जीवन की त्रिज्या : केंद्र से परिधि तक मनुष्य की अनंत यात्रा
लेखक - डॉ. मोहन बैरागी
कहा जाता है कि संसार की सबसे बड़ी खोज अमेरिका की खोज नहीं थी, न गुरुत्वाकर्षण की खोज थी, न बिजली की खोज थी। संसार की सबसे बड़ी खोज मनुष्य द्वारा स्वयं को खोजने की खोज थी। विडंबना यह है कि हजारों वर्षों की सभ्यता, विज्ञान, दर्शन और प्रौद्योगिकी के बाद भी मनुष्य आज तक स्वयं को पूरी तरह नहीं खोज पाया है। वह चंद्रमा तक पहुँच गया, मंगल ग्रह तक यान भेज दिया, समुद्र की गहराइयों को माप लिया, परमाणु को तोड़ दिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता बना ली, लेकिन अपने ही मन की गहराई को नहीं माप सका।
यहीं से "जीवन की त्रिज्या" का दर्शन प्रारंभ होता है।
गणित हमें बताता है कि वृत्त का अस्तित्व उसकी त्रिज्या पर निर्भर करता है। त्रिज्या न हो तो वृत्त नहीं बन सकता। केंद्र और परिधि के बीच जो अदृश्य संबंध है, वही त्रिज्या है। यदि इस सरल गणितीय तथ्य को जीवन पर लागू करें तो एक अद्भुत दर्शन हमारे सामने खुलता है।
जीवन भी एक वृत्त है।
उसका एक केंद्र है और एक परिधि।
केंद्र है—आत्मा, चेतना, विवेक, संवेदना, अंतर्मन।
परिधि है—धन, पद, परिवार, समाज, सत्ता, प्रेम, संघर्ष, उपलब्धियाँ, असफलताएँ और जीवन के समस्त बाहरी अनुभव।
इन दोनों को जोड़ने वाली रेखा ही जीवन की त्रिज्या है।
समस्या तब शुरू होती है जब मनुष्य परिधि को ही जीवन समझ बैठता है और केंद्र को भूल जाता है।
आज का मनुष्य सुबह उठते ही मोबाइल देखता है। वह दुनिया की खबर जानना चाहता है, लेकिन अपने भीतर की खबर नहीं। उसे यह पता है कि शेयर बाजार ऊपर गया या नीचे, लेकिन यह नहीं पता कि उसके भीतर का संतुलन ऊपर जा रहा है या नीचे। वह हजारों लोगों से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन स्वयं से कटा हुआ है।
यह आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा व्यंग्य है।
मनुष्य ने संचार के साधन बढ़ाए हैं, संवाद की क्षमता नहीं।
घर बड़े बनाए हैं, परिवार छोटे कर लिए हैं।
जानकारी बढ़ाई है, समझ कम कर ली है।
परिधि बढ़ी है, केंद्र सिकुड़ गया है।
भारतीय दर्शन हजारों वर्षों से इसी संकट की ओर संकेत करता आया है।
उपनिषदों का समस्त चिंतन मनुष्य को उसके केंद्र तक पहुँचाने का प्रयास है। "तत्त्वमसि", "अहं ब्रह्मास्मि", "अयमात्मा ब्रह्म"—ये केवल दार्शनिक सूत्र नहीं हैं। ये मनुष्य को यह याद दिलाने वाले वाक्य हैं कि तुम्हारा वास्तविक अस्तित्व बाहर नहीं, भीतर है।
ऋषियों ने देखा कि मनुष्य बाहर की वस्तुओं के पीछे भागते-भागते स्वयं को खो देता है। इसलिए उन्होंने कहा कि जिस सत्य को तुम संसार में खोज रहे हो, वह तुम्हारे भीतर बैठा है।
यह विचार केवल भारतीय दर्शन तक सीमित नहीं है।
सुकरात ने कहा था—
"Know Thyself" अर्थात् स्वयं को जानो।
यह पश्चिमी दर्शन का सबसे प्रसिद्ध वाक्य है।
यदि ध्यान से देखें तो उपनिषदों का "आत्मानं विद्धि" और सुकरात का "Know Thyself" एक ही दिशा में संकेत करते हैं। दोनों मनुष्य को उसके केंद्र तक लौटने का निमंत्रण देते हैं।
लेकिन मनुष्य का स्वभाव विचित्र है।
वह अपने घर की चाबी खो जाए तो पूरा घर सिर पर उठा लेता है, लेकिन स्वयं को खो दे तो उसे पता भी नहीं चलता।
वह बैंक पासबुक संभालकर रखता है, लेकिन अपने मन की किताब कभी नहीं पढ़ता।
यही कारण है कि बाहरी समृद्धि के बावजूद आंतरिक रिक्तता बढ़ती जा रही है।
कबीर ने इसी विडंबना को एक पंक्ति में पकड़ लिया—
"कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढे वन माहि।"
हिरण अपनी नाभि में सुगंध लिए जंगलों में भटकता रहता है। मनुष्य भी उसी हिरण की तरह है। सुख भीतर है, लेकिन वह उसे वस्तुओं में खोजता है। शांति भीतर है, लेकिन वह उसे पदों में खोजता है। प्रेम भीतर है, लेकिन वह उसे प्रतिष्ठा में खोजता है।
जीवन की त्रिज्या का पहला सिद्धांत यही है कि परिधि की यात्रा तभी सार्थक है जब केंद्र से संबंध बना रहे।
भगवद्गीता में अर्जुन का संकट भी यही था। वह युद्धभूमि में खड़ा था। उसकी परिधि अस्त-व्यस्त हो गई थी। रिश्ते, कर्तव्य, नैतिकता, भावनाएँ—सब टकरा रहे थे। श्रीकृष्ण ने उसे बाहर का समाधान नहीं दिया। उन्होंने पहले उसके भीतर को व्यवस्थित किया।
गीता का सबसे बड़ा संदेश यही है कि जीवन की परिधि को ठीक करने से पहले केंद्र को स्थिर करना आवश्यक है।
क्योंकि केंद्र विचलित होगा तो निर्णय भी विचलित होंगे।
केंद्र स्थिर होगा तो तूफान में भी संतुलन बना रहेगा।
बुद्ध का जीवन भी जीवन की त्रिज्या का अद्भुत उदाहरण है।
राजमहल उनके लिए परिधि था। वैभव परिधि था। सत्ता परिधि थी। लेकिन उन्होंने देखा कि इन सबके बावजूद मनुष्य दुखी है। तब उन्होंने केंद्र की खोज प्रारंभ की।
बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें जो ज्ञान प्राप्त हुआ, वह किसी नई वस्तु की खोज नहीं थी। वह अपने ही केंद्र की पुनर्खोज थी।
इसलिए बुद्ध ने संसार छोड़ने का नहीं, मोह छोड़ने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि दुख का कारण वस्तुएँ नहीं हैं, उनसे जुड़ी हमारी आसक्ति है।
यही त्रिज्या का दूसरा सिद्धांत है—परिधि में रहो, पर उसके दास मत बनो।
यहीं से साहित्य इस दर्शन को और अधिक मानवीय बना देता है।
तुलसीदास के राम केवल धार्मिक पात्र नहीं हैं। वे मर्यादा के केंद्र हैं। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, पर उनका केंद्र नहीं बदलता।
वनवास मिला, केंद्र नहीं बदला।
राज्य मिला, केंद्र नहीं बदला।
वियोग मिला, केंद्र नहीं बदला।
यही स्थिरता उन्हें कालजयी बनाती है।
सूरदास के कृष्ण प्रेम की ऐसी त्रिज्या रचते हैं जिसमें पूरा ब्रज समा जाता है।
मीरा अपने समय की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांति हैं। उन्होंने परिधि की सारी सीमाएँ तोड़ दीं, लेकिन अपने केंद्र—कृष्ण प्रेम—को नहीं छोड़ा।
कबीर ने तो मानो जीवन की त्रिज्या का पूरा दर्शन ही कविता में लिख दिया।
वे पंडितों पर हँसते हैं, मुल्लाओं पर हँसते हैं, समाज पर हँसते हैं और सबसे अधिक मनुष्य की मूर्खताओं पर हँसते हैं।
क्यों?
क्योंकि उन्होंने देखा कि लोग परिधि के लिए लड़ रहे हैं और केंद्र को भूल चुके हैं।
आज भी दृश्य अलग नहीं है।
लोग धर्म के नाम पर लड़ते हैं लेकिन धर्म के मूल गुण—करुणा, प्रेम और सत्य—को भूल जाते हैं।
लोग राजनीति के लिए मित्रता तोड़ लेते हैं।
लोग संपत्ति के लिए भाई से शत्रु बन जाते हैं।
लोग अहंकार के लिए जीवनभर संबंध खोते रहते हैं।
यह सब परिधि का युद्ध है।
केंद्र का नहीं।
और जब परिधि केंद्र से कट जाती है, तब जीवन की त्रिज्या टूट जाती है।
...और शायद यहीं से जीवन की त्रिज्या का सबसे रोचक, सबसे मानवीय और सबसे व्यंग्यपूर्ण पक्ष आरंभ होता है। क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्य अपनी त्रिज्या बढ़ाने निकलता है, वैसे-वैसे उसे यह भ्रम भी होने लगता है कि वह स्वयं ही केंद्र है और संसार उसकी परिधि।
यहीं जीवन एक हल्की मुस्कान के साथ मनुष्य को देखता है।
पृथ्वी पर जितने भी महान साम्राज्य बने, वे सब इसी भ्रम में बने कि उनकी त्रिज्या अनंत है। मिस्र के फ़राओ, सिकंदर, चंगेज़ ख़ाँ, नेपोलियन, हिटलर—सभी ने अपने-अपने समय में समझा कि उनका वृत्त ही संसार का सबसे बड़ा वृत्त है। लेकिन इतिहास का व्यंग्य देखिए कि आज उनकी विशाल सेनाएँ इतिहास की पुस्तकों में कुछ पन्नों तक सिमट गई हैं। जिस व्यक्ति ने आधी दुनिया जीतने का स्वप्न देखा था, उसकी कब्र भी अंततः कुछ हाथ भूमि में ही समा गई।
कबीर शायद इसी विडंबना को देखकर हँस पड़े थे—
"माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहि।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोहि॥"
यह दोहा केवल मृत्यु का बोध नहीं कराता, बल्कि मनुष्य की उस अहंकारी त्रिज्या पर भी व्यंग्य करता है जो स्वयं को ब्रह्मांड से बड़ा समझ बैठती है।
आधुनिक समय में यह व्यंग्य और भी मनोरंजक हो गया है। पहले मनुष्य गाँव का चौधरी बनकर संतुष्ट हो जाता था। अब वह सोशल मीडिया का सम्राट बनना चाहता है। पाँच सौ मित्र, पाँच हजार फॉलोअर और पचास हजार लाइक देखकर उसे लगता है कि उसकी त्रिज्या ब्रह्मांड तक पहुँच गई है। लेकिन वही व्यक्ति रात को अकेले कमरे में बैठा हुआ किसी के एक संदेश की प्रतीक्षा करता रहता है। यह आधुनिक जीवन का सबसे बड़ा हास्य है कि दुनिया से जुड़े रहने की तकनीक बढ़ती गई और मनुष्य स्वयं से कटता गया।
हिंदी साहित्य ने इस मानवीय विडंबना को बहुत गहराई से समझा है। प्रेमचंद के होरी के पास न कोई सत्ता थी, न प्रतिष्ठा, न संपत्ति; लेकिन उसके जीवन की त्रिज्या इतनी बड़ी थी कि वह आज भी करोड़ों पाठकों की संवेदना का हिस्सा है। दूसरी ओर अनेक धनवान पात्र अपने समय में प्रसिद्ध रहे, लेकिन साहित्य ने उन्हें याद नहीं रखा। इसका कारण स्पष्ट है—साहित्य परिधि नहीं, त्रिज्या मापता है। वह यह नहीं देखता कि व्यक्ति कितना बड़ा था; वह यह देखता है कि उसकी मनुष्यता कितनी दूर तक फैली थी।
सूरदास के कृष्ण, तुलसी के राम, कबीर का निर्गुण ब्रह्म, मीरा का प्रेम—इन सबकी त्रिज्या समय और स्थान की सीमाओं को पार कर गई। पाँच सौ वर्ष बाद भी लोग उन्हें पढ़ते हैं, गाते हैं, याद करते हैं। दूसरी ओर उस समय के कितने ही राजा और सामंत इतिहास के अंधकार में खो गए। साहित्य का न्याय बड़ा विचित्र होता है। वह सिंहासन नहीं बचाता, संवेदना बचाता है।
यहाँ हरिशंकर परसाई याद आते हैं। यदि वे "जीवन की त्रिज्या" पर लिखते तो शायद कहते कि आज का आदमी अपनी त्रिज्या बढ़ाने के लिए इतना व्यस्त है कि उसे यह देखने की फुर्सत ही नहीं कि उसका केंद्र कहाँ है। वह स्वास्थ्य के लिए दौड़ता है, लेकिन तनाव साथ लेकर दौड़ता है। वह समय बचाने के लिए मशीनें खरीदता है, फिर उसी बचे हुए समय को मोबाइल पर नष्ट कर देता है। वह सुख खोजता है, लेकिन सुख मिलने के बाद भी चिंतित रहता है कि कहीं यह सुख कम न पड़ जाए। यह ऐसा ही है जैसे कोई व्यक्ति कुआँ खोदकर पानी निकाल ले और फिर उसी पानी में डूबने लगे।
शरद जोशी होते तो शायद लिखते कि आधुनिक मनुष्य की त्रिज्या का नया नाम "नेटवर्क कवरेज" है। जहाँ तक सिग्नल पहुँच जाए, वहीं तक जीवन है। सिग्नल चला गया तो दर्शन भी चला गया, प्रेम भी चला गया और धैर्य भी चला गया। कभी-कभी लगता है कि बैटरी प्रतिशत और आत्मविश्वास प्रतिशत में कोई गहरा संबंध स्थापित हो चुका है।
लेकिन इन सब हास्यास्पद स्थितियों के बीच जीवन अपना गंभीर सत्य नहीं छोड़ता।
नीत्शे का अतिमानव, कामू का विद्रोही मनुष्य, गांधी का सत्याग्रही, विवेकानंद का आत्मविश्वासी युवक और आइंस्टीन का ब्रह्मांड से जुड़ा हुआ संवेदनशील वैज्ञानिक—सभी अंततः हमें एक ही दिशा में ले जाते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य की महानता उसकी उपलब्धियों में नहीं, उसके विस्तार में है। वह कितना धनवान है, यह महत्वपूर्ण नहीं; वह कितनों के जीवन में प्रकाश बन सका, यह महत्वपूर्ण है।
यही कारण है कि एक साधारण शिक्षक कभी-कभी किसी बड़े उद्योगपति से अधिक बड़ी त्रिज्या रखता है। एक माँ का प्रेम किसी साम्राज्य से बड़ा हो सकता है। एक लेखक का शब्द किसी सेना से अधिक दूर तक यात्रा कर सकता है। एक किसान का श्रम किसी मंत्री के भाषण से अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। संसार का गणित और जीवन का गणित एक-दूसरे से भिन्न होते हैं।
जीवन के इस पूरे विमर्श में सबसे सुंदर तथ्य यह है कि त्रिज्या बढ़ाने के लिए किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं होती। इसके लिए केवल मनुष्य बने रहने की आवश्यकता होती है। करुणा, संवेदना, प्रेम, सह-अस्तित्व, क्षमा और आत्मबोध—ये जीवन की वास्तविक त्रिज्याएँ हैं। इन्हें बढ़ाने वाला व्यक्ति कभी छोटा नहीं रहता, चाहे उसके पास कोई पद हो या न हो।
अंततः जीवन का पूरा वृत्त एक अद्भुत व्यंग्य के साथ पूर्ण होता है। मनुष्य जन्म लेते समय खाली हाथ आता है और जाते समय भी खाली हाथ चला जाता है। बीच का पूरा जीवन वह संग्रह में लगा देता है। मकान, पद, प्रतिष्ठा, बैंक बैलेंस, प्रमाणपत्र, पुरस्कार—सब इकट्ठा करता रहता है। फिर एक दिन समय मुस्कराकर पूछता है—"यह सब ठीक है, पर तुम्हारी त्रिज्या कितनी थी?" अर्थात् तुम कितनी दूर तक मनुष्य बने रहे? कितनी दूर तक तुम्हारी करुणा पहुँची? कितनी दूर तक तुम्हारा प्रेम गया? कितनी दूर तक तुम्हारी स्मृति लोगों के जीवन में उजाला बन सकी?
और तब शायद मनुष्य को समझ में आता है कि जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार कोई सम्मान-पत्र नहीं, बल्कि किसी की आँखों में बची हुई वह कृतज्ञता है जो हमारे जाने के बाद भी जीवित रहती है।
इसलिए जीवन को यदि किसी एक सूत्र में बाँधना हो तो कहा जा सकता है कि जीवन न तो केवल केंद्र है, न केवल परिधि। जीवन केंद्र से परिधि तक की वह सतत यात्रा है जिसमें मनुष्य स्वयं को खोजते-खोजते समस्त मानवता तक पहुँचता है। यही यात्रा उसकी त्रिज्या है, यही उसका दर्शन है, यही उसका साहित्य है और यही उसका अंतिम सत्य।
और शायद इसी कारण संसार के सारे वृत्त एक दिन समाप्त हो जाते हैं, पर मनुष्यता की त्रिज्या कभी समाप्त नहीं होती। वह एक हृदय से दूसरे हृदय तक, एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, एक पुस्तक से दूसरी पुस्तक तक और एक स्मृति से दूसरी स्मृति तक निरंतर फैलती रहती है। यही जीवन का सबसे सुंदर गणित है—जिसमें जोड़ते-जोड़ते व्यक्ति स्वयं मिट जाता है, पर उसकी त्रिज्या अमर हो जाती है।
लेखक - डॉ. मोहन बैरागी

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