Dr.Mohan Bairagi

Sunday, October 23, 2016

मखमली एहसास तुम्हारे मुझको बांधे यार
दर्पण में मैं खुद को देखु,जाने कितनी बार
01.गंध का मुधबन में फेरा,भ्रमर का कलियों पे डेरा
पंछी कोई आकाश में,बादल जो भटके प्यास में
जुगनू से बाते करता,अब में सारी रातों में
अंधियारों में देख उजाले,हंस दू,
कभी में गा लूं,कोई गीत मल्हार
मखमली एहसास तुम्हारे.....

Tuesday, October 11, 2016

मेरे एक और श्रंृगार गीत की कुछ पंक्तियां
आप भी पढिय़े,अच्छा लगे तो बताईयेगा जरूर...
(हिन्दी साहित्य के अनुरूप नहीं है,पर अच्छी लगेगीं)

मखमली एहसास तुम्हारे मुझको बांधे यार
दर्पण में मैं खुद को देखु,जाने कितनी बार

01.गंध का मुधबन में फेरा,भ्रमर का कलियों पे डेरा
पंछी कोई आकाश में,बादल जो भटके प्यास में
जुगनू से बाते करता,अब में सारी रातों में
अंधियारों में देख उजाले,हंस दू,
कभी में गा लूं,कोई गीत मल्हार
मखमली एहसास तुम्हारे.....
ञ्चष्टशश्च42ह्म्द्बह्लद्ग
डॉ.मोहन बैरागी
व्हाट्सअप-9424014366

Monday, September 12, 2016

जिंदगी रेत की मानिंद फिसलती होगी
दरकते रिश्तों से दृग धार निकलती होगी
तिनका तिनका बिखरा कुनबा सारा क्यूं..
ठेस बुजूर्गो के दिल को भी तो लगती होगी।
डॉ.मोहन बैरागी
पत्तीयों का रंग हरा,क्यू पीत सा यूं हो गया
नजरें तेरी बदल गयी,प्रतीत सा यूं हो गया
ठहरी हुयी सी झील थी,कहां से ज्वार आ गया
पानी में खार आ गया,पानी में खार आ गया
पानी में खार......
डॉ.मोहन बैरागी
मेरी कविता के कुछ अंश आप भी पढि़ये......
जीवन के झंझावातों में कितना बिखरे कितना टूट गए
सपने थे सब सुरज के,पर अंधियारे लूट गये
धुप बराबर पुरी चौखट,फिर क्यु आधा उजियारा हे
जर्रा जर्रा रोशन करता,घर मेरे आकर के हारा हे
दीवारों पर पपड़ी देखी,और टकराकर लौट गया
शायद खुद के दिल पर भी,लेकर के कोई चोट गया
जीना किसको कहते,सुरज ने खुद आकर के देखा हे
तपता हु मैं उससे भी ज्यादा,कहती हाथो की रेखा हे
थकते,रूकते,चलते चलते,कितने किस्से आधे ही छुट गये
सपने थे सब सुरज के,पर अंधियारे लूट गये
जीवन के झंझावातों में.................
डॉ मोहन बैरागी
मेरी एक और कविता के कुछ अंश आप भी पढ़िये......
हम खयालों में भी अक्सर उनको सम्मुख पाते है
हम खडे से देखते और वो यु ही मुस्काते है
भोर के सुरज उजाले बाटतें हर सु फिरे
पर्वतो,पदियो,मरूथल या के जंगल से घिरे
बाद आती हे चमक भी,किरणो के आकार पर
सूद जैसे चढ गया खुद,कोई साहूकार पर
फिर उजाले बांटते,जब तुमसे रोशन हो जाते है
हम खयालों में भी अक्सर..........
वो किसी आंगन की तुलसी,द्वारा का सतिया वही
होठ से तो कुछ ना बोले,आॅंखो से बतिया वही
मंदिरों की घंटियों के स्वर सरीखी तान वो
अक्षतों,कुमकुम वही,ओर आरती की थाल वो
रोशनी खुद तुमसे लेकर,दीप भी जल जाते है
हम खयालों में भी अक्सर..........
हम खयालों में भी अक्सर उनको सम्मुख पाते है
हम खडे से देखते और वो यु ही मुस्काते है
डाॅ.मोहन बैरागी
09424014366
तुम धरा मैं गगन,हो नहीं जाउंगा
फिर पुकारोगी तब, मैं नही आउंगा
बांस ही का न टुकडा,यु समझो मुझे
चुम लोगी अधर से,तो गीत ही गाउंगा....
डॉ. मोहन बैरागी