ववाद के सिद्धान्त दिए। 

एक धारणा है कि प्राणियों का संचालन नियति करती है। इस पर निस्तशे नामक महान दार्शनिक ने कहा कि नियति हमारा संचालन नही करती, बल्कि हमारे जीवन का संचालन हम स्वयं करते है। निस्तशे ने कहा कि इसके लिए जरूरी है कि खुद के हो जाओ,सेल्फ कंसंट्रेशन रखो या यूं कहें कि व्यक्तिवाद अपना लो। फ्रेंच फिलॉसफर अल्बेयर कामों सहित किरकेकार्थ,दोस्तोस्की जैसे कई विद्वान दार्शनिको ने अस्तित्ववाद के सिद्धान्त दिए, हालांकि ये सभी मनोवैज्ञानिक पूर्व से ही अस्तित्ववादी थे।

सार यह कि मस्त रहें, खुश रहें, खुशियां बांटे...तब आपके अस्तित्व का निर्माण स्वयं हो जाएगा।

©डॉ.मोहन बैरागी

Sunday, August 7, 2022

यथार्थ जीवन और अनसुलझे सपने लेखक - डॉ. मोहन बैरागी


यथार्थ जीवन और अनसुलझे सपने 

लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

रात के कोई दो-ढाई बज रहे थे, मैं ट्रेन से उतरकर घर जाने को स्टेश्न से निकला। नींद शरीर और आँखों को परेशान कर रही थी, लेकिन घर जाना ही था, सो स्टेशन के सामने बड़ी मुख्य सडक़ पर किनारे-किनारे पैदल ही चलना शुरू कर दिया। ताज्जुब हो रहा था, वातावरण देखकर, आधा सोया-आधा जागा सा। मैने देखा, रात के इस पहर में अब भी पिछली शाम की भीड द्वारा छोड़ दिये गये अवशेष, जो अक्सर किसी मेले, या उत्सव-त्यौहार के बाद लोग छोड़ जाते है। सोचा शहर में इतनी भीड़-भाड़ क्यो रही होगी? याद आया, कोई बड़ा त्यौहार था जिसमें शहर में चौबीस घंटे रौनक रहती है। खैर... मैं पैदल आगे बढऩे लगा... सडक़े के दोनों किनारो पर काफी मात्रा में संभवत: गाड़ोलिया समाज के अस्थायी डेरे दिखाई दे रहे थे, जो मेरे शहर से जाने से पहले यहाँ नहीं थे, ....इसी त्यौहार में हिस्सेदारी के लिए आए होंगे। ये डेरे सडक़ के दोनों और कतारबद्ध... देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ... और तो और... हर डेरे से बंधे हुए ऊँट.... इतने सारे ऊँट और कुछ जगह घोड़े साथ में दो हाथी भी सडक़ किनारे बंधे थे, जो मैनें पहले कभी एक साथ नही देखे। इधर साफ रहने वाली सडक़ पर यहाँ-वहाँ ऊँटों की विष्ठा बिखरी पड़ी दिखाई दे रही थी। थोड़ा और आगे चला तो देखता हँू कि एक ऊँट लगभग पगलाया सा दौड़ता हुआ कहीं से आया और सोते हुए गडरियों के डेरे में घुस गया। अगले ही पल पुरा डेरा अस्त-व्यस्त, पुरा तंबु उखड़ गया था। इसमें सो रहे महिला, बच्चे, पुरूष इधर उधर भागने लगे। कुछ देर के लिए अफरा-तफरी मच गई। पुरूष और महिला गडरियों ने जैसे-तैसे ऊँट को पकडक़र काबू में किया और उसे शांत कर किनारे पर लगे एक बिजली के खंभे से बांध दिया। इस ऊँट (पटांग) घटना को कुछ पल देख कर मैं आगे बढ़ गया, लेकिन मैं थकावट और नींद से पुरी तरह निढाल हो रहा था, सोचा मेन रोड़ से जाने की बजाय शार्ट रास्ता ले लुं, घर जाने के लिए मेन रोड़ से एक पुरानी मिल में से होकर कुछ पुराने मोहल्लों से होकर रास्ता मेरे घर को जाता है, यही रास्ता ठीक है, जल्दी घर पहँुचने के लिए। मैं चल दिया... मिल परिसर के बीच बने कच्चे पक्के रास्ते से....कुछ अंधेरा, कहीं हल्की रोशनी वाली जलती बुझतीं खंबे पर लगी टयुबलाईट के उजाले में... इधर बरसात का मौसम है, और रात का समय, तो वातावरण में वैसे भी ठंडक घुली हुई है, दुसरी तरफ यात्रा के कारण शरीर टुटन एक कदम भी आगे चलने से रोक रही है, लेकिन किया भी क्या जा सकता है.. पँहुचना तो है घर। 

अब में मिल परिसर के ऊँचें नीचे खुदे हुए मिट्टी के छोटे-मोटे टीलों को पार कर आगे पुरानी बसी कालोनी में इण्टर हो गया...थोड़ा आगे चला तो रोशनी दिखाई दी...और आगे चलने पर बैण्ड-बाजो की आवाज...शोर-शराबा.. मैं सही था..कोई त्योहार ही है, जो अब तक... इतनी रात तक उसका सुरूर लोगों  पर हैं...अब भीड़ दिखाई देने लगी, जैसे कोई सवारी निकल रही हो...यकायक मेरे सामने सैकड़ों लोगो की भीड़...हाँलाकि कालोनी का मार्ग संकरा था, और इसी मार्ग में यह सवारी आगे की और बढ़ रही थी...जैसे तैसे मैंं भीड़ को चीरने का प्रयास करता आगे की और बढऩे लगा...कुछ दुर चलकर रास्ता और संकरा हो गया...आगे बैण्ड तेज आवाज में...लोगों का हुजूम...जैसे इन दो तीन बैण्ड के पीछे लगभग कतार बनाकर चलते लोग...इससे आगे निकलना मुश्किल हो रहा था...सो...मैं भी कतार में लग गया.....जिस जगह मैं कतार में लगा...वहाँ भीड़ कम थी....कुछ कदम चलने के बाद मुझे अपने पीछे सरसराहट हुई...तुरंत अपना दाया हाथ पीछे की जेब की तरफ बढ़ाया...तभी अचानक मेरे हाथ ने दुसरा हाथ पकड ़लिया.. अचानक पटल कर पीछे देखा.... कोई बारह-पन्द्रह साल के दो बच्चे मेरे पीछे थे और उनमें से एक का हाथ मेरी जेब पर था, जिसे मैने पकड़ लिया था.. दोनों बच्चे मेरी तरफ देखने लगे..उनकी आँखों में ज़रा भी भय नहीं था कि मैने उनको देख लिया और सरेराह जेब काटते रंगे हाथ पकड़ लिया...वो साहस भरे स्वर में अरे यार..शीट्ट...कहकर दाएं-बाएं होने की मुद्रा में आ गये, मैं अपने आपको संभाल ही रहा था कि दोनो बच्चें आँखों से ओझल हो गये। अब मैं इस परिस्थिति से बाहर निकलने को व्याकुल था, जैसे-तैसे भीड़ को चीरते हुए जुलूस से आगे निकल गया... थोड़ा आगे जाकर इस पुरानी कॉलोनी के खत्म होते ही बाउंड्री वाल में बने एक छोटे से रास्ते से बाहर निकला और महसुस होने लगा की मैं शायद थकान और नींद की वजह से रास्ता भुल रहा हँू..? फिर भी आगे बढ़ा...देखा, फिर वहीं कच्चा ऊँचा-निचा रास्ता जो आगे चलकर शायद किसी मंदिर की और जा रहा था...चलते हुए मैं भी पँहुच गया.. मैं अब समझ गया था कि रास्ता भुल गया हँु... तभी कुछ जाने पहचाने चहरे दिखे... कोई पाँच-सात लोग बाहर निकल रहे थे... मुस्कूराते हुए मैने बाहर जाने का रास्ता पुछा... उनमें से एक ने हँसकर मुझे हाथ से इशारा कर एक दिशा में जाने को कहा... मुझे कि संभवत: मैं नहीं जानता इनमें से किसी को भी... खैर... मैं उस दिशा में चल दिया... आगे चलकर लगभग मैदान सी जगह... जिसके आगे कोई कॉलोनी दिखाई पड़ रही थी... इस मैदान से गुज़रते हुए मैने देखा.... कुछ दस-बारह युवकों की टोली मोटरसाईकिल खड़ी कर बतिया रही थी... हुलिये से बदमाश लग रहे थे... यकायका वे मेरी तरफ देखने लगे... मुझे लगा अब गए काम से शायद... क्या पता... मारपीट करें... लुट लें..? मैने अपनी चाल बढ़ाई और उनमें से कोई भी कोई हरकत करे, इससे पहले मैं उस जगह को पार कर गया और कॉलोनी के रास्ते पर आ गया.... यहाँ देखा फिर वहीं रौनक... घरों के ओटलों पर बच्चे-महिलाएं खड़े है... एक दुसरे से गपशप करते हुए ये लोग शायद इस त्यौहार की मस्ती में लग रहे थे..। हांलाकि इस रास्ते पर कोई जुलूस वगैरह नहीं था...तभी मैने एक घर के ओटले पर खड़ी एक महिला से पुछा....

ये आगर रोड़ का रास्ता किधर से है..? (आगर रोड़ वही रोड़ है, जिससे मैन स्टेशन से उतरकर चलना शुरू किया था, इस रोड़ से मेरा घर नज़दीक है।) 

महिला ने अचंभे भरे स्वर में कहा.... आगर रोड़..... कोनसा...? ये तो बैतुल है।

ये सुनकर मेरे पैरो से ज़मीन खिसक गई.... आश्यर्च से दिमाग घुमने लगा... सोच में पड़ गया....बैतुल.... बैतुल कैसे....?

थोड़ी ठंडी सांस लेकर मैने उसी महिला से पुछा... ये बस स्टेण्ड का रास्ता किधर से है.....

महिला ने कहा... थोड़ी ही दुर है... आप इस रास्ते को खतम करेंगे तो वहीं से कॉलोनी की दीवार के बीच एक रास्ता है...उसके बाहर बस स्टैण्ड है।

मेरी हालत अब हद से ज्य़ादा खराब थी....लेकिन इस जगह कर भी क्या सकता था....मैं थके पैरों से चल दिया और कुछ दुर जाकर ही दीवार के बीच बने रास्ते से बस स्टैण्ड पहँुच गया। 

अब मुझे अपने शहर के लिए बस की तलाश करना थी...सोच ही रहा था कि किससे पुछा जाय....।

त्यौहार की वजह से बस स्टैण्ड पर भी अच्छी-खासी भीड़ थी, लोग लाईन लगाकर कांउटर में अपने-अपने गंतव्य की टिकट ले रहे थे। मैं लाईन से अलग काउंटर पर पँहुचा और चेहरा झुकाकर खिड़की में बैठे बाबु से मेरे गंतव्य को जाने वाली बस के बारे में पुछ ही रहा था, दुसरी तरफ से शोर था की लाईन में लगकर टिकट लो... कि तभी, एक हाथ मेरे कंधे पर आया, मैं पलट कर देखता कि..... इतने में मेरी नींद खुल गई।

मैं बिस्तर पर दाएं-बाएं देखने लगा... उठकर मुंह पर हाथ फेरा... पास पड़े मोबाईल में टाईम देखा तो सुबह के साढे नो बज चुके थे। मन अब भी विचलित था। झटके से रजाई को हटाते हुए वाश बेसिन में जाकर मुंह पर पानी मारा... कुछ पल लगे नार्मल होने में... फिर आकर बिस्तर पर बैठ गया और सोचने लगा कि ये सब क्या था। सुबह के समय, ये कैसा सपना? खयाल आया, इसके बारे में थोड़ा पढ़ लू। एक दो किताब और इंटरनेट खंगाला, तो कुछ वैज्ञानिकों के कथन सामने आए। इटली के वैज्ञानिक एलसेंड्रो फोगली का मानना है कि सपने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से प्रभावित होते है। जैसे-अनिंद्रा, अवसाद, चिंता, दुख-सुख आदि। उक्त नकारात्मक स्थितियाँ और घटनाएं हमारे सपनो पर प्रतिकुल प्रभाव डालती है। मिस्र में एक अध्ययन में स्वप्न में आए दृश्यों का अर्थ समझने पर काफी परिश्रम हुआ। डिक्शनरी ऑफ ड्रीम्स में मिस्र के ऐसे अध्ययन का आश्चर्यजनक उल्लेख भी है। इसके मुल सिद्धांत भारतीय चिंतन से मिलते जुलते है। मनोवैज्ञानिक सिग्मन फ्राएड के अनुसार सारे सपने हमारी इच्छा का ही परिणाम है। भारतीय ग्रंथ अर्थववेद में काम देवता को स्वनसर्जक कहा गया है। एक और वैज्ञानिक डाक्टर चाल्र्स युंग के अनुसार सपने मानसिक प्रतिक्रिया है जो मुख्यत: अपने लक्ष्य सिद्धी के लिए होते है तो वहीं एक और वैज्ञानिक केल्विन एस हॉल ने सपनों का सिद्धांत दिया जिसमें बताया कि सपने विचार या विचार की श्रंखला है।

सार यह कि.... अवसाद से बचें, पुरी नींद लें, चिंता और दुख को अपने से दुर रखें, मस्त रहें, हंसते-मुस्कूराते।

आनंदमयी जीवन जियें।

© लेखक- डॉ. मोहन बैरागी

Thursday, August 4, 2022

गीत - समय, समय से घट जाए तो घट जाने दे.... लेखक - डॉ. मोहन बैरागी


 समय, समय से घट जाए तो घट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


अँधियारो से लड़ तू दीप जलाकर मन का

फिर बरखा बरसेगी फिर महीना सावन का

भीतर के दुःख को सारे कहीं सिमट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


छोड़ के दुनिया के वैभव की उलझन को

अब तोड़ दे सारे आभासी झूठे दर्पन को

उड़ते पंछी को घर के लिए पलट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


असली नकली लोगो की रौनक खूब रिझाती

कभी कभी ये बुद्धि इतना अंतर ना कर पाती

भूलो वे साथ उन्ही के उनका कपट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


ये माना कुछ पल चले गए हैं व्यर्थ सही

ज़िद कर तू ढूंढेगा जीवन के अर्थ सही

ख़ुद आएगी मंजिल, इसे लिपट जाने दे

मझधारों से लड़ मांझी तू नैया तट जाने दे

©डॉ. मोहन बैरागी