Dr.Mohan Bairagi

Sunday, July 31, 2016

मन शरारती हे मन शरारती
तुम्हे ही तुम्हे ही ,बस तुम्हे ही, मोहब्बते पुकारती
मन शरारती,,,,,,,,
तितलियों सी शोखियां वो बांकपन
और ज़रा सी ज़ालिम अदा
बस तुझे ही बस तुझे ही देखे सभी
हो रहे हे देखो फ़िदा
पर मेरी नजर को तेरी नजर बस रहे निहारती
हे मन शरारती हे मन शरारती
,,,,,,,,,,
तुम गणित के शुन्य सी हो श्रंखला
और सभी हे बारहखड़ी
अग्र भाग पश्च भाग जिसमे लगो
उसकी कीमते घटी बड़ी
आँखों में नशा, होठों में नमी
क्या अदा हे मेरे यार की
हे  मन शरारती हे मन शरारती
,,,,,,,,,
मीत बन के प्रीत से तुम आओ ना
मन मेरा ये राहे तके
हे प्रणय के हे प्रणय के दिल में मेरे
कितने ही अरमा जगे
रोम रोम से धरा से व्योम से
हे सदा पुकारती ........
शरारती शरारती हे मन शरारती
तुम्हे ही तुम्हे ही, बस तुम्हे ही मोहब्बते पुकारती
मन शरारती हे मन शरारती

डॉ मोहन बैरागी
31/7/2016

Wednesday, July 27, 2016

सपने सोते नींदे जागे,जाने क्युं अब रातोंं को
किसने समझा,किसने जाना,एकाकी जज्बातोंं को

पुष्पित सारा मधुबन लेकिन,गंध हमारे पास नही
तेरा होना,मेरा होना,यह भी तो एहसास नहीं
एक अधुरा जीवन जैसे झोली लेकर चलते हैं
उदित होना तो सुक्ष्मभर ही,बाकी हर पल ढलते हैं
हम भी तो उपवन का हिस्सा हैं,तुमको क्या मालुम नहीं
छोडो किस्सा मेरा तुम तो,जाने भी दो बातों को
झरे पुष्प भी उठा लिये,छोड दिया क्युं पातो को
किसने समझा...............

उनकी अपनी उलझन,मेरा भी मन पानी सा
बहता जाता बिन मंजिल के,कोई अधुरी कहानी सा
जाने कौन कहां मिलेगा,हम भी,वो भी जाने ना
मीठा हो या खारा जल, एक दरिया मेंं रहते है
पोखर,झीलों,नदियों,तालाबों में बहते है
किस्से,कहानियों को छोडो,जाने भी दो बातों को
प्यास है मुझको भी सागर की, समझो ना हालातो को
किसने समझा...........

क्या उनके जैसा होना मुझकों, जो जीभर गरल पी गये
वैसे भी तो लगता जैसे,हर पल विष ही पीते है
किसकी चिंता किसको होती,सब अपने मेंं जीते है
हदय द्रवित हो,राहे तकता,फिर भी उनके आने का
खुद ही अपने मन को करते जाने क्युं समझाने का
खुद ही खुद को समझाना था,कह दिया तुमसे बातों को
जाने भी दो बातें, छोडो अब मीरा ओ सुकरातो को
किसने समझा...............

सपने सोते नींदे जागे,जाने क्युं अब रातोंं को
किसने समझा,किसने जाना,एकाकी जज्बातोंं को

डॉ.मोहन बैरागी
२७/७/२०१६

Monday, July 11, 2016

गोवा या गोआ
(कोंकणी: गोंय), क्षेत्रफल के
हिसाब से भारत का सबसे छोटा और जनसंख्या के हिसाब से चौथा सबसे छोटा राज्य है। पूरी दुनिया में गोवा अपने खूबसूरत समुंदर के किनारों और मशहूर स्थापत्य के लिये जाना जाता है। गोवा पहले पुर्तगाल का एक उपनिवेश था। पुर्तगालियों ने गोवा पर लगभग 500 सालों तक शासन किया और दिसंबर 1961 में यह भारतीय प्रशासन को सौंपा गया।
महाभारत में गोवा का उल्लेख गोपराष्ट्र यानि गाय चरानेवालों के देश के रूप में मिलता है। दक्षिण कोंकण क्षेत्र का उल्लेख गोवाराष्ट्र के रूप में पाया जाता है। संस्कृत के कुछ अन्य पुराने स्त्रोतों में गोवा को गोपकपुरी और गोपकपट्टन कहा गया है जिनका उल्लेख अन्य ग्रंथों के अलावा हरिवंशम और स्कंद पुराण में मिलता है। गोवा को बाद में कहीं कहीं गोअंचल भी कहा गया है। अन्य नामों में गोवे, गोवापुरी, गोपकापाटन औरगोमंत प्रमुख हैं। टोलेमी ने गोवा का उल्लेख वर्ष 200 के आस-पास गोउबा के रूप में किया है। अरब के मध्युगीन यात्रियों ने इस क्षेत्र को चंद्रपुर और चंदौर के नाम से इंगित किया है जो मुख्य रूप से एक तटीय शहर था। जिस स्थान का नाम पुर्तगाल के यात्रियों ने गोवा रखा वह आज का छोटा सा समुद्र तटीय शहर गोअ-वेल्हा है। बाद मे उस पूरे क्षेत्र को गोवा कहा जाने लगा जिस पर पुर्तगालियों ने कब्जा किया।
जनश्रुति के अनुसार गोवा जिसमें कोंकण क्षेत्र भी शामिल है (और जिसका विस्तार गुजरात से केरल तक बताया जाता है) की रचना भगवान परशुराम ने की थी। कहा जाता है कि परशुराम ने एक यज्ञ के दौरान अपने बाणो की वर्षा से समुद्र को कई स्थानों पर पीछे धकेल दिया था और लोगों का कहना है कि इसी वजह से आज भी गोवा में बहुत से स्थानों का नाम वाणावली, वाणस्थली इत्यादि हैं। उत्तरी गोवा में हरमल के पास आज भूरे रंग के एक पर्वत को परशुराम के यज्ञ करने का स्थान माना जाता है।
वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही प्रकृति गोवा को कुछ ऐसा ही अलग, लेकिन अदभुत स्वरूप प्रदान करती है। यह स्थान शांतिप्रिय पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को बहुत भाता है। गोवा में छोटे-बड़े लगभग 40 समुद्री तट है। इनमें से कुछ समुद्र तट अंर्तराष्ट्रीय स्तर के हैं। इसी कारण गोवा की विश्व पर्यटन मानचित्र के पटल पर अपनी एक अलग पहचान है।
गोवा के मनभावन बीच की लंबी कतार में पणजी से 16 किलोमीटर दूर कलंगुट बीच, उसके पास बागा बीच, पणजी बीच के निकट मीरामार बीच, जुआरी नदी के मुहाने पर दोनापाउला बीच स्थित है। वहीं इसकी दूसरी दिशा में कोलवा बीच ऐसे ही सागरतटों में से है जहां मानसून के वक्त पर्यटक जरूर आना चाहेंगे। यही नहीं, अगर मौसम साथ दे तो बागाटोर बीच, अंजुना बीच, सिंकेरियन बीच, पालोलेम बीच जैसे अन्य सुंदर सागर तट भी देखे जा सकते हैं।
पुर्तगाली शासन के आधीन रहने के कारण यहाँ यूरोपीय संस्कृति का प्रभाव बहुत महसूस होता है। गोवा की लगभग 60त्नप्रतिशत जनसंख्या हिंदू और लगभग 28 प्रतिशतत्न जनसंख्या ईसाई है। गोवा की एक खास बात यह है कि, यहाँ के ईसाई समाज में भी हिंदुओं जैसी जाति व्यवस्था पाई जाती है।
गोवा के दक्षिण भाग में ईसाई समाज का ज्यादा प्रभाव है लेकिन वहाँ के वास्तुशास्त्र में हिंदू प्रभाव दिखाई देता है। सबसे प्राचीन मन्दिर गोवा में दिखाई देते है। उत्तर गोवा में ईसाइ कम संख्या मे हैं इसलिए वहाँ पुर्तगाली वास्तुकला के नमूने ज्यादा दिखाई देते है।
संस्कृति की दृष्टि से गोवा की संस्कृति काफी प्राचीन है। 1000 साल पहले कहा जाता है कि गोवा "कोंकण काशी" के नाम से जाना जाता था। हालाँकि पुर्तगाली लोगों ने यहाँ के संस्कृति का नामोनिशान मिटाने के लिए बहुत प्रयास किए लेकिन यहाँ की मूल संस्कृति इतनी मजबूत थी की धर्मांतरण के बाद भी वो मिट नही पाई।
कमीशनखोरी के अडडे अस्पताल,बिगडती सेहत,मरीजों के बुरे हाल

नजी अस्पतालों ने छोड रखे है दलाल,मरीजों को लाने पर देते है मोटा कमीशनदवा से लेकर पैथालाजी की जांचे व डाक्टरों के कमीशन तय होते है

अक्षर वार्ता/डॉ.मोहन बैरागी/उज्जैन। नये शहर स्थित गुरुनानक अस्पताल में शनिवार को अस्पताल में बुलाकर चन्द्रावतीगंज निवासी गोपाल शर्मा की पीटपीट कर हत्या कर दी गई। मारपीट करने वाले अस्पताल के मेनेजर सहित आधा दर्जन आरोपियों पर माधवनगर थाना में प्राणघातक हमले सहित हत्या का प्रकरण दर्ज किया गया है।जानकारी के अनुसार गोपाल को अस्पताल के कर्मचारियों ने लटठ व पाईप से इतना मारा की उसकी मौत हो गई। जानकारी के अनुसार अस्पताल में मरीजों को लाने की दलाली और चोरी के कारण गुरुनानक अस्पताल के कर्मियों ने गोपालको अस्पताल बुलाकर मारपीट कर हत्या कर दी। 
 अभ् ाी संभ् ााग के सबसे बड़े अस्पलात चरक सुर्खियों में था ही कि एक और अस्पताल ने दलाली के चक्कर मे  एक आदमी की जान ले ली। और इस बार अस्पताल प्रबंधन ने इसे खुद अस्पाल में बुलाकर इतना पीटा की इसकी जान ही चली गयी। जहां मौत के मुंह से निकालकर जीवन देने की जगह हो वहीं बुलाकर मौत दे दी जाये तब क्या कहा जाय। शहर के हर अस्पताल ने अपने अपने दलाल बाजार में छोड़ रखे है जो मरीजो को कम खर्च में अच्छे इलाज का बहाना बनाकर इन अस्पतलों ले जाते है जिसके एवज में इन्हे तगड़ा कमीशन मिलता है। आगर रोड़ का सरकारी अस्पताल,चरक अस्पताल,माधव नगर का सरकारी अस्पताल एैसी जगह है जहां दलाल सक्रीय होकर घुमते रहते है तथा बाहर से आने वाले मरीज के परिजनो से दोस्ती कर निजी नर्सिंग होग में अच्छे इलाज करवाने का भ् ारोसा देकर यहां से ले जाते है। दलाली का यह धंधा इस कदर पनप रहा है कि सभ् ाी बड़े निजी नर्सिंग होम ने मरीजो को लाने पर कमीशन तय कर रखे है। बाद में इन बीमारों से मंहगी जांचे,दवांईयों के नाम पर हजारो-लाखों  रुपये ले लिये जाते है। सुत्रों की माने तो शहर में करीब २०० से ज्यादा दलाल सक्रीय है जिनमें सरकारी और निजी अस्पतालों के कर्मचारी सहित,छोटी कालोनियों में प्रेक्टिस करने वाले नकली डॉक्टर भ् ाी शामिल है।  सेहत के दलाल,बड़े बड़े अस्पताल इन दिनों खुब चांदी काट रहे है। मरीजों की जान से जाय तो जाये इन्हे अपनी तिजोरी भ् ारने से मतलब होता है।
ये जगह जहां दलाल सक्रिय
मरीजों की सेहत से खेलने वाले दलाल शहर में कई स्थानों पर सक्रिय है तथा ग्रामीण इलाकों से आये भ् ाोले भ् ााले लोगो को झांसा देकर निजी अस्पतालों मे ले जाते है जहां अच्छे इलाज के नाम पर हजारो लाखों रुपये लुट लिये जाते है। शहर में इस तरह के दलालों ने अपने स्थाई अडडे बना रखे है जहां ये देखकर समझ जाते है कि आदमी अस्पताल जाने वाला है। शहर के ये अडडे, रेलवे स्टेशन,देवास गेट बस स्टेण्ड,जिला चिकित्सालय,चामुण्डा माता चौराहा,बहादुर गंज,चरक के बाहर, माधव नगर अस्पताल,चेरीटेबल अस्पताल तथा आर डी गार्डी के बाहर आदि।
निजी अस्पतालों ने पैदा किये दलाल
निजी अस्पतालों ने व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा और अस्पताल चलाने के लिए शहर में मरीज लाने के लिए शहर के अंदर ही नहीं वरन आस पास के ग्रामीण इलाकों में भ् ाी दलाल पैदा कर दिये है। ये दलाल अपने कमीशन के चक्कर में भ् ाोले भ् ााले ग्रामिणों को बहलाकर इन अस्पतालों में ले आते है जहां ईलाज के नाम पर मरीज के परिजनों से हजारों लाखों रुपये ले लिये जाते है,जिसमें अस्पताल का शुल्क,डॉक्टर का शुल्क,दवाईयां आदि का खर्च ही होता है। इन निजी अस्पतालों ने मेडिकलस्टोर संचालकों से लेकर आस पास के गांवों में व छोटी कालोनियों में बैठे नकली डॉक्टरों को भ् ाी दलाल के रुप में इस्तेमाल किया जाता है।
अस्पताल में हर चीज का कमीशन
एक बार मरीज के परिजन यदि मरीज को अस्पताल में एडमिट कर देते है उसके बाद तो खर्चे को कोई पैमाना नही है। क्युंकि कैसा भ् ाी मरीज हो इन अस्पतालों में हर मरीज को इन्वेस्टीगेशन करवाना पडती है। बहुत सारी जांचे तो इन अस्पतालोंं में ही हो जाती है जिनमें नाम मात्र का खर्च आता है लेकिन मरीज के परिजनों से उसके जी हजारों रुपये  वसुल लिये जाते है। जो जांचे इन अस्पतालों में नहीं हो पाती उन्हे ये अस्पताल अपने जान पहचान के पेथालाजी में भ् ोजते है जहां से तगड़ा कमीशन अस्पताल व डाक्टर को मिलता है। इस पर भ् ाी खास बात यह कि इन जांचों को करने वाले अप्रशिक्षीत टेक्निशियन होते है और पेथोलोजिस्ट के हस्ताक्षर से जांच रिपोर्ट जारी हो जाती है,जिसके सटीक होने पर संदेह होता है। अभ् ाी हाल ही में एक होटल व्यवसायी के पुत्र को एक जांच केन्द्र पर अपेडिक्स बताया गया तथा दुसरी जगह नार्मल बताया गया। हद तो तब है जब कमीशन के चक्कर में शहर में कई पैथालाजी सेंटर टेक्निशियनों द्वारा ही संचालित किये जा रहे है,और पेथालाजिस्ट डाक्टर को कमीशन देकर जांच पर साईन करवा लिये जाते है।
मेडिकल एक्ट की अनदेखी
सभ् ाी निजी नर्सिंंग होग शासन के मेडिकल प्रेक्टिशनर व नर्सिंग होम एक्ट के नियमों के विपरित चल रहे है। शासन के नियमानुसार कोई  भ् ाी डॉक्टर व नर्सिंग होम विज्ञापन नही कर सकते है लेकिन इन डॉक्टरों व नर्सिंग होम के बड़े बड़े विज्ञापन अखबारों व शहर में होर्डिंगों पर नजर आते है। जाहिर हे ये सब स्वास्थ्य विभ् ााग के आला अधिकारियों की शै के बिना नहीं हो सकता। 

Thursday, October 9, 2014

संस्कृति कर्म को प्रोत्साहित करना ना भुले मीडिया
राष्ट्रीय परिसंवाद एवं सम्मान समारोह में विद्वानो ने जताई चिंता
उज्जैन। बदलते दौर और व्यावसायिकता का गहरा प्रभाव पत्रकारिता पर दिखाई दे रहा हैं। एैसे में भारतीय मीडिया जगत संस्कृति कर्म को प्रोत्साहित करना भुलने लगा है,जबकि विदेशो में हमारी संस्कृति के आर्वâर्षण को जिंदा रखा जा रहा है। यहां के मीडिया को चाहिये कि भाषा और संस्कृति को लेकर सजगता लाये और लिपि को बचाने में भी अपना योगदान दें। 
यह सीख वरिष्ठ मीडिया विशेषज्ञ एवं बैंक ऑफ बडौदा मुंबई के उप महा प्रबंधक डॉ.जवाहर कर्नाटक ने दी। वे रविवार को कालिदास अकादमी के अभिरंग नाट्यगृह में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद एंव सम्मान समारोह में बोल रहे थे। संस्था कृष्णा बसंती और झलक निगम सांस्कृतिक न्यास के इस आयोजन में दैनिक भास्कर के एमपी-२ हेड नरेन्द्र सिंह अकेला ने भी पत्रकारिता के क्षैत्र में आ रहे बदलाव पर अपने विचार रखा, कहा कि बीते दौर में सीमित संसाधनों में पत्रकारिता का बेहतर निर्वहन होता था। आज संसाधन और सुविधाएं बढी तो पत्रकारिता के ज्ञान का अभाव दिखाई देता है। इस क्षैत्र के लोगों में समर्पण और लगन के साथ ही अपने दायित्वों की जिम्मेदारी का अभाव झलकता है। समारोह की अध्यक्षता कर रहें विक्रम वि वि के कुलानुशासक डॉ.शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने संस्कृति और समाज को गति देने में पत्रकारिता को आगे आने की बात की। डॉ.लक्ष्मीनारायण पयोधि ने आंचलिक पत्रकारिता के लिए क्षैत्रिय समाज और संस्कृति की पृष्ठभुमि का ज्ञान जरुरी होने पर जोर दिया। वरिष्ठ पत्रकार एवं कला समीक्षक विनय उपाध्याय ने संस्कृति कर्म को लेकर मीडिया में उपेक्षा का का जिक्र करते हुए इसे अनुचित करार दिया और कला और जीवन के अटुट रिश्ते को समझने की बात कही। डॉ.भगवती लाल राजपुरोहित ने स्वर्गीय झलक निगम के मालवी साहित्य एवं सस्कृति के क्षैत्र में उनके अवदान पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष गौड ने भी स्वर्गीय निगम के मालवी के संवर्धन के लिए व्यापक प्रयत्न का उल्लेख किया। कार्यक्रम के शुभारंभ में लेखिका सुशीला निर्मोही के पांचवें काव्य संग्रह ‘कलरव’ तथा अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका अक्षर वार्ता का लोकापर्ण अतिथियों द्वारा किया गया। 
इसके अलावा प्रसन्नता शिंदे के अग्रेजी उपन्यास डिस्क्रीमिनेशन अगेंस्ट मेन ‘ए ट्रू लव टेल’ के कवर पेज का विमोचन किया। ‘कलरव’ की समीक्षा व्यंगकार डॉ.पिलकेन्द्र अरोरा ने की। अतिथि परिचय डॉ.जगदीशचंद्र शर्मा ने दिया। संस्था कृष्णा बसंती की गतिविधियों एवं उद्देश्यों की जानकारी संस्था अध्यक्ष डॉ.मोहन बैरागी ने दी,वहीं झलक निगम सांस्कृतिक न्यास की जेड श्वेतिमा निगम ने भी संस्था की जानकारी दी। इसी बीच संस्था कृष्णा बसंती द्वारा साहित्य,पत्रकारिता,लेखन एवं कला आदि क्षैत्र में योगदान देने वालों को सम्मानित किया गया। अतिथि स्वागत श्वेतिमा निगम,रुचिर प्रकाश निगम,डॉ. मोहन बैरागी,निशा बैरागी,भावना निगम,डॉ.ओ.पी.वैष्णव,सुरेश बैरागी, कृष्णदास बैरागी आदि ने किया। सरस्वती वंदना मालवी कवि मोहन सोनी ने की,परिसंवाद का संचालन श्री जीवनप्रकाश आर्य ने किया,वृहद काव्य गोष्ठी का संचालन कृष्णदास बैरागी द्वारा किया गया,जबकि पुस्तक विमोचन का संचालन कार्यक्रम का संचालन राजेश चौहान राज ने किया। आभार कृष्णा बसंती के डॉ.ओ.पी.वैष्णव ने माना।
इनका किया सम्मान- साहित्य के क्षैत्र में वरिष्ठ कवि मोहन सोनी,व्यंग्यकार पिलकेन्द्र अरोरा,शायर रमेशचंद्र ‘सोज’,कवि अरविंद त्रिवेदी ‘सनन’,गीतकार वैâलाश ‘तरल’,लघुकथाकार संतोष सुपेकर,रचना कार संदीप सृजन,व्यंग्यकार राजेन्द्र देवधरे,गीतकार राजेश चौहान ‘राज’,पक्षी वैज्ञानिक डॉ. जे पी एन पाठक,चित्रकार अक्षय आमेरिया,पत्रकार राजीव सिंह भदौरिया (दैनिक भास्कर),रवि चंद्रवंशी (पत्रिका),निरुक्त भार्गव (प्रâीप्रेस) और सुधीर नागर (नई दुनिया) के अलावा इलेक्ट्रानिक मीडिया से फोटो जर्नलिस्ट प्रकाश प्रजापत (नईदुनिया) तथा सुनील मगरिया (हिंदुस्तान टाईम्स) 






Tuesday, September 16, 2014

कौन है जो फिर से एक और सभरवाल कांड चाहता है ।
मोहन बैरागी/अक्षरवार्ता
उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय में सोमवार को एक और सभरवाल कांड हो जाता,गनीमत रही की मौके पर पुलिस और विश्वविद्यालय के अधिकारी कर्मचारियों ने मामला संभाल लिया। इस बार भी आरोप भगवा ब्रिगेड पर है। सोमवार की शाम भारतीय जनता पार्टी का एक अनुषांगिक संग'न के २५-३० कार्यकर्ता हाथो में ला'ियां लेकर विक्रम विश्वविद्यालय में कुलपति कक्ष में पहुँच गये,इनके हाथों में डंडे और शायद कुलपति को कालिख लगाने के लिए आईल की केन थी। ये कुलपति के उस बयान से नाराज थे जो उन्होनें विक्रम विश्वविद्यालय में पढ़ रहें कश्मीरी छात्रों के लिए दिया था। कुलपति डॉ. जवाहर लाल कौल ने मीडिया में कश्मीर में आई बाढ़ के कारण विक्रम विश्वविद्यालय में पढ़ रहे कश्मीरी छात्रों के लिए मदद की अपील की थी,उन्होनें कहा था कि इन विद्याथिNयों से रहने का किराया ना लिया जाए। कुलपती के इस बयान से भगवा ब्रिगेड के एक अनुषांगिक संग'न ने कुलपती पर हमला ही बोल दिया,इनका कहना था कि कुलपती अपना बयान वापस लें। इस पर कुलपति का कहना था की इतनी बड़ी आपदा पर देश के प्रधानमंत्री लोगों से मदद की अपील कर रहे हैं तब मैनें भी अपील कर दी तो कौन सा गुनाह कर दिया। इस पर भगवा ब्रिगेड के कार्यकर्ता भड़क गए और उन्होनें कुलपति कक्ष की टेबल तथा अलमारियों के कांच तोड़ दियें वे कुलपति की नेमप्लेट को भी तोड़ दिया। ज्ञात रहें की पुर्व में भी उज्जैन के माधव महाविद्यालय में प्रोपेâसर सभरवाल कांड हुआ था,जिसमें इसी प्रकार से छात्र संघ चुनाव के समय कुछ लोगों ने प्रोपेâसर सभरवाल के साथ झुमा झुटकी की थी जिसके कारण मौके पर पर प्रो.सभरवाल की मौत हो गई थी। तथा इस कांड की चर्चा पुरे देश में हुई थी। तब भी भाजपा के एक आनुषांगिक संग'न के पदाधिकारियों का नाम आया था तथा बाद में कई वर्षो तक इन पदाधिकारियों को जेल भी काटना पड़ी थी। एैसा क्युँ होता की भाजपा की सरकार में ये इतने उद्दण्ड और उछशृंखल हो जाते है,शैक्षणिक वातावरण मेें इस तरह की घटनाओं से वर्तमान पीढ़ी जिसके भविष्य का निर्माण इस संस्थाओं में हो रहा है उन पर क्या प्रभाव पड़ता होगा,वर्तमान ज्यादातर देखा जा रहा है कि उम्र में कम विंâतु अपनी पहचान अधिकतम लोगों तक बनाने की ललक इन युवाओं को राजनीति अथवा इसके सहयोगी संग'नों तक ला रही है,ओर राजनैतिक संग'न भी इससे परहेज नहीं कर रहें है। किसी भी पार्टी का काई भी कार्यक्रम हो अथवा किसी भी नेता का जन्म दिन हो,इस दुसरे दिन इन युवाओं के चेहरे वाले होर्डिंग्स हर शहर के प्रमुख चौराहों पर नजर आ जाते है। क्या ये सच्ची राजनीति सीख रहे है या फिर अपना भविष्य और शिक्षा दोनों के साथ खिलवाड़ कर रहें है। क्युँ इन संस्थाओं में इस तरह है हालात पैदा हो रहें है ओर आश्चर्यजनक बात ये है कि प्रमुख राजनैतिक संग'न के बड़े ओर बुद्धिजीवी भी इस पर कोई रोक नही लगा रहें है,क्या उन्हे नहीं दिखाई देता है कि शिक्षा का वातावरण कितना खराब हो रहा है,कोई शिक्षक अब शिक्षक नही रह गया,वो इन छुटभैये नेतानुमा विद्याथिNयोंं के वंâधे पर हाथ रख कर इनसे दोस्ती को मजबुर है। वो जानता है कि इन छात्रों को साथ लेकर चलेंगे तो अपनी नौकरी 'ीक से कर पाऐंगे। लेकिन इन सारे हालात पर कई सारे सवाल खड़े होते है और इन सवालों के जवाब भी इन्हीं सब जिम्मेदारों के पास है,अगर इन सवालों के जवाब नही ं दिये गये ओर व्यवस्थाओं में बदलाव नहीं किये गये तो शिक्षा,शिक्षण संस्थान,राजनैतिक संग'न और युवा इन सब में नैतिक गिरावट होती रहेगी और इसकी जिम्मेदारी भी हम सब जिम्मेदारों की होगी।