Dr.Mohan Bairagi

Sunday, June 14, 2026

जीवन की त्रिज्या : केंद्र से परिधि तक मनुष्य की अनंत यात्रा

 

जीवन की त्रिज्या : केंद्र से परिधि तक मनुष्य की अनंत यात्रा


लेखक - डॉ. मोहन बैरागी 



कहा जाता है कि संसार की सबसे बड़ी खोज अमेरिका की खोज नहीं थी, न गुरुत्वाकर्षण की खोज थी, न बिजली की खोज थी। संसार की सबसे बड़ी खोज मनुष्य द्वारा स्वयं को खोजने की खोज थी। विडंबना यह है कि हजारों वर्षों की सभ्यता, विज्ञान, दर्शन और प्रौद्योगिकी के बाद भी मनुष्य आज तक स्वयं को पूरी तरह नहीं खोज पाया है। वह चंद्रमा तक पहुँच गया, मंगल ग्रह तक यान भेज दिया, समुद्र की गहराइयों को माप लिया, परमाणु को तोड़ दिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना ली, लेकिन अपने ही मन की गहराई को नहीं माप सका।

यहीं से "जीवन की त्रिज्या" का दर्शन प्रारंभ होता है।

गणित हमें बताता है कि वृत्त का अस्तित्व उसकी त्रिज्या पर निर्भर करता है। त्रिज्या न हो तो वृत्त नहीं बन सकता। केंद्र और परिधि के बीच जो अदृश्य संबंध है, वही त्रिज्या है। यदि इस सरल गणितीय तथ्य को जीवन पर लागू करें तो एक अद्भुत दर्शन हमारे सामने खुलता है।

जीवन भी एक वृत्त है।

उसका एक केंद्र है और एक परिधि।

केंद्र है—आत्मा, चेतना, विवेक, संवेदना, अंतर्मन।

परिधि है—धन, पद, परिवार, समाज, सत्ता, प्रेम, संघर्ष, उपलब्धियाँ, असफलताएँ और जीवन के समस्त बाहरी अनुभव।

इन दोनों को जोड़ने वाली रेखा ही जीवन की त्रिज्या है।

समस्या तब शुरू होती है जब मनुष्य परिधि को ही जीवन समझ बैठता है और केंद्र को भूल जाता है।

आज का मनुष्य सुबह उठते ही मोबाइल देखता है। वह दुनिया की खबर जानना चाहता है, लेकिन अपने भीतर की खबर नहीं। उसे यह पता है कि शेयर बाजार ऊपर गया या नीचे, लेकिन यह नहीं पता कि उसके भीतर का संतुलन ऊपर जा रहा है या नीचे। वह हजारों लोगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन स्वयं से कटा हुआ है।

यह आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा व्यंग्य है।

मनुष्य ने संचार के साधन बढ़ाए हैं, संवाद की क्षमता नहीं।

घर बड़े बनाए हैं, परिवार छोटे कर लिए हैं।

जानकारी बढ़ाई है, समझ कम कर ली है।

परिधि बढ़ी है, केंद्र सिकुड़ गया है।

भारतीय दर्शन हजारों वर्षों से इसी संकट की ओर संकेत करता आया है।

उपनिषदों का समस्त चिंतन मनुष्य को उसके केंद्र तक पहुँचाने का प्रयास है। "तत्त्वमसि", "अहं ब्रह्मास्मि", "अयमात्मा ब्रह्म"—ये केवल दार्शनिक सूत्र नहीं हैं। ये मनुष्य को यह याद दिलाने वाले वाक्य हैं कि तुम्हारा वास्तविक अस्तित्व बाहर नहीं, भीतर है।

ऋषियों ने देखा कि मनुष्य बाहर की वस्तुओं के पीछे भागते-भागते स्वयं को खो देता है। इसलिए उन्होंने कहा कि जिस सत्य को तुम संसार में खोज रहे हो, वह तुम्हारे भीतर बैठा है।

यह विचार केवल भारतीय दर्शन तक सीमित नहीं है।

सुकरात ने कहा था—

"Know Thyself" अर्थात् स्वयं को जानो।

यह पश्चिमी दर्शन का सबसे प्रसिद्ध वाक्य है।

यदि ध्यान से देखें तो उपनिषदों का "आत्मानं विद्धि" और सुकरात का "Know Thyself" एक ही दिशा में संकेत करते हैं। दोनों मनुष्य को उसके केंद्र तक लौटने का निमंत्रण देते हैं।

लेकिन मनुष्य का स्वभाव विचित्र है।

वह अपने घर की चाबी खो जाए तो पूरा घर सिर पर उठा लेता है, लेकिन स्वयं को खो दे तो उसे पता भी नहीं चलता।

वह बैंक पासबुक संभालकर रखता है, लेकिन अपने मन की किताब कभी नहीं पढ़ता।

यही कारण है कि बाहरी समृद्धि के बावजूद आंतरिक रिक्तता बढ़ती जा रही है।

कबीर ने इसी विडंबना को एक पंक्ति में पकड़ लिया—

"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे वन माहि।"

हिरण अपनी नाभि में सुगंध लिए जंगलों में भटकता रहता है। मनुष्य भी उसी हिरण की तरह है। सुख भीतर है, लेकिन वह उसे वस्तुओं में खोजता है। शांति भीतर है, लेकिन वह उसे पदों में खोजता है। प्रेम भीतर है, लेकिन वह उसे प्रतिष्ठा में खोजता है।

जीवन की त्रिज्या का पहला सिद्धांत यही है कि परिधि की यात्रा तभी सार्थक है जब केंद्र से संबंध बना रहे।

भगवद्गीता में अर्जुन का संकट भी यही था। वह युद्धभूमि में खड़ा था। उसकी परिधि अस्त-व्यस्त हो गई थी। रिश्ते, कर्तव्य, नैतिकता, भावनाएँ—सब टकरा रहे थे। श्रीकृष्ण ने उसे बाहर का समाधान नहीं दिया। उन्होंने पहले उसके भीतर को व्यवस्थित किया।

गीता का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन की परिधि को ठीक करने से पहले केंद्र को स्थिर करना आवश्यक है।

क्योंकि केंद्र विचलित होगा तो निर्णय भी विचलित होंगे।

केंद्र स्थिर होगा तो तूफान में भी संतुलन बना रहेगा।

बुद्ध का जीवन भी जीवन की त्रिज्या का अद्भुत उदाहरण है।

राजमहल उनके लिए परिधि था। वैभव परिधि था। सत्ता परिधि थी। लेकिन उन्होंने देखा कि इन सबके बावजूद मनुष्य दुखी है। तब उन्होंने केंद्र की खोज प्रारंभ की।

बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ, वह किसी नई वस्तु की खोज नहीं थी। वह अपने ही केंद्र की पुनर्खोज थी।

इसलिए बुद्ध ने संसार छोड़ने का नहीं, मोह छोड़ने का संदेश दिया।

उन्होंने कहा कि दुख का कारण वस्तुएँ नहीं हैं, उनसे जुड़ी हमारी आसक्ति है।

यही त्रिज्या का दूसरा सिद्धांत है—परिधि में रहो, पर उसके दास मत बनो।

यहीं से साहित्य इस दर्शन को और अधिक मानवीय बना देता है।

तुलसीदास के राम केवल धार्मिक पात्र नहीं हैं। वे मर्यादा के केंद्र हैं। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, पर उनका केंद्र नहीं बदलता।

वनवास मिला, केंद्र नहीं बदला।

राज्य मिला, केंद्र नहीं बदला।

वियोग मिला, केंद्र नहीं बदला।

यही स्थिरता उन्हें कालजयी बनाती है।

सूरदास के कृष्ण प्रेम की ऐसी त्रिज्या रचते हैं जिसमें पूरा ब्रज समा जाता है।

मीरा अपने समय की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति हैं। उन्होंने परिधि की सारी सीमाएँ तोड़ दीं, लेकिन अपने केंद्र—कृष्ण प्रेम—को नहीं छोड़ा।

कबीर ने तो मानो जीवन की त्रिज्या का पूरा दर्शन ही कविता में लिख दिया।

वे पंडितों पर हँसते हैं, मुल्लाओं पर हँसते हैं, समाज पर हँसते हैं और सबसे अधिक मनुष्य की मूर्खताओं पर हँसते हैं।

क्यों?

क्योंकि उन्होंने देखा कि लोग परिधि के लिए लड़ रहे हैं और केंद्र को भूल चुके हैं।

आज भी दृश्य अलग नहीं है।

लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं लेकिन धर्म के मूल गुण—करुणा, प्रेम और सत्य—को भूल जाते हैं।

लोग राजनीति के लिए मित्रता तोड़ लेते हैं।

लोग संपत्ति के लिए भाई से शत्रु बन जाते हैं।

लोग अहंकार के लिए जीवनभर संबंध खोते रहते हैं।

यह सब परिधि का युद्ध है।

केंद्र का नहीं।

और जब परिधि केंद्र से कट जाती है, तब जीवन की त्रिज्या टूट जाती है।


...और शायद यहीं से जीवन की त्रिज्या का सबसे रोचक, सबसे मानवीय और सबसे व्यंग्यपूर्ण पक्ष आरंभ होता है। क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्य अपनी त्रिज्या बढ़ाने निकलता है, वैसे-वैसे उसे यह भ्रम भी होने लगता है कि वह स्वयं ही केंद्र है और संसार उसकी परिधि।

यहीं जीवन एक हल्की मुस्कान के साथ मनुष्य को देखता है।

पृथ्वी पर जितने भी महान साम्राज्य बने, वे सब इसी भ्रम में बने कि उनकी त्रिज्या अनंत है। मिस्र के फ़राओ, सिकंदर, चंगेज़ ख़ाँ, नेपोलियन, हिटलर—सभी ने अपने-अपने समय में समझा कि उनका वृत्त ही संसार का सबसे बड़ा वृत्त है। लेकिन इतिहास का व्यंग्य देखिए कि आज उनकी विशाल सेनाएँ इतिहास की पुस्तकों में कुछ पन्नों तक सिमट गई हैं। जिस व्यक्ति ने आधी दुनिया जीतने का स्वप्न देखा था, उसकी कब्र भी अंततः कुछ हाथ भूमि में ही समा गई।

कबीर शायद इसी विडंबना को देखकर हँस पड़े थे—

"माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहि।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहि॥"

यह दोहा केवल मृत्यु का बोध नहीं कराता, बल्कि मनुष्य की उस अहंकारी त्रिज्या पर भी व्यंग्य करता है जो स्वयं को ब्रह्मांड से बड़ा समझ बैठती है।

आधुनिक समय में यह व्यंग्य और भी मनोरंजक हो गया है। पहले मनुष्य गाँव का चौधरी बनकर संतुष्ट हो जाता था। अब वह सोशल मीडिया का सम्राट बनना चाहता है। पाँच सौ मित्र, पाँच हजार फॉलोअर और पचास हजार लाइक देखकर उसे लगता है कि उसकी त्रिज्या ब्रह्मांड तक पहुँच गई है। लेकिन वही व्यक्ति रात को अकेले कमरे में बैठा हुआ किसी के एक संदेश की प्रतीक्षा करता रहता है। यह आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा हास्य है कि दुनिया से जुड़े रहने की तकनीक बढ़ती गई और मनुष्य स्वयं से कटता गया।

हिंदी साहित्य ने इस मानवीय विडंबना को बहुत गहराई से समझा है। प्रेमचंद के होरी के पास न कोई सत्ता थी, न प्रतिष्ठा, न संपत्ति; लेकिन उसके जीवन की त्रिज्या इतनी बड़ी थी कि वह आज भी करोड़ों पाठकों की संवेदना का हिस्सा है। दूसरी ओर अनेक धनवान पात्र अपने समय में प्रसिद्ध रहे, लेकिन साहित्य ने उन्हें याद नहीं रखा। इसका कारण स्पष्ट है—साहित्य परिधि नहीं, त्रिज्या मापता है। वह यह नहीं देखता कि व्यक्ति कितना बड़ा था; वह यह देखता है कि उसकी मनुष्यता कितनी दूर तक फैली थी।

सूरदास के कृष्ण, तुलसी के राम, कबीर का निर्गुण ब्रह्म, मीरा का प्रेम—इन सबकी त्रिज्या समय और स्थान की सीमाओं को पार कर गई। पाँच सौ वर्ष बाद भी लोग उन्हें पढ़ते हैं, गाते हैं, याद करते हैं। दूसरी ओर उस समय के कितने ही राजा और सामंत इतिहास के अंधकार में खो गए। साहित्य का न्याय बड़ा विचित्र होता है। वह सिंहासन नहीं बचाता, संवेदना बचाता है।

यहाँ हरिशंकर परसाई याद आते हैं। यदि वे "जीवन की त्रिज्या" पर लिखते तो शायद कहते कि आज का आदमी अपनी त्रिज्या बढ़ाने के लिए इतना व्यस्त है कि उसे यह देखने की फुर्सत ही नहीं कि उसका केंद्र कहाँ है। वह स्वास्थ्य के लिए दौड़ता है, लेकिन तनाव साथ लेकर दौड़ता है। वह समय बचाने के लिए मशीनें खरीदता है, फिर उसी बचे हुए समय को मोबाइल पर नष्ट कर देता है। वह सुख खोजता है, लेकिन सुख मिलने के बाद भी चिंतित रहता है कि कहीं यह सुख कम न पड़ जाए। यह ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति कुआँ खोदकर पानी निकाल ले और फिर उसी पानी में डूबने लगे।

शरद जोशी होते तो शायद लिखते कि आधुनिक मनुष्य की त्रिज्या का नया नाम "नेटवर्क कवरेज" है। जहाँ तक सिग्नल पहुँच जाए, वहीं तक जीवन है। सिग्नल चला गया तो दर्शन भी चला गया, प्रेम भी चला गया और धैर्य भी चला गया। कभी-कभी लगता है कि बैटरी प्रतिशत और आत्मविश्वास प्रतिशत में कोई गहरा संबंध स्थापित हो चुका है।

लेकिन इन सब हास्यास्पद स्थितियों के बीच जीवन अपना गंभीर सत्य नहीं छोड़ता।

नीत्शे का अतिमानव, कामू का विद्रोही मनुष्य, गांधी का सत्याग्रही, विवेकानंद का आत्मविश्वासी युवक और आइंस्टीन का ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ संवेदनशील वैज्ञानिक—सभी अंततः हमें एक ही दिशा में ले जाते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की महानता उसकी उपलब्धियों में नहीं, उसके विस्तार में है। वह कितना धनवान है, यह महत्वपूर्ण नहीं; वह कितनों के जीवन में प्रकाश बन सका, यह महत्वपूर्ण है।

यही कारण है कि एक साधारण शिक्षक कभी-कभी किसी बड़े उद्योगपति से अधिक बड़ी त्रिज्या रखता है। एक माँ का प्रेम किसी साम्राज्य से बड़ा हो सकता है। एक लेखक का शब्द किसी सेना से अधिक दूर तक यात्रा कर सकता है। एक किसान का श्रम किसी मंत्री के भाषण से अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। संसार का गणित और जीवन का गणित एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।

जीवन के इस पूरे विमर्श में सबसे सुंदर तथ्य यह है कि त्रिज्या बढ़ाने के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए केवल मनुष्य बने रहने की आवश्यकता होती है। करुणा, संवेदना, प्रेम, सह-अस्तित्व, क्षमा और आत्मबोध—ये जीवन की वास्तविक त्रिज्याएँ हैं। इन्हें बढ़ाने वाला व्यक्ति कभी छोटा नहीं रहता, चाहे उसके पास कोई पद हो या न हो।

अंततः जीवन का पूरा वृत्त एक अद्भुत व्यंग्य के साथ पूर्ण होता है। मनुष्य जन्म लेते समय खाली हाथ आता है और जाते समय भी खाली हाथ चला जाता है। बीच का पूरा जीवन वह संग्रह में लगा देता है। मकान, पद, प्रतिष्ठा, बैंक बैलेंस, प्रमाणपत्र, पुरस्कार—सब इकट्ठा करता रहता है। फिर एक दिन समय मुस्कराकर पूछता है—"यह सब ठीक है, पर तुम्हारी त्रिज्या कितनी थी?" अर्थात् तुम कितनी दूर तक मनुष्य बने रहे? कितनी दूर तक तुम्हारी करुणा पहुँची? कितनी दूर तक तुम्हारा प्रेम गया? कितनी दूर तक तुम्हारी स्मृति लोगों के जीवन में उजाला बन सकी?

और तब शायद मनुष्य को समझ में आता है कि जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार कोई सम्मान-पत्र नहीं, बल्कि किसी की आँखों में बची हुई वह कृतज्ञता है जो हमारे जाने के बाद भी जीवित रहती है।

इसलिए जीवन को यदि किसी एक सूत्र में बाँधना हो तो कहा जा सकता है कि जीवन न तो केवल केंद्र है, न केवल परिधि। जीवन केंद्र से परिधि तक की वह सतत यात्रा है जिसमें मनुष्य स्वयं को खोजते-खोजते समस्त मानवता तक पहुँचता है। यही यात्रा उसकी त्रिज्या है, यही उसका दर्शन है, यही उसका साहित्य है और यही उसका अंतिम सत्य।

और शायद इसी कारण संसार के सारे वृत्त एक दिन समाप्त हो जाते हैं, पर मनुष्यता की त्रिज्या कभी समाप्त नहीं होती। वह एक हृदय से दूसरे हृदय तक, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक पुस्तक से दूसरी पुस्तक तक और एक स्मृति से दूसरी स्मृति तक निरंतर फैलती रहती है। यही जीवन का सबसे सुंदर गणित है—जिसमें जोड़ते-जोड़ते व्यक्ति स्वयं मिट जाता है, पर उसकी त्रिज्या अमर हो जाती है।


लेखक - डॉ. मोहन बैरागी

Saturday, June 13, 2026

सभ्यता का सैल्फी स्टैंड : दर्पण से डरता मनुष्य और प्रदर्शन का युग

 सभ्यता का सेल्फी-स्टैंड : दर्पण से डरता मनुष्य और प्रदर्शन का युग



लेखक - डॉ. मोहन बैरागी 


मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं है कि वह सोच सकता है, बल्कि यह है कि वह स्वयं को देख सकता है। वह केवल संसार को नहीं देखता, बल्कि स्वयं को भी देखता है। यही आत्मदृष्टि उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाती है। किंतु इतिहास का एक विचित्र मोड़ यह है कि जिस आत्मदृष्टि ने मनुष्य को ऋषि बनाया था, उसी आत्मदृष्टि की विकृत छाया ने उसे प्रदर्शनप्रिय भी बना दिया। आज का मनुष्य जितना स्वयं को देखना चाहता है, उससे कहीं अधिक वह चाहता है कि संसार उसे देखे। यह इच्छा नई नहीं है, परंतु आधुनिक तकनीक ने इसे अभूतपूर्व विस्तार दे दिया है। मोबाइल फोन, कैमरा और सोशल मीडिया ने मिलकर एक ऐसा युग निर्मित किया है जिसमें जीवन का मूल्य उसके अनुभव से नहीं, उसके प्रदर्शन से मापा जाने लगा है। इस युग का सबसे साधारण किंतु सबसे अर्थपूर्ण प्रतीक है—सेल्फी-स्टैंड।

पहली दृष्टि में सेल्फी-स्टैंड एक मामूली वस्तु है। कुछ लोहे या प्लास्टिक की छड़ों का संयोजन, जिसके सहारे मोबाइल को दूर रखकर तस्वीर ली जा सकती है। किंतु दर्शन का कार्य वस्तुओं के बाहरी रूप को देखना नहीं, उनके भीतर छिपे अर्थ को पहचानना है। जब हम सेल्फी-स्टैंड को एक प्रतीक की तरह देखते हैं, तब वह आधुनिक मनुष्य के मानस का दर्पण बन जाता है।

कभी मनुष्य अपने जीवन के अनुभवों को भीतर संजोता था। गाँव का कोई वृद्ध जब अपने युवाकाल की कथा सुनाता था, तो उसकी आँखों में स्मृतियों का पूरा संसार उतर आता था। वह किसी नदी, किसी पर्वत, किसी प्रेम या किसी पीड़ा को शब्दों में पुनर्जीवित कर देता था। आज स्मृतियों की जगह तस्वीरों ने ले ली है। अब लोग कहते हैं—“देखो, मैं वहाँ गया था।” वे अनुभव नहीं सुनाते, प्रमाण दिखाते हैं। मानो घटना का घटित होना पर्याप्त नहीं, उसका दृश्य प्रमाण होना भी आवश्यक है।

भारतीय चिंतन में स्मृति को केवल याद रखने की शक्ति नहीं माना गया। उसे चेतना का एक महत्वपूर्ण आयाम समझा गया। स्मृति मनुष्य को उसके अतीत से जोड़ती है और उसे पहचान देती है। परंतु जब स्मृति का स्थान केवल डिजिटल संग्रह लेने लगे, तब मनुष्य धीरे-धीरे अपने अनुभवों से दूर होने लगता है। वह अनुभव को जीने के बजाय उसे रिकॉर्ड करने में व्यस्त हो जाता है।

आपने देखा होगा कि आज कोई व्यक्ति किसी सुंदर स्थान पर पहुँचता है तो सबसे पहले उसका ध्यान उस दृश्य पर नहीं जाता, बल्कि कैमरे के कोण पर जाता है। वह सोचता है कि कौन-सा फ्रेम बेहतर होगा, किस दिशा से प्रकाश आ रहा है, कौन-सा भाव चेहरे पर अच्छा लगेगा। उस क्षण वह प्रकृति के साथ नहीं, अपने प्रदर्शन के साथ जुड़ा होता है। उसकी चेतना बाहर नहीं, अपनी छवि पर केंद्रित होती है।

यही वह स्थिति है जिसे आधुनिक दार्शनिकों ने "दृश्य संस्कृति" कहा है। हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ वास्तविकता से अधिक महत्व उसकी छवि को मिल गया है। भोजन का स्वाद कम महत्वपूर्ण है, उसकी तस्वीर अधिक महत्वपूर्ण है। यात्रा का अनुभव कम महत्वपूर्ण है, उसकी पोस्ट अधिक महत्वपूर्ण है। प्रेम का स्पर्श कम महत्वपूर्ण है, उसकी सार्वजनिक घोषणा अधिक महत्वपूर्ण है।

यह केवल तकनीक का प्रश्न नहीं है। यह मनुष्य के भीतर बैठे उस अहंकार का प्रश्न है जो निरंतर मान्यता चाहता है। उपनिषदों ने जिस "अहं" को सीमित करने की बात कही थी, आधुनिक संस्कृति उसे विस्तार देने में लगी हुई है। सोशल मीडिया का प्रत्येक मंच उसी अहंकार को पोषित करता है। वहाँ मनुष्य लगातार पूछता है—क्या मुझे देखा जा रहा है? क्या मुझे पसंद किया जा रहा है? क्या मेरी उपस्थिति दर्ज हो रही है?

यूनानी मिथक में नार्सिसस नाम का एक युवक था। वह इतना सुंदर था कि स्वयं अपने प्रतिबिंब पर मोहित हो गया। जल में अपना चेहरा देखते-देखते वह उसी में डूब गया। आज का मनुष्य भी एक प्रकार के आधुनिक नार्सिसस में बदलता जा रहा है। अंतर केवल इतना है कि अब जलाशय की जगह मोबाइल स्क्रीन ने ले ली है।

कबीर ने मनुष्य को भीतर झाँकने की शिक्षा दी थी। बुद्ध ने आत्मनिरीक्षण को मुक्ति का मार्ग बताया था। महावीर ने कहा था कि स्वयं को जानना ही सबसे बड़ी विजय है। किंतु आधुनिक मनुष्य स्वयं को जानना नहीं चाहता, वह स्वयं को दिखाना चाहता है। जानने और दिखाने के बीच यही अंतर सभ्यता के संकट की जड़ है।

एक समय था जब यात्रा तीर्थ बन जाती थी। लोग महीनों पैदल चलते थे। रास्ते की कठिनाइयाँ उन्हें बदल देती थीं। वे लौटते थे तो उनका व्यक्तित्व कुछ और हो चुका होता था। आज यात्रा एक दृश्य सामग्री बन गई है। लोग एक हाथ में मोबाइल और दूसरे हाथ में सेल्फी-स्टैंड लेकर चलते हैं। वे स्थानों को नहीं देखते, उन्हें कैप्चर करते हैं। वे अनुभवों को नहीं जीते, उन्हें अपलोड करते हैं।

यह कहना गलत होगा कि तस्वीरें लेना बुरा है। समस्या तस्वीरों में नहीं, उस मानसिकता में है जिसमें जीवन का केंद्र अनुभव नहीं, प्रदर्शन बन जाता है। जब किसी मंदिर में दर्शन से अधिक महत्व फोटो को मिलने लगे, तब समझना चाहिए कि आध्यात्मिकता धीरे-धीरे पर्यटन में बदल रही है। जब किसी गरीब की सहायता करने से पहले कैमरा तैयार किया जाए, तब करुणा धीरे-धीरे विज्ञापन में बदल रही है।

आज राजनीति से लेकर धर्म तक, शिक्षा से लेकर साहित्य तक, हर क्षेत्र में यह प्रदर्शन संस्कृति दिखाई देती है। लोग कार्य कम और उसका प्रचार अधिक करते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि समाज में दो समानांतर संसार चल रहे हैं। एक वास्तविक संसार, जहाँ संघर्ष, पीड़ा, असफलताएँ और जटिलताएँ हैं। दूसरा डिजिटल संसार, जहाँ सब कुछ सुंदर, सफल और आकर्षक दिखाई देता है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब मनुष्य अपने वास्तविक जीवन की तुलना दूसरों के डिजिटल जीवन से करने लगता है। वह देखता है कि सब लोग प्रसन्न हैं, सफल हैं, यात्रा कर रहे हैं, उत्सव मना रहे हैं। धीरे-धीरे उसे लगता है कि केवल वही पीछे रह गया है। यह तुलना उसके भीतर असंतोष और अवसाद को जन्म देती है।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो आधुनिक मनुष्य का सबसे बड़ा संकट अकेलापन नहीं, बल्कि स्वीकृति की भूख है। वह दूसरों की आँखों में अपना मूल्य खोज रहा है। उसे लगता है कि यदि लोग उसे पसंद करते हैं तो वह महत्वपूर्ण है। यदि लोग उसे अनदेखा कर देते हैं तो उसका अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।

इसीलिए आज "लाइक" एक नई सामाजिक मुद्रा बन गया है। पहले सम्मान ज्ञान, चरित्र या कर्म से मिलता था। अब कई बार दृश्यता ही सम्मान का आधार बन जाती है। जो अधिक दिखाई देता है, वही अधिक प्रभावशाली माना जाता है। इस व्यवस्था में गहराई की जगह चमक ले लेती है।

भारतीय दर्शन ने बार-बार चेताया कि बाहरी संसार परिवर्तनशील है। वास्तविक शांति भीतर से आती है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जो व्यक्ति प्रशंसा और निंदा दोनों में समान रहता है, वही स्थितप्रज्ञ है। किंतु आधुनिक संस्कृति मनुष्य को ठीक इसके विपरीत दिशा में ले जाती है। वह प्रशंसा पर निर्भर बन जाता है और आलोचना से टूट जाता है।

सेल्फी-स्टैंड का एक और अर्थ है—दूरी। तस्वीर लेने के लिए मोबाइल को स्वयं से दूर रखना पड़ता है। प्रतीकात्मक रूप से देखें तो आधुनिक मनुष्य भी स्वयं से दूर होता जा रहा है। वह अपने भीतर की आवाज़ नहीं सुनता। वह अपने अकेलेपन से भागता है। वह हर समय किसी न किसी स्क्रीन से जुड़ा रहता है ताकि उसे अपने भीतर उतरने की आवश्यकता न पड़े।

पाश्चात्य दार्शनिक ब्लेज़ पास्कल ने लिखा था कि मनुष्य की अधिकांश समस्याएँ इस कारण उत्पन्न होती हैं कि वह कुछ देर शांत बैठकर अपने साथ नहीं रह सकता। आज यह कथन पहले से अधिक सत्य प्रतीत होता है। हम लगातार व्यस्त हैं, जुड़े हुए हैं, सक्रिय हैं, परंतु भीतर से रिक्त हैं।

कभी गाँवों में लोग चौपाल पर बैठते थे। वे एक-दूसरे की आँखों में देखकर बात करते थे। उनके संवाद में समय लगता था, पर आत्मीयता होती थी। आज संवाद त्वरित हो गया है, लेकिन आत्मीयता कम हो गई है। हजारों संपर्क होने के बाद भी मनुष्य अकेला महसूस करता है।

प्रेम भी इस परिवर्तन से अछूता नहीं रहा। पहले प्रेम पत्र लिखे जाते थे। उनमें प्रतीक्षा थी, धैर्य था, शब्दों की गरिमा थी। आज प्रेम का एक बड़ा हिस्सा दृश्य प्रदर्शन में बदल गया है। संबंधों की गहराई कभी-कभी तस्वीरों की संख्या से मापी जाने लगी है। लेकिन प्रेम कैमरे में नहीं बसता। प्रेम तो उन क्षणों में जन्म लेता है जिन्हें कोई कैमरा पकड़ नहीं सकता—एक मौन स्पर्श में, एक चिंता भरी दृष्टि में, एक कठिन समय में निभाए गए साथ में।

यही कारण है कि कई बार सबसे अधिक तस्वीरें साझा करने वाले संबंध सबसे पहले टूट जाते हैं। क्योंकि संबंधों की जड़ें दृश्यता में नहीं, संवेदनशीलता में होती हैं।

यदि हम साहित्य की ओर देखें तो महान रचनाकारों ने कभी अपने जीवन का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने अपने अनुभवों को रचना में रूपांतरित किया। तुलसीदास, कबीर, सूरदास, प्रेमचंद, निराला—इनमें से किसी ने भी अपनी छवि को नहीं, अपने विचार को केंद्र में रखा। इसलिए वे समय से परे हो गए।

आज का समय हमें एक कठिन प्रश्न के सामने खड़ा करता है—क्या हम स्वयं को दुनिया के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, या दुनिया की अपेक्षाओं के अनुसार स्वयं को गढ़ रहे हैं? यह प्रश्न केवल तकनीक का नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है।

सभ्यता का संकट यह नहीं कि उसके पास कैमरे हैं। संकट यह है कि उसके पास दर्पण कम होते जा रहे हैं। कैमरा बाहर की छवि पकड़ता है, दर्पण भीतर की सच्चाई दिखा सकता है। कैमरा दूसरों के लिए है, दर्पण स्वयं के लिए। कैमरा स्मृति का उपकरण है, दर्पण आत्मबोध का।

सेल्फी-स्टैंड का युग हमें बार-बार मंच पर बुलाता है। परंतु जीवन का सारा सत्य मंच पर नहीं मिलता। कुछ सत्य एकांत में मिलते हैं। कुछ उत्तर मौन में मिलते हैं। कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें साझा करने की नहीं, जीने की आवश्यकता होती है।

संभव है आने वाले समय में तकनीक और अधिक विकसित हो जाए। तस्वीरें और अधिक आकर्षक हो जाएँ। आभासी संसार और अधिक शक्तिशाली हो जाए। परंतु तब भी मनुष्य की मूल आवश्यकता नहीं बदलेगी। उसे प्रेम चाहिए होगा, अपनापन चाहिए होगा, अर्थ चाहिए होगा, आत्मस्वीकृति चाहिए होगी।

और इन सबकी प्राप्ति किसी सेल्फी-स्टैंड से नहीं होगी।

जब कभी अवसर मिले, किसी सुंदर दृश्य के सामने कुछ क्षण बिना कैमरे के खड़े होकर देखिए। किसी प्रियजन से बिना फोटो लिए बात कीजिए। किसी यात्रा को बिना पोस्ट किए जीकर देखिए। किसी सहायता को बिना प्रचार किए करिए। तब शायद आपको अनुभव होगा कि जीवन की सबसे मूल्यवान चीजें वे हैं जिन्हें दिखाया नहीं जा सकता।

अंततः सभ्यता का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि वह दर्पण को बचाती है या केवल कैमरे को। यदि मनुष्य स्वयं को देखने की क्षमता खो देगा, तो वह संसार को दिखाते-दिखाते अपने ही अस्तित्व से दूर हो जाएगा। लेकिन यदि वह भीतर झाँकने का साहस बनाए रखेगा, तो तकनीक भी उसके लिए साधन बनेगी, स्वामी नहीं।

सेल्फी-स्टैंड हाथ में होना समस्या नहीं है; समस्या तब है जब वह मनुष्य के मन में खड़ा हो जाए। क्योंकि जिस दिन मनुष्य का पूरा जीवन एक तस्वीर बन जाएगा, उसी दिन वह अनुभवों की जीवित नदी से कटकर केवल छवियों के संग्रहालय में बदल जाएगा।

और जीवन संग्रहालय बनने के लिए नहीं, बहती हुई नदी बनने के लिए मिला है।

Thursday, July 10, 2025

ड्योढ़ी पर छत by - डॉ. मोहन बैरागी

 ड्योढ़ी पर छत


एक फर्लांग इधर, एक फर्लांग उधर

कर देने से....

हो जाते हैं पार...

ड्योढ़ी के.....

इधर घर,

उधर

बाहर..?

जहां दुनियां हैं..?

वह..जो आपकी नहीं..?

दुनिया तो हैं घर के भीतर...

ड्योढ़ी के इधर....

यहीं से जा सकते हैं...

घर की छत पर...

जहां....गर्मियों में ठंडी हवाओं के एहसास

से, आती थी नींद, सुकून की..!

अब सुकून और नींद...

दोनों गायब है....?

क्योंकि, अब, वो छत नहीं, ठंडी हवाओं का एहसास नहीं...?

न चौखट बची, न दरवाज़े....

न ही ड्योढियां....

अब हैं सिर्फ, ड्योढ़ी और उसके ऊपर की छत..

जहां से मिलता है तो सिर्फ माइग्रेशन..

क्योंकि अब न बची है ड्योढियां और न ही छत


@डॉ. मोहन बैरागी

Friday, October 13, 2023

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नहीं

 मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नहीं


प्रेम में गर सिक्त है तो 

प्रेम में ही रिक्त बंधु

झोंकना खुद को पड़ेगा

तुझकों भी अतिरिक्त बंधु

बाद उपवन के उजड़ऩे, पुष्प खिलता ही नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही


चाँदनी जो ये धवल है

स्वप्र नैनों में नवल है

मन की मछली फडफ़ड़ाती

डुब जाने को विकल है

आवरण अखरोट दुनिया का यहां छिलता नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही


हमने नापा पग पगों से

प्रेम की तिरछी गली को

रोंदते है हमने देखा

प्रीत की नन्ही कली को

प्रेम का फटता जो कपड़ा फिर ये सिलता ही नही

मीत मिलता ही नहीं है, मीत मिलता ही नही

@डॉ.मोहन बैरागी

Thursday, November 17, 2022

Monday, August 22, 2022

अस्तित्व की तलाश और स्वयं से अनजाने हम...! लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

 


अस्तित्व की तलाश और स्वयं से अनजाने हम....!

लेखक :- डॉ.मोहन बैरागी

हम कौन है...? क्या हैं...? हमारा अस्तित्व क्या है....? मनुष्य के मन-मस्तिष्क में यह बात प्रारम्भ से ही बलवती रही है। क्या हमारे होने का कोई अर्थ है? किसने जीवन दिया।जीवन की सफलता और सार्थकता सभी के लिये अलग-अलग है। इस पहेली को खोजने के लिये कुछ लोग मानते है कि धर्म से जुड़ना ही जीवन का अर्थ है, कुछ लोग दान-पुण्य में तो कुछ सोचते है कि गरीबों की सेवा में तो कुछ शांति फैलाने,कुछ हिंसा में शांति ढूंढते है।यही अस्तित्ववाद है। मूलतः जिस तरह के काम करने में खुशी मिलती हो, वही जीवन का अर्थ है और वही अस्तित्ववाद है। पौराणिक कथानकों में भी मनुष्य की उत्पत्ति और विकास की धारणाओं के साथ-साथ उसके अस्तित्व विषयक आख्यान उल्लेखित है। प्रारम्भ में मनुष्य का मानना था कि जन्म से पहले ही सबकुछ तय हो जाता है। जीवन का उद्देश्य पूर्व से तय है, और यही बात कई यूनानी दार्शनिक और प्लेटो, अरस्तु जैसे दार्शनिक भी मानते रहे। 18वीं-19वीं सदी में इसके विपरीत नकारवाद की शुरुवात होने लगी। इस विचार को प्रस्तुत करने में निस्तशे का नाम प्रमुख है। एक और मनोवैज्ञानिक सार्त कहते है कि पैदा होने के बाद हमे अपने जीवन की रचना खुद करनी पड़ती है, इनका मानना है कि जन्म के बाद मनुष्य मकसद खोजने की दिशा में बढ़ता है। मूल्यों, गुणों-अवगुणों का निर्धारण मनुष्य अपने चयन या निर्णयों से कर आगे का रास्ता तय करता है। इसे एकसिस्टेन्स कहा जाता है,जबकि आम मनुष्य की दृष्टि में ये क्रांतिकारी विचारधारा रही है।

लेकिन आधुनिक युग में इस संकल्पना की अलग-अलग परिभाषायें या मान्यताएं मिलतीं है। विज्ञान के अनुसार धरती पर एक पारिस्थितिकी तंत्र काम करता है, जिसमें हर प्राणी अपने अस्तित्व को बनाएं रखने के लिए अपने से छोटे जीव का ग्रास करता है। पर बात तब भी प्रश्न रूप में ही सामने खड़ी होती है कि आखिर कोई किसी का भी ग्रास करें, जो अंतिम प्राणी भी छूट जाता है, वह कौन है ...? उसकी पहचान क्या है...? उसके स्वरूप या आकार-प्रकार जो भौतिक युग में है, का उद्देश्य क्या है..? उसको इस तरह, इस स्वरूप में किसने बनाया है..? क्या किसी...अलौकिक शक्ति ने बनाया है..? तो फिर वो अलौकिक शक्ति कौन है....उसको किसने बनाया....? सवाल कई हैं जिनके उत्तर समय-समय मनीषियों, चिंतकों तथा विचारकों ने दिये है।  

मुझे लगता है कि आधुनिक युग मे प्राणियों के मष्तिष्क में उत्पन्न विचार, जो भाषा के माध्यम से संप्रेषित होकर परस्पर अस्तित्व का निर्माण करते है वही अस्तित्व है।  आधुनिक युग में कई दार्शनिको ने अस्तित्व की अलग-अलग व्यख्या की और अस्तित्ववाद के सिद्धान्त दिए। 

एक धारणा है कि प्राणियों का संचालन नियति करती है। इस पर निस्तशे नामक महान दार्शनिक ने कहा कि नियति हमारा संचालन नही करती, बल्कि हमारे जीवन का संचालन हम स्वयं करते है। निस्तशे ने कहा कि इसके लिए जरूरी है कि खुद के हो जाओ,सेल्फ कंसंट्रेशन रखो या यूं कहें कि व्यक्तिवाद अपना लो। फ्रेंच फिलॉसफर अल्बेयर कामों सहित किरकेकार्थ,दोस्तोस्की जैसे कई विद्वान दार्शनिको ने अस्तित्ववाद के सिद्धान्त दिए, हालांकि ये सभी मनोवैज्ञानिक पूर्व से ही अस्तित्ववादी थे।

सार यह कि मस्त रहें, खुश रहें, खुशियां बांटे...तब आपके अस्तित्व का निर्माण स्वयं हो जाएगा।

©डॉ.मोहन बैरागी

Sunday, August 7, 2022

यथार्थ जीवन और अनसुलझे सपने लेखक - डॉ. मोहन बैरागी


यथार्थ जीवन और अनसुलझे सपने 

लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

रात के कोई दो-ढाई बज रहे थे, मैं ट्रेन से उतरकर घर जाने को स्टेश्न से निकला। नींद शरीर और आँखों को परेशान कर रही थी, लेकिन घर जाना ही था, सो स्टेशन के सामने बड़ी मुख्य सडक़ पर किनारे-किनारे पैदल ही चलना शुरू कर दिया। ताज्जुब हो रहा था, वातावरण देखकर, आधा सोया-आधा जागा सा। मैने देखा, रात के इस पहर में अब भी पिछली शाम की भीड द्वारा छोड़ दिये गये अवशेष, जो अक्सर किसी मेले, या उत्सव-त्यौहार के बाद लोग छोड़ जाते है। सोचा शहर में इतनी भीड़-भाड़ क्यो रही होगी? याद आया, कोई बड़ा त्यौहार था जिसमें शहर में चौबीस घंटे रौनक रहती है। खैर... मैं पैदल आगे बढऩे लगा... सडक़े के दोनों किनारो पर काफी मात्रा में संभवत: गाड़ोलिया समाज के अस्थायी डेरे दिखाई दे रहे थे, जो मेरे शहर से जाने से पहले यहाँ नहीं थे, ....इसी त्यौहार में हिस्सेदारी के लिए आए होंगे। ये डेरे सडक़ के दोनों और कतारबद्ध... देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ... और तो और... हर डेरे से बंधे हुए ऊँट.... इतने सारे ऊँट और कुछ जगह घोड़े साथ में दो हाथी भी सडक़ किनारे बंधे थे, जो मैनें पहले कभी एक साथ नही देखे। इधर साफ रहने वाली सडक़ पर यहाँ-वहाँ ऊँटों की विष्ठा बिखरी पड़ी दिखाई दे रही थी। थोड़ा और आगे चला तो देखता हँू कि एक ऊँट लगभग पगलाया सा दौड़ता हुआ कहीं से आया और सोते हुए गडरियों के डेरे में घुस गया। अगले ही पल पुरा डेरा अस्त-व्यस्त, पुरा तंबु उखड़ गया था। इसमें सो रहे महिला, बच्चे, पुरूष इधर उधर भागने लगे। कुछ देर के लिए अफरा-तफरी मच गई। पुरूष और महिला गडरियों ने जैसे-तैसे ऊँट को पकडक़र काबू में किया और उसे शांत कर किनारे पर लगे एक बिजली के खंभे से बांध दिया। इस ऊँट (पटांग) घटना को कुछ पल देख कर मैं आगे बढ़ गया, लेकिन मैं थकावट और नींद से पुरी तरह निढाल हो रहा था, सोचा मेन रोड़ से जाने की बजाय शार्ट रास्ता ले लुं, घर जाने के लिए मेन रोड़ से एक पुरानी मिल में से होकर कुछ पुराने मोहल्लों से होकर रास्ता मेरे घर को जाता है, यही रास्ता ठीक है, जल्दी घर पहँुचने के लिए। मैं चल दिया... मिल परिसर के बीच बने कच्चे पक्के रास्ते से....कुछ अंधेरा, कहीं हल्की रोशनी वाली जलती बुझतीं खंबे पर लगी टयुबलाईट के उजाले में... इधर बरसात का मौसम है, और रात का समय, तो वातावरण में वैसे भी ठंडक घुली हुई है, दुसरी तरफ यात्रा के कारण शरीर टुटन एक कदम भी आगे चलने से रोक रही है, लेकिन किया भी क्या जा सकता है.. पँहुचना तो है घर। 

अब में मिल परिसर के ऊँचें नीचे खुदे हुए मिट्टी के छोटे-मोटे टीलों को पार कर आगे पुरानी बसी कालोनी में इण्टर हो गया...थोड़ा आगे चला तो रोशनी दिखाई दी...और आगे चलने पर बैण्ड-बाजो की आवाज...शोर-शराबा.. मैं सही था..कोई त्योहार ही है, जो अब तक... इतनी रात तक उसका सुरूर लोगों  पर हैं...अब भीड़ दिखाई देने लगी, जैसे कोई सवारी निकल रही हो...यकायक मेरे सामने सैकड़ों लोगो की भीड़...हाँलाकि कालोनी का मार्ग संकरा था, और इसी मार्ग में यह सवारी आगे की और बढ़ रही थी...जैसे तैसे मैंं भीड़ को चीरने का प्रयास करता आगे की और बढऩे लगा...कुछ दुर चलकर रास्ता और संकरा हो गया...आगे बैण्ड तेज आवाज में...लोगों का हुजूम...जैसे इन दो तीन बैण्ड के पीछे लगभग कतार बनाकर चलते लोग...इससे आगे निकलना मुश्किल हो रहा था...सो...मैं भी कतार में लग गया.....जिस जगह मैं कतार में लगा...वहाँ भीड़ कम थी....कुछ कदम चलने के बाद मुझे अपने पीछे सरसराहट हुई...तुरंत अपना दाया हाथ पीछे की जेब की तरफ बढ़ाया...तभी अचानक मेरे हाथ ने दुसरा हाथ पकड ़लिया.. अचानक पटल कर पीछे देखा.... कोई बारह-पन्द्रह साल के दो बच्चे मेरे पीछे थे और उनमें से एक का हाथ मेरी जेब पर था, जिसे मैने पकड़ लिया था.. दोनों बच्चे मेरी तरफ देखने लगे..उनकी आँखों में ज़रा भी भय नहीं था कि मैने उनको देख लिया और सरेराह जेब काटते रंगे हाथ पकड़ लिया...वो साहस भरे स्वर में अरे यार..शीट्ट...कहकर दाएं-बाएं होने की मुद्रा में आ गये, मैं अपने आपको संभाल ही रहा था कि दोनो बच्चें आँखों से ओझल हो गये। अब मैं इस परिस्थिति से बाहर निकलने को व्याकुल था, जैसे-तैसे भीड़ को चीरते हुए जुलूस से आगे निकल गया... थोड़ा आगे जाकर इस पुरानी कॉलोनी के खत्म होते ही बाउंड्री वाल में बने एक छोटे से रास्ते से बाहर निकला और महसुस होने लगा की मैं शायद थकान और नींद की वजह से रास्ता भुल रहा हँू..? फिर भी आगे बढ़ा...देखा, फिर वहीं कच्चा ऊँचा-निचा रास्ता जो आगे चलकर शायद किसी मंदिर की और जा रहा था...चलते हुए मैं भी पँहुच गया.. मैं अब समझ गया था कि रास्ता भुल गया हँु... तभी कुछ जाने पहचाने चहरे दिखे... कोई पाँच-सात लोग बाहर निकल रहे थे... मुस्कूराते हुए मैने बाहर जाने का रास्ता पुछा... उनमें से एक ने हँसकर मुझे हाथ से इशारा कर एक दिशा में जाने को कहा... मुझे कि संभवत: मैं नहीं जानता इनमें से किसी को भी... खैर... मैं उस दिशा में चल दिया... आगे चलकर लगभग मैदान सी जगह... जिसके आगे कोई कॉलोनी दिखाई पड़ रही थी... इस मैदान से गुज़रते हुए मैने देखा.... कुछ दस-बारह युवकों की टोली मोटरसाईकिल खड़ी कर बतिया रही थी... हुलिये से बदमाश लग रहे थे... यकायका वे मेरी तरफ देखने लगे... मुझे लगा अब गए काम से शायद... क्या पता... मारपीट करें... लुट लें..? मैने अपनी चाल बढ़ाई और उनमें से कोई भी कोई हरकत करे, इससे पहले मैं उस जगह को पार कर गया और कॉलोनी के रास्ते पर आ गया.... यहाँ देखा फिर वहीं रौनक... घरों के ओटलों पर बच्चे-महिलाएं खड़े है... एक दुसरे से गपशप करते हुए ये लोग शायद इस त्यौहार की मस्ती में लग रहे थे..। हांलाकि इस रास्ते पर कोई जुलूस वगैरह नहीं था...तभी मैने एक घर के ओटले पर खड़ी एक महिला से पुछा....

ये आगर रोड़ का रास्ता किधर से है..? (आगर रोड़ वही रोड़ है, जिससे मैन स्टेशन से उतरकर चलना शुरू किया था, इस रोड़ से मेरा घर नज़दीक है।) 

महिला ने अचंभे भरे स्वर में कहा.... आगर रोड़..... कोनसा...? ये तो बैतुल है।

ये सुनकर मेरे पैरो से ज़मीन खिसक गई.... आश्यर्च से दिमाग घुमने लगा... सोच में पड़ गया....बैतुल.... बैतुल कैसे....?

थोड़ी ठंडी सांस लेकर मैने उसी महिला से पुछा... ये बस स्टेण्ड का रास्ता किधर से है.....

महिला ने कहा... थोड़ी ही दुर है... आप इस रास्ते को खतम करेंगे तो वहीं से कॉलोनी की दीवार के बीच एक रास्ता है...उसके बाहर बस स्टैण्ड है।

मेरी हालत अब हद से ज्य़ादा खराब थी....लेकिन इस जगह कर भी क्या सकता था....मैं थके पैरों से चल दिया और कुछ दुर जाकर ही दीवार के बीच बने रास्ते से बस स्टैण्ड पहँुच गया। 

अब मुझे अपने शहर के लिए बस की तलाश करना थी...सोच ही रहा था कि किससे पुछा जाय....।

त्यौहार की वजह से बस स्टैण्ड पर भी अच्छी-खासी भीड़ थी, लोग लाईन लगाकर कांउटर में अपने-अपने गंतव्य की टिकट ले रहे थे। मैं लाईन से अलग काउंटर पर पँहुचा और चेहरा झुकाकर खिड़की में बैठे बाबु से मेरे गंतव्य को जाने वाली बस के बारे में पुछ ही रहा था, दुसरी तरफ से शोर था की लाईन में लगकर टिकट लो... कि तभी, एक हाथ मेरे कंधे पर आया, मैं पलट कर देखता कि..... इतने में मेरी नींद खुल गई।

मैं बिस्तर पर दाएं-बाएं देखने लगा... उठकर मुंह पर हाथ फेरा... पास पड़े मोबाईल में टाईम देखा तो सुबह के साढे नो बज चुके थे। मन अब भी विचलित था। झटके से रजाई को हटाते हुए वाश बेसिन में जाकर मुंह पर पानी मारा... कुछ पल लगे नार्मल होने में... फिर आकर बिस्तर पर बैठ गया और सोचने लगा कि ये सब क्या था। सुबह के समय, ये कैसा सपना? खयाल आया, इसके बारे में थोड़ा पढ़ लू। एक दो किताब और इंटरनेट खंगाला, तो कुछ वैज्ञानिकों के कथन सामने आए। इटली के वैज्ञानिक एलसेंड्रो फोगली का मानना है कि सपने हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से प्रभावित होते है। जैसे-अनिंद्रा, अवसाद, चिंता, दुख-सुख आदि। उक्त नकारात्मक स्थितियाँ और घटनाएं हमारे सपनो पर प्रतिकुल प्रभाव डालती है। मिस्र में एक अध्ययन में स्वप्न में आए दृश्यों का अर्थ समझने पर काफी परिश्रम हुआ। डिक्शनरी ऑफ ड्रीम्स में मिस्र के ऐसे अध्ययन का आश्चर्यजनक उल्लेख भी है। इसके मुल सिद्धांत भारतीय चिंतन से मिलते जुलते है। मनोवैज्ञानिक सिग्मन फ्राएड के अनुसार सारे सपने हमारी इच्छा का ही परिणाम है। भारतीय ग्रंथ अर्थववेद में काम देवता को स्वनसर्जक कहा गया है। एक और वैज्ञानिक डाक्टर चाल्र्स युंग के अनुसार सपने मानसिक प्रतिक्रिया है जो मुख्यत: अपने लक्ष्य सिद्धी के लिए होते है तो वहीं एक और वैज्ञानिक केल्विन एस हॉल ने सपनों का सिद्धांत दिया जिसमें बताया कि सपने विचार या विचार की श्रंखला है।

सार यह कि.... अवसाद से बचें, पुरी नींद लें, चिंता और दुख को अपने से दुर रखें, मस्त रहें, हंसते-मुस्कूराते।

आनंदमयी जीवन जियें।

© लेखक- डॉ. मोहन बैरागी

Thursday, August 4, 2022

गीत - समय, समय से घट जाए तो घट जाने दे.... लेखक - डॉ. मोहन बैरागी


 समय, समय से घट जाए तो घट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


अँधियारो से लड़ तू दीप जलाकर मन का

फिर बरखा बरसेगी फिर महीना सावन का

भीतर के दुःख को सारे कहीं सिमट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


छोड़ के दुनिया के वैभव की उलझन को

अब तोड़ दे सारे आभासी झूठे दर्पन को

उड़ते पंछी को घर के लिए पलट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


असली नकली लोगो की रौनक खूब रिझाती

कभी कभी ये बुद्धि इतना अंतर ना कर पाती

भूलो वे साथ उन्ही के उनका कपट जाने दे

मझधारों से लड़ माँझी तू नैया तट जाने दे


ये माना कुछ पल चले गए हैं व्यर्थ सही

ज़िद कर तू ढूंढेगा जीवन के अर्थ सही

ख़ुद आएगी मंजिल, इसे लिपट जाने दे

मझधारों से लड़ मांझी तू नैया तट जाने दे

©डॉ. मोहन बैरागी


Saturday, July 30, 2022

पेरेंटिंग में क्लासिकल कंडीशनिंग लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी


पेरेंटिंग में क्लासिकल कंडीशनिंग

लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

          मनोवैज्ञानिक जॉन बोल्बी ने विचलन पर एक अध्ययन में बताया कि माँ का सहज प्रेम न मिलने से बच्चे अपराधी बनते है, लगभग यही बात भारत मे महात्मा गांधी ने भी कही की मेरी परवरिश में मेरी माँ का हाथ है, और मेरी दो माँ है , एक पुतलीबाई और दूसरी गीता। इन्ही दोनों से संस्कार मुझे मीले है। और इन मिले संस्कारों से बालक मोहन दास आगे चलकर महात्मा गांधी हो गया, जिसे दुनिया मानती है।

           भारतीय परिवारों में पेरेंट्स लगभग प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से बच्चों को सिखाते है, प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप में अपने पेरेंट्स या माता पिता एवं परिवार के आचार विचार, भाषा व क्रियात्मक गतिविधियों को बच्चे देखकर समय के साथ स्वाभाविक रूप से अपने मे धारण करते है।

            जैसे यदि परिवार के किसी बड़े सदस्य को किसी बात पर क्रोध आता तब वह सामान्य रूप से अनजाने में ही सही अपने क्रोध को बच्चों पर डाटते हुए निकालते है। मनोविज्ञान में एक शब्द आता है जिसे कहते है स्केप बोट। जिसका अर्थ होता है बली का बकरा, मतलब सामान्यतः बच्चे वो होते है जिन पर पेरेंट्स अपने गुस्से को निकालते है। बच्चों को सिखाने का सही तरीका है परोक्ष रूप से उनको संस्कार सिखाना, अर्थात जो गतिविधियां पेरेंट्स घर मे कर रहे है, बच्चे उनको देखकर सीखते है, और उन्ही चीजो को अपनाते है।

              जॉन बोन्दुरा नाम के वैज्ञानिक ने भी कहा कि बच्चे ऑब्जरवेशन से सीखते है। अर्थात क्लासिकल कंडीसीनिंग के अनुसार सिखते है, मतलब परिवेश को देखकर सीखते है। कुल मिलाकर परिवार के मूल्यों से बच्चों में संस्कार हस्तांतरित होते है। एक उम्र तक तो बच्चे परिवार से सीखते है लेकिन 13 से 19 साल के बीच की उम्र (मनोविज्ञान में इसको गैंग एज या पीयर ग्रुप कहा जाता है) में बच्चों पर बाहर का प्रभाव पड़ने लगता है और इसी उम्र में बच्चे लगभग परिवार से बाहर की दुनिया से भी प्रभावित होने लगते है। अथवा मित्र समूह का प्रभाव होता है। 0 से 3 की आयु में सम्पूर्ण प्रभाव पड़ता है तथा 3 से 12 वर्ष की आयु में महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। 20 वर्ष के बाद व्यवसायिक दुनिया का प्रभाव पड़ने लगता है। 20वी सदी के महान मनोवैज्ञानिक ऐरिक फ्रॉम ने अपनी किताब आर्ट ऑफ लविंग में प्रेम की विस्तृत विवेचना की, जिसमे प्रेम के विविध रूप बताए। इसिमें लिखा कि माँ का प्यार बच्चों के लिए अनकंडीशनल होता है, जबकि पिता का प्यार नही, और ऐसी स्थिति में वो अपने बच्चे के हित मे दूसरों के हितों से समझौता कर लेता है। महिलाएं बच्चों के लिए जुडिशियस नही होती है।अतः महिलाये अनकंडीशनल प्रेम करने में पुरुष या पिता से बहुत आगे होती है।

              सिगमंड फ्राईएड ने कहा कि महिलाये पुरुषों की तुलना में अपूर्ण है, जबकि उन्ही की एक शिष्या नैंसी कोडोरो ने कहा महिलाये पुरुषों की तुलना में पूर्ण होती है, वो जिंदगी भर भावनात्मक अवस्था मे सम रहती है। महिला परिवार के हर सदस्य के साथ सहज रहती है। फ्राईएड कहते है  कि जैसे बेटी पिता के लिए ज्यादा प्यारी होती है और बेटा माँ के लिए, जबकि नैंसी कोडोरो ने इसके उलट कहा कि बेटी हो या बेटा उनका पहला प्यार उनकी माँ है क्योकि हर स्थिति में बच्चों की आवश्यकताएं माँ ही पूरा करती है। जैसे छोटे बच्चे, चाहे वो लड़का हो या लड़की उसकी हर जरूरत माँ ही पूरा करती है।वह यह भी कहती है कि पुत्र सामान्यतः उम्र बढ़ने के साथ विद्रोही होते जाते है, और धीरे धीरे  एक उम्र के बाद वो बाहरी दुनिया मे ज्यादा रमते है वहाँ का आकर्षण उनमे ज्यादा होता है और सफलता को लताशते हे। देखा भी गया है सामान्यतः जो पुरुष बाहरी दुनिया मे सफल होते है वो घर मे भावनात्मक रूप से असफल होते है। हालांकि इसके पीछे उनकी परिस्थितियों का प्रभाव होता है। नैंसी कोडोरो ने इस फिनोमिना को द विल इनेक्सप्रेसिवेनेस नाम दिया। पुरुष सामान्यतयः अपनी भावनात्मक दृष्टि को प्रस्तुत नही कर पाता, जबकि महिलाओ में यह नही देखा जाता, महिलाओ के व्यक्तित्व में इमोशन तुरंत अपने केंद्र पर पहुच जाते है और वो एक्सप्रेस कर देती है, जिसे इन एक्सप्रेसिवन्स कहा।

               सार यह कि बच्चों को परोक्ष रूप से सीखाना सही होता है। अतः परिवार के सदस्यों का आचरण इस तरह हो कि बच्चे परोक्ष रूप से बड़ो को अवलोकन करके सीख सके।

©डॉ.मोहन बैरागी



Wednesday, July 20, 2022

आदर्श मूल्यों की वक्रता और मनुष्य, लेखक - डॉ. मोहन बैरागी

 



आदर्श मूल्यों की वक्रता और मनुष्य

लेखक - डॉ. मोहन बैरागी

वै नैतिक आदर्श जिन्हें कोई समाज अपनाना चाहता है। लेकिन दो अलग व्यक्तियों के मूल्य अलग अलग होते है। यह भी माना जाता है कि तर्क प्रक्रिया से मूल्य प्रभावित नही होते है तथा तर्कों को कोई मनुष्य विवेकपूर्ण स्वीकार करता है तब मूल्य स्थापना आसान हो जाती है। कह सकते है कि वे नैतिक आदर्श जिनकी प्राप्ति के लिए सेक्रिफाईज कर सकते है, वेल्यू या मूल्य कहलाते है।

एक दार्शनिक हुए थामस हॉप, जिनके अनुसार समाज पूर्व में ऐसा नही था जो आज है, पहले हर व्यक्ति को दूसरे से ख़तरा था। धीरे धीरे समाज मे एक दूसरे पर भरोसा स्थापित हुआ और नैतिक आदर्श मूल्य बनने लगे।

समाज अथवा मनुष्य में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिये अलग अलग सिद्धान्त, नियम, प्रतिमान निर्धारित किये गए है जिनसे नैतिक मूल्यों की स्थापना में मदद मिलती है।

नीतिशास्त्र के अनुसार डायकोटमी या द्वैध मनोवृत्ति

वह वृत्ति है जो आमतौर बचपन से जो दिमाग मे बैठ जाती है, जिसका अर्थ है किसी भी वस्तु या व्यक्ति को दो हिस्सों में बाँटकर देखने की आदत। नीतिशास्त्र के ही  सिद्धान्त के अनुसार हम अच्छे और बुरे दोनों है। और व्यक्ति सामान्यतः इसमे से केवल एक अच्छे पक्ष को अपने लिए मानकर चलता है।

दूसरा सिद्धान्त सातत्य वादी दृष्टिकोण या कॉन्टिनम अप्रोच होता है जिसके अनुसार हर व्यक्ति अच्छा और बुरा दोनों होता है। अच्छाई से बुराई की यात्रा ही कॉन्टिनम अप्रोच होती है, अर्थात न कोई अच्छा है न कोई बुरा है, हर व्यक्ति कॉन्टिनम स्केल के पैमाने पर चलता है। 

नैतिक मूल्य वे है जो समाज के हित में हो लेकिन अस्तित्ववाद के एक दार्शनिक किरके गार्ज ने कहा कि महान से महान व्यक्ति का महान से महान निर्णय भी तब तक सही नही है जब तक कि उसने अपनी अंतर आत्मा से उसे पुष्ट न करवा लिया हो।

सिग्मंन फ्राइड के अनुसार भीतर की आवाज़ या अंतर आत्मा जो कहे वही सही है, जिसमे कोई अंतर्द्वंद न हो। उनके अनुसार सुपर ईगो या नैतिक मन या इड या स्वार्थी मन दूसरी तरफ खिंचता है।

लेकिन आम मनुष्य के लिए नैतिकता के पैमाने निश्चित करना थोड़ा कठिन है, कई बार वह तय नही कर पाता कि क्या सही है और क्या गलत। जैसे प्यास बुझाने के तत्व को जल कहे या पानी..? तो ऐसी स्थिति के लिए भाषा दार्शनिक क्वाईन ने कहा कि दुनिया मे कोई भी दो शब्द पर्यायवाची नही हो सकते। उनके अनुसार पूर्ण पर्याय तथा अपूर्ण पर्याय होता है। जब कोई शब्द अपने उद्भव से ही समान अर्थ रखता हो और नैतिक ढाँचों के द्वारा स्वीकार कर लिया गया हो वही सही है। समझना थोड़ा मुश्किल है लेकिन यहां भी व्यक्ति अपनी सुविधा के अनुरूप तय कर लेता है कि क्या सही है।

वैल्यू या नैतिकता की तटस्थता किसी व्यक्ति में किस स्तर तक हो सकती है इसका उदाहरण सुकरात की कहानी से लिया जा सकता है। सुकरात के अपने मूल्य इस हद तक स्थापित थे और उनकी तटस्थता का स्तर उच्चतर था, यह इस बात से प्रमाणित होता है कि जब सुकरात ने ईश्वर के विषय मे कुछ विचार समाज के सामने रखे, जो समाज के कुछ लोगो को पसंद नहीं आये, जिस पर दंड स्वरूप सुकरात को मृतुदण्ड की सजा सुनाई गई। इस घटना के बाद सुकरात के शिष्य प्लेटो ने अपने गुरु को जेल से भागने की योजना बनाई और सुकरात से आग्रह किया। सुकरात ने इस पर प्लेटो से कहा कि "मौत के डर से मैं जेल से भागूंगा नहीं, यदि मैं भाग गया तो अपने शरीर को तो बचा लूंगा, लेकिन विचार मर जायेंगे, जबकि शरीर से ज्यादा विचार महत्वपूर्ण है। और इसके अगले दिन सुकरात ने स्वयं ही ज़हर का प्याला पी कर प्राण त्याग दिए। इस कथा से तातपर्य यह कि सुकरात की अपने जन्म से विकासक्रम के साथ बने नैतिक मूल्य व मोरालिटी की रक्षा की।

न्यूटन और गेलिलियो जैसे लोगों को भी समाज में ऐसी ही स्थितियों का सामना करना पड़ा और उन्होंने अपने अपने तरह से समाज को इसके जवाब दिए।

अंत मे कह सकते है कि सामाजिक ताना बाना एक व्यवस्था के अनुरूप बनता है, या यूं कहें कि कई सारी व्यवस्थाओं को मिलाकर एक व्यवस्था बनती है जिसको समाज सर्वमान्य रूप से मान लेता है। इसके लिए आवश्यक है कि कुछ आधारभूत मूल्य व आचरण, प्रतिमान सभी मे समान रूप से उपलब्ध हों। जब यह आधारभूत नैतिक मूल्य,आचरण व प्रतिमान अधिक मात्रा में उपलब्ध हों, तब यह सामाजिक व्यवस्था बनती है, लेकिन यह भी सच है कि कुछ हिस्सा ऐसा भी होता है जहां मूल्य व आचरण का सामंजस्य नही हो पाता। इसी असामनता व असंगत सामजंस्य के तानेबाने से समाज नामक संस्था का निर्माण होता है।

सार यह कि नैतिक जीवन के आदर्श से स्थापित प्रतिमानों को मानें और समाज निर्माण में अपनी भूमिका का निर्वहन करें।

©डॉ.मोहन बैरागी

20/7/2022

Wednesday, July 13, 2022

यथार्थ में आदर्श या आदर्श में यथार्थ लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी


यथार्थ में आदर्श या आदर्श में यथार्थ

लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी

मनुष्य के वर्तमान जीवन में यथार्थवाद की अधिकता है और आदर्श तथा मूल्य समाप्त होते जा रहे है।

सरल भाषा मे कहें तो मनुष्य जीवन के सच को यथार्थ कहा जा सकता है और यह सामाजिक, मनोवैज्ञानिक आदि कई प्रकार का हो सकता है। इसी यथार्थ से कभी कभी आदर्श की भी प्रतिस्थापना होती है। 

आधुनिक सोच तथा तात्कालिक मनःस्थिति में विवेकहीनता दिखाई पड़ रही है। साहित्य में भी आधुनिक काल के लेखकों ने आदर्श से ज्यादा यथार्थ को महत्व दिया है। ज्यादातर लेखकों ने रिश्तों में प्रेम का उल्लेख किया, और वो भी छायावाद के प्लेटोनिक प्रेम की तरह। इसी क्रम को जयशंकर प्रसाद तथा प्रेमचंद जैसे लेखकों ने भी लिखा, जिसमे संबंधों में प्रेम तो है, लेकिन अपर्याप्त या अप्राप्त..? यहां प्रेम के औदात्य या उसकी गरिमा को कुछ इस तरह दर्शाया या लिखा गया कि यह मनुष्य जीवन का हिस्सा तो है, पर पूर्णता नहीं है। कहा जा सकता है कि आधुनिक कहानियों में यथार्थवाद हावी है आदर्शवाद नही।

विचारणीय है कि मनुष्य की कहानी के यथार्थवाद महत्वपूर्ण है या यथार्थवाद की कहानियां।

आधुनिक काल में 1901 में माधवराव सप्रे की हिंदी साहित्य की पहली कहानी "एक टोकरी भर मिट्टी" थी, जिसमें यही असमंजस है।

थोड़ा और विचार करने पर लगता है कि लेखकों ने मनुष्य को उलझाए रखने या उसकी सोच या विवेक को सक्रिय बनाये रखने के लिए इस तरह के प्रयोग किये है, जबकि

रस के आस्वादन के समय कथा, कथानक, उद्देश्य के साथ उसके यथार्थ के साथ तादात्म्य बैठाने की कला मनुष्य में जन्मजात उपस्थित होती है।

यथार्थ और आदर्श की उलझन को समझने की दृष्टि से कई लेखकों ने इसका भी विवेचन किया। जैसे, मुक्तिबोध ने कहा कि यथार्थवादी कथ्य को प्रस्तुत करने के लिए शिल्प को कभी कभी गेर यथार्थवादी होना पड़ता है। कथ्य यथार्थवादी हो तो आवश्यक नही की शिल्प भी यथार्थवादी हो।  कुछ लेखक तो जीवन मूल्यों से इतर यथार्थ को प्रस्तुत करने की कोशिश में फंतासी तक पहुंच जाते है और पाठक या आम मनुष्य को रोचक ढंग से या नाटकीय ढंग से आदर्श... यथार्थ को दर्शाने के प्रयास में रहते है। एक और लैटिन लेखक गरसिया मारकॉज़ का मानना था कि यह मैजिकल रियलज़म है। अतिप्राकृतिक तत्वों का इस्तेमाल कर यथार्थ को उभारने के प्रयास को मैजिकल रियलज़म माना जाता है। वर्तमाम समय के लेखकों में उदय प्रकाश भी यही प्रयोग करते है।

यथार्थ और आदर्श को लेखकों ने समाज के सामने अपने अपने तरीके से प्रस्तुत किया है।आधुनिक समाज के मनुष्य ने अपनी धारणाये पूर्व प्रसंगों को आधार मानकर तय की हुई है। आदिकाल में जैसे वाल्मीकि रामायण में एक प्रसंग है जिसमे राम वनवास से लौटकर आते है, फिर अवध का राजपाठ संभाल लेते है और वशिष्ठ उनके गुरु है।

किसी एक दिन राम अपने गुरु वशिष्ठ से पूछते है कि राज्य में सबकुछ ठीक है या नही, वशिष्ठ जवाब देते है राजन, यह कार्य आप स्वयं राज्य में घूमकर देखें। तब राम अपने राज्य में घूमकर देखते है, उन्हें एक व्यक्ति तपस्या करते मिलता है, राम प्रसन्न होकर सोचते है कि उनके राज्य में सब सुख शांति है और लोग अपने जीवन कार्य के अलावा तपस्या और भक्ति भी करते है, वे पूछते है, तुम कौन हो...! जवाब मिलता है मेरा नाम शम्बूक है...!, किस वर्ण के हो...शुद्र हूँ..! यह सुनकर राम क्रोधित हो जाते है और तुरंत शम्बूक की गर्दन धड़ से अलग कर देते है, इस विचार से की शुद्र होकर तपस्या कैसे कर सकता है..?

इसी प्रसंग को तुलसीदास जी ने मानस में नही लिखा है...?  कुछ और ऐसे कुछ प्रसंग भवभूति ने अपनी राम कथा में लिखे जबकि तुलसी ने नही लिखे...?  

प्रश्न यह कि कथानक यथार्थवाद के कितने करीब....? 

उत्तर यह, संभवतः यथार्थवाद से ज्यादा आवश्यक आदर्शवाद की स्थापना है। समाज मे आदर्श स्थापित होंगे तभी मनुष्य आदर्श के आधार पर नैतिक जीवन जी सकेंगे।

सार यह कि नैतिक रहें, नैतिक बनें, और आदर्श जीवन जियें।

©डॉ. मोहन बैरागी

14/7/2022

Sunday, July 3, 2022

लय के वलय में घूमता मनुष्य !

 


लय के वलय में घूमता मनुष्य !

स्वांस के आरोह अवरोह से मनुष्य का जीवन चलता है तथा स्वांस के इसी गतिक्रम से मनुष्य जीवित रूप में समाज मे अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है।

अर्थात आरोह-अवरोह के क्रम को, जो लयबद्ध होकर निरंतर चलता है, जिससे मनुष्य के जीवित होने की अनुभूति स्वयं तथा दूसरों को होती है, जिससे लयात्मक होने का  प्रमाण मिलता है, यही लय है।

मनुष्य के मश्तिष्क की स्थिति यह होती है कि जब किसी खास क्रम में कोई चेतना उत्पन्न होती है तब वह किसी रिदम में अनुभूत होती है और यही रिदम या लय उसे आत्मसंतुष्टि की और लेकर जाती है और आत्मसंतुष्ट मनुष्य जीवन को मधुरम तल्लीनता के जीता है।

जीवन के कथानक और कथावस्तु में लय न हो तो जीवन नीरस हो जाता है। मनुष्य का जीवन प्रारम्भ से ही लयबद्ध रहा है। उत्पत्ति तथा विकास के क्रम अथवा उसके आदर्श व यथार्थ को तात्कालिक रूप से नजरअंदाज कर दें तो भी यह स्पष्ट है कि भौतिक वस्तु को नकार कर हम चेतना की तरफ दृष्टिगत होते है तब यही पाते है कि जीवन अथवा जैविक शरीर से संयोजित मनुष्य प्रत्येक चरण व स्तर पर लयबद्ध है। 

हिंदी साहित्य में भी लय को महत्वपूर्ण माना है। साहित्य का पद्य भाग तो लय के बिना अधूरा ही माना जाता है, कमाल यह कि परिभाषा के मान से व्याकरण के मानकों को भंग कर सृजित की गई रचना को पद्य (लयबद्ध) की श्रेणी में रखा जाता है, और व्याकरणगत फ्रेम में लिखी या कही गयी रचना गद्य का हिस्सा हो जाती है, जिसमे लय की अनुपलब्धता होती है। 

गहनता व गंभीरता से ध्यान दें तो हम पाते हैं कि हमारे वेद व पुराण तथा ऐतिहासिक/पौराणिक ग्रंथों से भी समझ आता है कि लय के बिना मानव जीवन की कल्पना ही व्यर्थ है। 

वेद की ऋचाओ से शुरू कर या वाल्मीकि से लेकर सुर, कबीर, मीरा तुलसी के साहित्य से जब दुनिया परिचित हुई या आधुनिक मनुष्य ने जब इनके कहे को जाना तब यह माना कि वाकई सबकुछ लयबद्ध है। रामचरित मानस से लेकर महाभारत में लयबद्धता दिखाई देती है, या कालिदास की शकुंतला से लेकर आधुनिक गद्य कविताएं भी जीवन के लय को प्रदर्शित करती है। इसी लय के तारतम्य में जीवन के बनने की कुंजी है।  मूलतः यह आज का यथार्थवाद भी है। इसी यथार्थ की वजह से दुनियां/ धरती की प्रत्येक वस्तु अपने लय में सुचारू रूप से संचलित हो रही है।

मनुष्य के जीवनक्रम में उसके जीवित रहने को आवश्यक यह लय उसके द्वारा बनाये रिश्तों अथवा जन्मजात प्राप्त रिश्तों में भी आवश्यक होती है। यह लय ही है जो रिश्तों को मधुरता प्रदान करती है तथा उन्हें जीवंत बनाती है। रिश्तों में यदि लय का तानाबाना बिगड़ता है तब लय भंग होती है और रिश्तें टूटन की और बढ़ने लगते है। आधुनिक समाज मे एक साहित्यकार द्वारा कहानी लिखी गयी जिसका नाम था "अलग्योझा" ।

इस कहानी के शीर्षक का तात्पर्य है रिश्तों का या परिवार या संयुक्त परिवार का टूट जाना ? वर्तमान दौर में आत्मनिष्ठ होने की चेष्ठा में हर व्यक्ति या परिवार एक दूसरे से तथा निकटतम रिश्तों से भी विलग होते जा रहे है। यह विलगता या टूटन से दूरियां इस तरह से तय हो रही है,जैसे मैं स्वयं सर्वश्रेष्ठ हूँ और बाकी रिश्ते और विचार मुझ पर अनावश्यक रूप से थोपे जा रहे हैं ? जुड़ाव की अपेक्षा टूटन ज्यादा दिखाई देती है ,और यह टूटन भी वर्तमान संदर्भ में लय के टूटने को दर्शाती है। स्पष्ट है कि प्रकृति में, चल-अचल में, संसार में या मनुष्य जीवन में लय भंग होगी तो गीत नही बनेगा, और जीवन एक सुरीले गीत का नाम है।

अंततः प्रयास हो, सुर, ताल और लय को साधकर सुरीले गीत सा जीवन हो।

©डॉ.मोहन बैरागी

Monday, May 30, 2022

नैपथ्य से आमुख की यात्रा लेखक :- डॉ. मोहन बैरागी



 नेपथ्य से प्रारंभ कर सम्मुख परिवेश में प्रविष्ट करता मनुष्य बाहरी आवरण पर युगीन भौतिक व रासायनिक सतहों से आच्छादित अपने प्राकट्य को प्रतिस्थापित करने की चेष्टा में प्रयत्नशील रहता है। 

मूलत: मनुष्य की वृत्ति का निर्मितिकरण इस प्रकार है कि वह ‘परा‘ से ‘परम‘ की प्रवृत्ति के केन्द्र पर आवृत होता है। जीवन के सारत्त्तवों को सूत्रों में समाविष्ट करने के निमित्त पल-प्रतिपल नवीन छवि को प्रस्तुत करना चेतना के केन्द्र में होता है।

सृष्टि में प्रत्येक वस्तु की तीन अवस्थाएं प्रदर्शित हैं-भूत,वर्तमान व भविष्य। इन्हीं तीनों प्रकारान्तर स्थितियों से सजीव व निर्जिव की यात्राएं संचालित होती है। जीवन के नाट्य में नेपथ्य का बड़ा महत्व है, जहां मनुष्य अपने मूल अस्तित्व में न होकर भी आवश्यक-अनावश्यक नये स्वांग रचने की भूमिका तैयार कर रहा होता है, किंतु हर क्षण बदलते अस्तित्व को विस्मृत कर नये क्षण के समावेशीकरण के मध्य उसका अशेष भाग बन रहा होता है।

विवेक के विचलन से उत्स्र्फूत इस नये विचार के साथ कि, उसने स्वयं को परिवॢतत कर नये स्वरूप में प्रस्तुत किया है, जबकि वह मूल प्रकृति के स्वाभाविक बदलाव का हिस्सा हो रहा होता है।

सूक्ष्म कोशिकीय ईकाई से लेकर भौतिक मनुष्य बनने तक कि प्रक्रिया में नेपथ्य से सम्मुख तक कि यात्रा मनुष्य तय करता है, तथा प्रत्येक नवीन आगमित क्षण अथवा समय पर पिछले चित्र व चरित्र की परिवर्धित छवि  अंकित करने का निर्मल प्रयास करता है।

दरअसल मनुष्य की भावना नैतिक संसार मे आदर्श और मूल्यों के आधार पर प्रतिमान स्थापित करने की सहज धारणा धारण कर स्वयं के चरित्र और चित्र को सकारात्मक दृष्टिकोण में अग्रेषित कर स्थापित करने की होती है। किन्तु समाज या समूह की भृकुटियां सदैव उर्ध्व पर आकृष्ट होती है। और वह समाज या समुच्चय में स्थापित प्रतिमान के बगैर कोई आदर्श या प्रतिमान को मान्यता नही देना चाहता।

विषय के मूल में यह है कि व्यक्ति चेष्टानुरूप सदैव प्रयास सकारात्मक पटल पर प्रक्षेपित समय व समाज अनुरूप छवि प्रस्तुत करना चाहता हैं,किन्तु समय के साथ तादात्म्य या साम्य स्थापित कर ही प्रदर्शित होगा,इसकी कोई गारण्टी नहीं..?

कहना यह है कि तीन विभिन्न स्थितियों के साथ यात्रा कर पल प्रतिपल बदलता मनुष्य चित्र व चरित्र से...? नेपथ्य से आमुख तक भरसक प्रयत्नशील होकर स्वच्छ व उत्कृष्ट आकृति प्रस्तुत करना चाहता है, जो समय के सापेक्ष होकर प्रतिमान कि स्थापना कर सके।

महान दार्शनिक अपने मूल या पूर्व के स्वरूप में अत्यंत कुरूप व अनाक्रष्ट किस्म के व्यक्ति की छवि प्रस्तुत करते है, तथापि अपने विचारों व दार्शनिक सिद्धान्तों से समाज में चिंतन की निर्मिति करने वाले प्रतिमान स्थापित कर गुजरते है, तो वहीं बुद्ध घर से निकलने से पूर्व अलग प्रकार का व्यक्तित्व समाज को दर्शित करवाते है तो वही बुद्ध होकर दुनिया को नया समाज, स्वरूप, सिद्धान्त,जीवन दर्शन देकर जाते है।

नेपथु से आमुख की इस यात्रा मैं हिन्दू धर्म व संस्कृति के संवाहक मर्यादा पुरुषोत्तम राम, राम से श्री राम होने तक कि यात्रा तय कर नए युग को नई मर्यादा के प्रतिमान देकर जाते है।

सार यह कि....नेपथ्य से आमुख की यात्रा तय करें....लेकिन आदर्श के साथ प्रतिमान स्थापित करते हुए।

तभी हो सकेगा...जीवन रूपी नाटक का सही मंचन।

शुभकामनाएं।

©डॉ. मोहन बैरागी

Friday, May 13, 2022

झांकते लोग..... लेखक : डॉ. मोहन बैरागी

 झांकते लोग.....

लेखक : डॉ. मोहन बैरागी

ताक-झाँक करना स्वभावतः मनुष्य के स्वभाव का हिस्सा बन चुकी आदत है।  जब अंतस्थ: अनसुलझी शरीर व मस्तिष्क की तंत्रिकाओं के साथ संवेदना को स्थान्तरित करने वाली तंत्रिकाएं अनासक्त अपेक्षा प्रदर्शित करती है तथा ज्ञात-अज्ञात वस्तु, स्थिति व ज्ञान के सापेक्ष सृष्टि के यथार्थ को दृष्टि के पृष्ठ पटल पर केंद्रित कर उसका अंकन करना चाहती है, जिससे हृदय के अनजाने भाग को कंपन की अनुभति होती है,जो मस्तिष्क समेत समस्त शरीर मे उत्स्फूर्त तरंगे पैदा करता है, जिससे तात्कालिक रूपेण सकारात्मक भाव पैदा होता है, जिसे खुशी कहते हैं, इसके परिणामस्वरूप आँखें सामान्य अनुपात से कुछ अधिक खुलती है तथा अधरों का भूगोल भाव-भंगिमाओं के साथ बदल जाता है, तथापि चेहरे के केंद्र पर अस्थाई किन्तु सूक्ष्म खिलखिलाहट प्रदर्शित होने लगती है।

यह स्थिति कई परिस्थितियों में उत्पन्न होती है और मनुष्य तब उत्फुल्लता की सीधी रेखा पर स्वयं को खड़ा पाता है।

झाँकने की यह वृत्ति वैज्ञानिक प्रक्रिया के निष्पादन स्वरूप स्वतः उत्पन्न क्रिया है।

संरचनात्मक सर्जना के पश्चात से तथा देह में सांस धारण के पश्चात से लेकर अंतिम सांस से कुछ अवधि पूर्व तक मनुष्य में झाँकने की कला का जन्म व विकास होकर उसका सोच व विचार के आधार पर परिवर्धन होता रहता है। मनुष्य शरीर के सैकड़ो,हज़ारो भावों में से यह एक विचार मनुष्य के मस्तिष्क में स्थायी निवासी होकर यात्रा करता है। झाँकने की वृत्ति सदैव नकारात्मक व पूर्व नियोजित नहीं होती, शिशु मातृ संबंध में शिशु माता को नेह भाव से भूख प्यास की अवस्था में झांकता है तो वहीं युवा मनुष्य भी तात्कालिक रूप से उत्पन्न त्वरित विचार की परिणति के रूप में अपने आस-पास के वातावरण व व्यक्तियों के जीवन मे झाँकता है।

आधुनिक दुनिया का मनुष्य झाँकने की कला को जैसे अपना संवैधानिक अधिकार ही समझता है। ब्रिटेन में 1354वी सदी के आसपास में एक शब्द आया मैग्नाकार्टा, जो आया तो व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को लेकर था। (अधिकारों का घोषणापत्र)

कहना यह कि ... जैसे हर कोई मान के चलता है कि वह मैग्नाकार्टा (झाँकने का अधिकार) को अपने चेहरे पर ओढ़कर चलता है। और जब तब चेहरे को उघाड़ सकता है..?

झाँकने की क्रिया कई परिप्रेक्ष्य में संपादित होती है। सृष्टि के सृजन तथा मानव विकास से लेकर अब तक इसके लाखों-करोड़ों उदाहरण मिलते हैं, जिसमें अकारण अथवा सकारण झांका गया है। इस कला के संपादित होने पर कई ऐसी घटनायें कालजयी होकर इतिहास में दर्ज हैं।

सतयुग,त्रेता,द्वापर और कलयुग...हर युग में इस झाँकने की प्रवृति ने सभ्यता व मनुष्य संस्कृति को आहत कर ऐतिहासिक व पौराणिक किस्से-कहानियों को गढ़ा हैं।रामायण व महाभारत में कई ऐसे पात्र व उनकी कथाएं मौजूद हैं जिनके झाँकने से युद्ध की विभीषिका तक समय जा पहुंचा।आधुनिक सभ्यता के मनुष्य में स्वयं के छिद्रान्वेषण की 

वृत्ति (आदत) भीतर केंद्र में सामान्यतः नहीं रही, जिससे कि वह इस महीन कला से निवृत्ति के सोपान कभी पहुंच भी सके..?

चारित्रिक निर्मिति के असंख्य हिस्सो में से यह एक हिस्सा है। माना जाता है कि मनुष्य के वैचारिक दृष्टिकोण की निबद्धता से चारित्रिक निर्मिति समेत उसकी अस्मिता का स्थायी अथवा अस्थायी निर्माण होता है। प्रसिद्ध दार्शनिक फ्रायड का मानना है कि मनुष्य की अस्मिता स्थिर नहीं है तो वहीं एरिक ऐरिक्सन कहते हैं कि अस्मिता दो व्यक्तियों के बीच परस्पर पहचान एवं सामुदायिक संस्कृति से प्राप्त पहचान में निहित है।

व्यक्ति की चारित्रिक अस्मिता से विलग झाँकने की इस कला में निपूर्ण मानव वर्तमान, भविष्य तथा कालांतर में भी झाँकता है।

दुनिया मे प्रेम का स्थायी स्मारक दुनिया को देने वाले शाहजहां ने प्रेम के लिए ताजमहल बनवाया लेकिन शाहजहां अपनी उम्र के अंतिम समय मे 8 वर्ष तक अपने ही बेटे औरंगजेब की कैद में आगरा किले में रहा, और वहीं से ताजमहल को झाँकते था।

कुछ अलग तरह से वैश्विक स्तर पर एक और उदाहरण देखें तो....अमेरिका ने एक गलतफहमी के चलते (इस बात पर डिबेट है की स्पेन की वजह से अमेरिका के 200 से अधिक लोगो की मौत हो गयी थी।) स्पेन से बदला लेने के इरादे से अपनी सेना को भेजकर क्यूबा को स्पेन से आज़ाद करवाया।

क्यूबा के एक शहर गुवांतानामो बे को प्रिवेंटिव डिटेंशन सेंटर के नाम पर लगभग कब्जा किया,जबकि यह स्थान लीज पर अमेरिका ने क्यूबा को स्पेन से आज़ाद कराने के समय लिया था, और आज भी इस स्थान को अमेरिका न सिर्फ झांककर देखता है बल्कि इस स्थान पर अपना अधिकार ही जमा लिया है?

सरल शब्दों में कहना यह कि...अपने आस पास के वातावरण, दूसरों के जीवन, फेसबुक से लेकर व्हाट्सएप और ट्विटर, सभी जगह पर अनावश्यक न झाँके..? 

झाँकना ही है तो स्वयं में झाँके...की जीवन की इस यात्रा में हम कहाँ पहुँचे।

©डॉ.मोहन बैरागी

Tuesday, May 3, 2022

मोजड़ी में रेत लेखक - डॉ. मोहन बैरागी

 


जब जीवन की त्वरा तिर्यक रेखा पर तत्सम त्रिकोण बनाती हुई आगे बढ़ती है, तब त्वरित व तात्कालिक उत्पाद सफलता के चर्मोत्कर्ष पर स्वयं को देखना मनुष्य की असंतुलित कल्पना है, जो फलीभूत होने के केंद्र पर दृष्टिपात करती है, किन्तु सवाल सतह पर होता है...? उसके लिये प्रयास कितने मनोयोग से किये गए...? हर मनुष्य स्वयं को श्रेष्ठ तथा श्रेष्ठतम घोषित करने की दौड़ में है। 

शरीर संरचना निर्माण के बाद से संगत - असंगत परिस्थितियों के चलते मनुष्य जीवनपर्यंत उम्र के किसी भी हिस्से में तय नहीं कर पाता कि उसके निर्माण से पृकृति व अन्य पशु-पक्षियों, जानवरों,मनुष्यों अथवा सृष्टि को क्या मिला या उसने क्या दिया...? उसे लोभ सदैव पाने का होता है की हासिल क्या हुआ..? भौतिकी में न्यूटन का तीसरा सामान्य सिद्धान्त है कि यदि कोई गेंद किसी दीवार पर जिस बल से फेंकोगे, प्रतिक्रिया स्वरूप वह पुनः अपने बल से आपकी तरफ लौटेगी। सामान्यतः बुद्धियुक्त मनुष्य इस बात से अनभिज्ञ होता है एवं वह देह की आयु के सोपान को पूर्ण करने की चेस्टा में लगा रहता है। प्रमाणित है कि मनुष्य पर संस्कृति का प्रभाव होता है और संस्कृति के अनुरूप ही उसका विकास होता है।

अध्ययन से पता चलता है कि मोनोलिथिक संस्कृति (कोई एक संस्कृति जो दूसरी पर प्रभावी हो) में जब मनुष्य फंसता है तब चाहे अनचाहे उसे मोनोलिथिक संस्कृति को स्वीकार करने की मजबूरी होती है और उसी संस्कृति के अनुरूप उसके आचार-विचार व संस्कार का निष्पादन होता है। इसी संस्कृति के मनुष्य में निष्पत्ति स्वरूप अन्य से श्रेष्ठ न दिख पाने या प्रमाणित हो पाने की दशा में प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष या भीतर कहीं आभासित चुभन या जलन का भाव पैदा हो जाता है। व्यक्ति सृष्टि के प्रारंभ से किन्ही भी संस्कृतियों से जन्मा हो अथवा देश काल परिस्थिति अनुरूप कोई भी संस्कृति से संस्कारित हुआ हो, या हृदय के नेपथ्य में सूक्ष्म सकारात्मक भाव से यदि मेल्टिंग पॉट कल्चर (गलन पात्र संस्कृति) के सिद्धान्त को अपनाकर उसमे शामिल हो भी जाता है। तब भी अन्य से एकात्म होने का भाव पैदा नहीं कर पाता। निर्माण प्रक्रिया के कोई भी कल्चर या किसी संस्कृति को हम ले लें, जैसे- सेलेड-बोल अथवा मोज़ैक कल्चर के देश भारत मे चुभन का फिर भी बड़ा ही महत्व है।

दूसरे से ईर्ष्या या उसके श्रेष्ठ होने की चुभन हमें उसके दर्शन किसी माफिया सदृश्य करवाती है।

माफिया (इटली से आयातित शब्द जिसके अपने भारतीय अर्थ है..?) अपनी चुभन का एहसास शरीर के स्नायुतंत्र को कष्टयुक्त तरंगे पैदा करने में करता है, जो मश्तिष्क के फ्रंटल, पेरिटल व ऑक्सीपिटल लोब को सूचना संप्रेषित कर दर्द के भाव को पैदा करता है और यही दर्द का भाव मनुष्य को विचलित करता है..?

संस्कृति ही है जो सभ्यता के साथ विकसित होती हुई मनुष्य में संस्कारों का निर्माण करती है। दुनिया की कोई संस्कृति व सभ्यता मनुष्य को मनुष्य से जलना नही सिखाती, वरन यह परिस्थितिवश उत्पन्न विचार है जो स्वयं को कुंठाग्रस्त करता है।

आँख में किरकिरी, शरीर मे सुई चुभना, पैर में कंकड़ चुभना, पिन चुभना आदि कई मुहावरे है जिनसे लेखको व साहित्यकारों ने इसको व्याख्यायित किया है। कई बार चाह कर तथा कई बार अनजाने में मनुष्य दूसरों की आँख की किरकिरी बन जाता है अथवा कई बार उसकी कमीज मेरी कमीज़ से सफेद कैसे का भाव हृदय के पृष्ठ भाग तथा चेहरे की सतह पर पाल लेता है। वह यह नहीं सोचता कि यदि मोजड़ी (पैर में जूती) पहन कर समुद्र किनारे जाएगा तो रेत उसकी मोजड़ी में फसेंगी ही, जो एक समय दर्द का एहसास देगी...? 

सिद्धान्ततः कई निर्बल मनुष्यों को स्वयं के बल का भान नहीं होता, तब ऐसी स्थिति में परिस्थिति व परिवेशजन्य बल उस पर भारित होता है।

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ लघुकथकार संतोष सुपेकर की लघुकथा में एक पात्र छगनलाल को अपकेंद्रीय बल 

का आभास होता है।

अपकेंद्रीय बल के कारण किसी गतिशील वस्तु में केंद्र से दूर भागने की प्रवृत्ति होती है। यह वो आभासी बल है जो अभिकेंद्रीय बल के समान तथा विपरीत दिशा में कार्य करता है। 

सारांश यह कि अन्य चुभन से उत्पन्न दर्द से न कराहें, बल्कि स्वंय को चुभोते रहें, खुश रहने व खुश रखने के लिए।

मोजड़ी की रेत को हृदय व मष्तिष्क में न चुभने दें।

@डॉ.मोहन बैरागी